67 साल के प्रजातन्त्र की समीक्षा
गलतियां हुई है संविधान निर्माताओं से। अब तो हमें rhetoric में उनके काम के तारीफ करना बंद करके समीक्षा करना शुरू करना होगा। आखिर 67 साल बीत गए हैं। कोई भी कानून जो व्यवस्थाओं संचालित करता है, मात्र किसी उद्घोषणा से काम नही कर सकता है। कानून है ही क्या,उसकी बुनियादी समझ क्या है ? भई, जो कुछ भी हम और आप सहज स्वीकृति से करते आ रहे हैं, सदियों से, परंपरा से, वही कानून है। तो किसी उद्घोषणा से क्या वह बदल जायेगा ? नही, बिल्कुल नही। तो क्या किसी किताब के पन्ने पर कोई कुछ लिख कर चला जायेगा , तो क्या देश की परंपरा बदल जाएगी? बिल्कुल नही। तो क्या परंपराओं को कभी भी बदला नही जा सकता है ? बदला जा सकता है। सबसे प्रथम तो आप को पहचान करनी होगी,विपरीत और असंतुष्ट शक्तियों की, जो कि परिवर्तन चाहते हैं। फिर , आवश्यक परिवर्तन के लिए उन्हें शक्ति संतुलन के चक्र में आसीन करना होगा जहां से वह हमेशा के लिए, निरंतर उस बदलाव को प्रेरित करते ही रहे जो कि वह चाहते हैं। तो यहाँ पर गड़बड़ हुई है। सबसे प्रथम तो की ठकुराई को पहचानने के लिये उसकी प्रकृति को नही समझा गया, बल्कि उसके उपाधि या कुलनाम से पहचाना गय