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Showing posts with the label socialism

Suez Canal blockage and the so-called malpractice of complimenting.

Some guys are jestingly saying that the Suez Canal blockage by that large box ship happened because her Captain refused to give a small box of Marlboro as good-services compliment to the marine pilot who was suppose to help, virtually substitute as the Captain of the ship, and navigate the ship through the Canal .  Well, the trouble these days is that in all the socialists and the Communist countries , the professional services have all been turned into "paid jobs" which are controlled and operated by the Governments. Therefore, all types of practises of complimenting a service, even those which are happening from a voluntary expression of joy for receiving a good quality service, are straightforward perceived as an act of bribery and thereby, the corruption. .  There is the trouble which the Socialist system of Public Administration has brought with it, in the mass psychology .   In the free and liberal Democratic societies, the perception about the act of Complimen...

Part 3: In India, which is the left and which is the right wing?

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Understanding terms such as 'Leftist' and 'Democracy' in contemporary political conversation

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Socialism-critic से Socialism-bashing भिन्न करना सीखें

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इस तथ्य पर जितना ज़ोर दिया जाये उतना कम पड़ता है कि 'वामपंथ' (leftist) एक विशेषण संज्ञा (adjective-noun) होती है, यह कोई विचाधारा का व्यक्तिवाचक संज्ञा (proper noun) नाम नही है। वामपंथ नाम से किसी भी विचारधारा का नाम नही है। जो है वह साम्यवाद है, और समाजवाद है। साम्यवाद (Communism) , यानी वर्गहीन समुदाय के लिए सामाजिक व्यवस्था का सिद्धांत। और समाजवाद(Socialism) में वर्गहीन होने पर ज़ोर नही दिया जाता है, बाकी सामाजिक व्यवस्था के सिद्धांत का पालन करने के प्रयास होते हैं। अन्तर सूक्ष्म है मगर फिर भी प्रधान है। society और community के बीच आप को अपने बौद्धिक ज्ञान से जितने अंतर समझ आएंगे, उतना बेहतर आप साम्यवाद और समाजवाद की भिन्न कर सकेंगे। और फ़िर शायद यह भी समझ जाएं की कुल मिला कर दोनों करीब करीब बस species से भिन्न है, वरना तो एक ही genus के विचार है। और इस genus के विपरीत होता है प्रजातंत्र यानी democracy। अब एक और महत्वपूर्व ज्ञान। कि हमारे देश में चल रहे संवाद में बहोत बड़ा भ्रम और कुतर्क छिपा हुआ है समाजवाद(/या साम्यवाद) विषय को वामपंथ नाम से संबोधित...

What is the difference between Freebies and Good Governance

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The Socialist Democracy explosive mixture

Do you know that the concept of "DUTIES" of citizen , in the CONSTITUTION of our DEMOCRACTIC country is taken from the erstwhile USSR ? USSR was a SOCIALIST STATE , which has collapsed , maybe under the strains of such policies, and it ceases to exist as of today. It has left behind a legacy of an usurped territory , taken over by corrupt and uncontrollable Political class, which has originated from the Bureaucracy and the secret services . Otherwise, in rest of the world, FREEDOM is suppose to be unrestricted and UNCONDITIONAL. The citizens have the freedom , whereas it is state which is DUTY bound. How many of us realize that this point  is big KICHHADI MIXTURE where the failures of our system are rooted ? #The_Constitution_Day

प्रजातंत्र की दुविधा - मूर्खतन्त्र

*प्रजातंत्र की दुविधा*  - मूर्खतन्त्र प्रजातंत्र की अपनी बहोत सारी सीमाएं है जिनका एहसास हमें सदैव रहना चाहिए। मसलन, न्यायालय अक्सर करके मूर्खता के मुख्यालय में तब्दील ह...

अग्रिम और पिछड़ी जातियों का वर्गीकरण, और अध्ययन मेरे अनुसार

अगर 16वीं शताब्दी के पर्यान्त समुदायों (जो की 'जाति' से संबंधित एक अन्य पर्यायवाची नाम ही होता है) के बीच आर्थिक संसाधनों के बटवारे को समझे तब सबसे प्रथम हमे दो वर्गों को चिन्हित करके काम को आगे बढ़ाना होगा। दो प्रमुख वर्ग थे - उद्योगिक श्रम (Industrious) वाले समुदाये , और कृषक श्रम(Pastoral) वाले समुदाये। 16वीं शताब्दी के बाद में अग्रिम समुदाये वह हैं जो की 'उद्योगिक श्रम' करते थे।इससे पहले 'कृषक श्रम' वाले समुदाये अधिक समृद्ध और राजनैतिक बलवान हुआ करते थे। 16वी शताब्दी मानक इसलिये बनी क्योंकि यहां से ही steam engine बना, जो की निरंतर, अथक श्रम का प्रथम संसाधन था मानव इतिहास में, और जहां से professionals ने बढ़त बना ली युद्धक और कृषक लोगों से। यहां से ही factorइया बनी, और फिर उद्योग बने। जमीन का प्रयोग वह विषय था जहां से बदलाव ने असर दिखाया था। उद्योग आ जाने से जमीन का छोटा अंश, यदि वह उद्योग में है तो फिर अधिक उत्पादन शील हो गया, किसानी और पशु पालन के मुकाबले। दूसरा की उद्योगी आदमी को किसी एक स्थान पर बंधना मुश्किल था, क्योंकि जहां बाज़ार में saturation...

ऐसा क्यों हो रहा है कि हमारा प्रजातंत्र बारबार समाजवाद की ओर मोड़ ले ले रहा है ??

ऐसा क्यों हो रहा है कि हमारा प्रजातंत्र बारबार समाजवाद की ओर मोड़ ले ले रहा है, जो कि मार्ग किसी भी प्रशासन को निश्चित तौर पर सामन्तवाद और नौकरशाही की ओर ही ले जाता है ? आज जब बैंकों का निजीकरण भी शुरू होने लगा है और खाताधारकों के जमाधन पर बाज़ार का जोख़िम मंडराने लगा है, तब ऐसे हालात में एक सवाल यह भी है की आखिर सरकार की मंशा क्या है? और वह मंशा आ कहां से रही है? भले ही यह दोनों सवाल अलग विषय बिंदु में से उभरते हुए दिखते हों, मगर इन दोनों सवालों का जवाब शायद एक ही है और जो की भारत के समाज को समझना या चिंतन करना ज़रूरी हो गया है। दोनों सवाल के मूल में से एक अन्य सवाल निकलता है जो की दर्शनशास्त्र से अधिक वास्ता रखता है। सवाल है की आखिर प्रजातंत्र होता क्या है? (बस , यह समरण रहे की जब आप प्रजातंत्र विषयवस्तु पर दार्शनिक हदों तक चिंतन करें तब यह भी सोचते रहें की दर्शन का अर्थ आध्यात्मिक चिंतन नही होता है, बल्कि किसी भी विषय पर मूल तत्व तक जा कर चिंतन करना होता है। दर्शन हदों तक चिंतन करने के लिए आवश्यक हो जाता है तुलनात्मक अध्ययन करें, जिसमे संग्रह का निर्माण करना पड़ता है की किन-कि...

नौकरशाही का जो चलन हमारे देश में है,उससे काल्पनिक देश utopia को भी नरक बना देंगे

अपने पेशे से मैं एक professional हूँ, लोकसेवा दार यानी public servant नही हूँ। अब इन दोनों शब्दों के अभिप्रायों में क्या अंतर है, और उस अंतर का क्या प्रभाव होते है, इनको जानने समझने के लिए आपको आर्थिक इतिहास पढ़ना पड़ेगा।।वह भी विश्व आर्थिक इतिहास, न की भारत का। भारत का आर्थिक इतिहास मात्र economic drain की दास्तां है, इसमें यह सबक है ही नही की अच्छे , समृद्ध देश आखिर बने कहां से, कैसे? और किताबों में पढ़ा जा रहा भारत का इतिहास , सामाजिक और राजनैतिक इतिहास एक सामाजिक स्तर का मनो रोग बन चुका है, जिससे समाज में हिंसा और महामूर्खता मनोचिकितसिय बीमारी फैल रही है epidemic स्तर पर। professional क्षेत्र रहते हुए मैंने अपने ही लोगों के इतिहास को देखा और खोज किया है। यह जानते और बूझते मुझे थोड़ा समय लगा गया की कैसे हम नौकरशाही के नियंत्रक होने चाहिये थे अगर भारत को समृद्ध देश बनाना था, और कैसे आज, उल्टे, हम उनके सेवक बन कर clerk स्तर की जी-हजूरी करने लगे हैं। तो आर्थिक इतिहास के पाठ से मिले सबक में मैं यह तसल्ली कर चुका हूँ कि नौकरशाही का जो चलन हमारे देश में है, उससे हम atlantic महास...

The Indian mechanism of practising the democracy is actually Bureaucratism

We must first compare the MECHANISM OF DEMOCRACY BASED PUBLIC ADMIN MACHINERY of the countries. Once we do that, the greatest discovery will be that since 1947, we are actually practising Socialism, which is a primitve of the evil systems of Feudalism ! We will see that we have been rearing the serpants of Corruption, crony CAPITALISM , modern forms of Discriminations (by way of VVIP Culture) , ..through our Bureaucracy ..!

सभ्यताओं का अंतर और प्रजातंत्र लागू करने का तरीका

किसी भी नाविक से पूछिए, वह आपको बता देगा कि दुनिया के गोल होने की वजह से धरती के दोनों गोलार्ध के लोग प्रतिपल एक दूसरे के विपरीत हालात के दर्शन कर रहे होते हैं। एक गोलार्ध में दिन होता है, तो दूसरे में रात। यह कभी भी सम्भव नही की पूरी धरती एक साथ एक जैसे ही दर्शन ले। यही है सभ्यताओं के अंतर। सभ्यताएं इंसानो के भीतर में अपने जो गुण छोड़ती हैं, भोजन, भाषा और पहनावे के माध्यम से, उसे संस्कृति बुलाया जाता है। प्रजातंत्र के प्रति इसके उच्चारण और इसको लागू करने में दो अलग सभ्यताओं की संस्कृति के प्रभावों के चलते अलग अलग तरीके विकसित हुए। इन अन्तर के चलते ही कही पर तो प्रजातंत्र व्यवस्था अधिक सफल बनी, और कहीं पर "स्थानीयकरण" के प्रभावों में एक "खिचड़ी" बन कर समाज को वापस अन्धकारयुग में ले जाने वाली व्यवस्था बन गयी। प्रजातंत्र को पश्चिम में बाज़ारवाद यानि free market के प्रभावों में ही समझा गया है। वहां प्रजातंत्र के रखवाले खुद नागरिक ही होते हैं, जो कि नही चाहते हैं कि उसकी कमाई संपत्ति को राजा-महाराजा छेक ले। यहां भारत मे indianisation करके हमने socialism का पा...

निजीकरण से प्रजातंत्र खत्म नहीं होते हैं, बल्कि सशक्त होते हैं

यहां पर मैं असहमत हूँ तबरेज़ भाई, की निजीकरण कर देने से प्रजातंत्र खत्म हो जायेगा ! मेरा मानना है की निजिकरण की वास्तविक पहचान होती है बाज़ारीकरण , और प्रजातंत्र सशक्त होता है जब नागरिक खुद अपने हाथों में आर्थिक स्वतंत्रता के स्रोत को थाम लेता है, और बाज़ार की स्पर्धा में रहते हुए नित नये प्रयोग, नये अन्वेषण करता है। यह जो "देश के चंद पूंजीपति" वाला मामला है, यह तो एक नियति और नतीज़ा है, हमारे आजतक के समाजवाद वाले सरकारीकरण का !! नौकरशाहों से मिलिभागति करके कुछ व्यपारिक जातियां (समुदाय) व्यापार करने में आगे निकल गये भ्रष्टाचार के भारोसे, और पिछड़ी और दलित जातियां आरक्षण की लालच में फंस कर के upsc की नौकरी की चाहत में सरकारीकरण का बचाव करते है। उनको सरकारीकरण में आरक्षण के मावे से सजी हुई खीर दिखती है, समाज की परोसा जा रहा भ्रष्टाचार का ज़हर नही दिखता है। 'चंद पूंजीवादियों' का समाज में जन्म ऐसे ही हुआ है, जिनको आज हम भलाबुरा बताते हैं। नौकरशाही एक खुल्ला आमंत्रण है नाकलबियत को समाज का शासक बनने का, और भ्रष्टाचार की दीमक बन कर राष्ट्रीय खजाने को चाट जाने का, बिना भय और ...

निजीकरण और सरकारीकरण शब्द मेरी आपत्ति

दो शब्दों के चिंतन विहीन प्रयोग के प्रति मैं अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हूँ। एक है, निजीकरण। इसके प्रयोग से हम जिस विचार के अवरोधित कर रहे हैं, वह है बाज़ारवाद। और दिक्कत यह है की बाज़ारवाद में ही छिपा है प्रजातंत्र का सार - right to private property। और दूसरा शब्द है सरकारीकरण, यानी nationalisation। इसके लिये उचित शब्द है समाजवाद , यानी अपने निजी संपत्ति और अन्य मौलिक अधिकार किसी मध्यस्थ संस्था को सौंप कर फिर आजीवन उससे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहना। यह परम मूर्खता है। भारत मे शब्दवाली में बहोत लोचा है। जो खुद को समाजवादी बोलते है, वह वास्तव में समाजवादी हैं नही, और जिसे हम सरकारीकरण बुलाते है, अकादमी ज्ञान के अनुसार वही समाजवाद कहलाना चाहिए ! तो, जो -जो है, वो- वो नही है है, और जो- वो नही है, वही- तो वो है!! 😁😁😁

क्यों पिछड़ा और दलित वर्ग ही निजीकरण (बाज़ारीकरण) का विरोधी वर्ग होता है ?

आम भारतीय जनता अभी भी अर्थव्यस्था और उसके मापने के तरीकों को जनती समझती नही है।  अर्थव्यस्था शब्द के नाम पर एक आम भारतीय कुछ भी नही सोचता है। पिछड़ा और दलित वर्ग "आर्थिक अंश" शब्द तक ही सोचता है, और फिर स्वतः आरक्षण नीति तक बातें पहुंचा देता है। दलित पिछड़ा वर्ग स्वभाव से ही "समाजवादी" अर्थशास्त्र नीति का होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह वर्ग गाँव में अधिक बस्ता है , शहरों की बजाये। और इस वर्ग के जो कुछ थोड़े बहोत लोग शहरों में हैं, वह नौकरी पेशे वाले ही है, उसमे भी अधिकांश तो सरकारी नौकरी में, आरक्षण नीति की सुविधा के चलते। तो कुल मिला कर यह वर्ग व्यापारिक उद्यम कर सकने वाला वर्ग नही है। इसलिए यह वर्ग ऐसा स्वतः ही सोचता है की पूरी दुनिया के आर्थिक चक्के को वैसा ही चलाया जाता है जैसा की उनके गांव में पंचायत सभा गाँव की सड़कों, अस्पताल और स्कूल चलवाती है, ट्यूबवेल के पम्प लगवाती है। तो यह वर्ग जैसा अपने गाँव में देखता हुआ आया है, वह यही सोचता-समझता है की बड़ी दुनिया में भी बस वही होता है अर्थव्यवस्था के नाम पर , बस थोड़ा से बड़े आकार में। इसलिए ही यह वर्ग निजीकरण का भी व...

क्यों भारत का प्रजातंत्र बारबार समाजवाद की ओर मोड़ ले लेता है ?

ऐसा क्यों हो रहा है कि हमारा प्रजातंत्र बारबार समाजवाद की ओर मोड़ ले ले रहा है, जो कि मार्ग किसी भी प्रशासन को निश्चित तौर पर सामन्तवाद और नौकरशाही की ओर ही ले जाता है ? आज जब बैं...

भारत मे सामाजिक व्यापारिक कंपनियों का बाज़ारीकरण...आखिर कौन हो सकते हैं सरकार के सलाहकार?

जिस हिसाब से सरकारी उद्योगों का बाज़ारीकरण (निजी करण ) किया जा रहा है, , बगैर नौकरशाही को सीमित किये, और उपभोक्ता जागरण (नागरिकों की अभिलाषा) को बिना प्राप्त किये और पर्याप्त सं...

On Economic system, its link with the political and the Legal system

I have a feeling, that, the economic systems are designed such as to give their best only when working with the associated political and the legal systems that are genuinely democratic by nature. It may not be possible to eradicate poverty,  to cure epidemic diseases , to provide gainful employment , the social security , the happiness , etc to the people unless the public governance systems are genuinely democratic by their nature . Coercion, whether by state authorities , or by any other means , is sure to bring failures in the economy.

आरक्षण नीति के प्रति आकर्षण पर लाभर्ती वर्ग की आलोचना

पिछड़ों और दलितों की आलोचना भी जम कर करनी होगी।  इसलिए क्योंकि यह लोग और इनके "बुद्धिजीवी" अपना सारा दम आरक्षण नीति के इर्दगिर्द लगा रहे हैं, न कि खुद को - अपने समुदाये को- एक व्यापारिक शक्ति में तब्दील करने में। यह युग व्यापार का ही युग है। और आरक्षण नीति एक साम्यवाद मानसिकता से प्रवाहित होती है। आरक्षण नीति को समर्थन देने का मतलब है कि आप निजी उद्यम को अभी भी प्रजातन्त्र का मुख्य आर्थिक इंजिन समझने में अल्पबुद्धि हैं। आप अभी भी "लोकसेवा " के जंजाल में फंसे हैं, जो कि हमारे देश मे अथाह भ्रष्टाचार , सामाजिक त्रासदियों, और व्यवसायी कौशल की कमी के असल अभियन्ता वर्ग है। दलित और पिछड़ा वर्ग वह वर्ग है जिसके पास व्यवसायी कौशल होता है। यह वर्ग हाथों के काम मे धनी है, बनस्पत ब्राह्मणों के जो कि कलम और बुद्धि कार्यों में तेज़ होते है। या की बनिया माड़वाड़ी वर्ग, जो कि हेंकड़ी गिरी से श्रमिक शोषण और कमीशन-खोरी से ही खाता आया है। विदेशों में उनके देश को उद्योगिक प्रधानता उनके व्यसायिक वर्ग ने दी है। हमारे यहां पहले तो कौशल-कार्य करने वाला वर्ग सामाजिक शोषण का शिकार हुआ। और अ...