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Don't suffer from Nostaligia

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संघी लोग आतंकवाद किसको समझते हैं? क्या गलती है उनमें

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गैर–ब्राह्मण हिंदू समाज में ब्रह्म की पूजा क्यों नहीं करी जाती है

कहते हैं की गैर–ब्राह्मण हिंदू समाज में ब्रह्म की पूजा नहीं करी जाती है। धरती पर सिर्फ एक ही मंदिर था, पुष्कर (राजस्थान) में, जहां कि ब्रह्मा की पूजा होती थी। जानते हैं क्यों? पुराने लोग आपको बताएंगे कि तीनों महादेवों में सिर्फ ब्रह्म जी की ही पूजा नहीं करी जाती है क्योंकि उन्होंने एक बार झूठ बोला था । मगर आजकल ऐसा नहीं है। दरअसल ये चलन टीवी के युग में चुपके से ब्राह्मणों ने साजिश करके बदल दिया है ! क्योंकि ब्राह्मण लोग खुद को ब्रह्म की संतान बताते हैं, तो फिर वो कैसे अपने परमपिता, ब्रह्मा, की संसार में ऐसी अवहेलना होते देख सकते हैं। इसलिए उन्होंने थोड़ा हिंदूवाद, धर्म-पूजा पाठ, आस्था का चक्कर चलाया और नई पीढ़ी को हिंदू – मुस्लिम करके बेवकूफ बना लिया है। पुराने लोग आपको शायद ये भी बताते कि कैसे हिंदुओं का कोई भी त्रिदेव अवतार जिसकी पूजा हुई है संसार में, वो ब्राह्मण वंश में नहीं जन्मा। और यदि किसी त्रिदेव ने ब्राह्मण वंश में जन्म लिया भी, —तो फिर उसकी पूजा नहीं करी गई संसार ने। जैसे कि, — राम चंद्र जी — विष्णु अवतार, क्षत्रिय वंश में थे, और संसार में पूजा होती है भगवान क...

जन्मजात पंडित और व्यक्तिव का confidence का भारत के जनमानस पर धाक

हमारे एक मित्र, मxxष मिश्रा , कुछ भी लेख लिखते समय confidence तो ऐसा रखते हैं जैसे विषय-बिंदु के 'पंडित' है, जबकि वास्तव में ग़लत-सलत होते हैं। तब भी, उनके व्यक्तित्व में confidence की झलक होने से उनके लाखों followers है ! सोच कर मैं दंग रह जाता हूँ कि देश की कितनी बड़ी आबादी अज्ञानी है, जिसका कि जगत को पठन करने का तरीका ही मxxष मिश्रा जैसे लोगों के उल्टे-शुल्टे लेखों से होता है, सिर्फ इसलिये क्योंकि मxxष जी जन्मजात पंडिताई का confidence रखते हुए लोगों को आसानी से प्रभावित कर लेते हैं । भारतीय सांस्कृतिक परिवेश में तमाम प्रबंधन शिक्षा के गुरु लोग ऐसे ही नहीं बार-बार ' व्यक्तिव में confidence ' रखने की बात दोहराते रहते हैं। बल्कि वो लोग तो सफाई भी देते रहते हैं कि अगर आप के व्यक्तिव में confidence है, तब अगर आप ग़लत भी हो, तब भी आप अपनी बात को जमा सकते हैं। प्रबंधन गुरु लोग ग़लत नहीं हैं। हमारे देश की आबादी में औसत आदमी किताबी अध्ययन करने वाले बहोत ही कम हैं। ऐसे हालात में लोगों को किसी भी विषय पर सही-ग़लत का फैसला करने के संसाधन करीब न के बराबर होते हैं। ये देश अज्ञानियों ...

कहाँ से, कैसे आये हैं भारत के उद्योगपति

भारत में अधिकांश उद्योगपति कोई व्यवसायिक श्रमकर्ता नहीं है अपने उद्योग के क्षेत्र में। वे सब के मात्र निवेशक के तौर पर प्रवेश करके उस उद्योग के स्वामी बने है। और उनके पास निवेश करने की पूंजी कहां से आई है? पुराने जातिगत पेशे तथा सामुदायिक प्रथाओं से तैयार करी है ये पूंजी<  जब अन्य जातियां अंतर्द्वंद से ग्रस्त थी, समाज की अर्थनीति में पैसे का चलन नहीं हुआ करता था, वे सब ब्राह्मणों के धार्मिक प्रपंच बहकावे में जातपात कर रही थी, कुछ मारवाड़ी समुदाय अंतरिक विश्वास और सहयोग करने वाली प्रथाएं अपना रहे थे, जिस सहयोग और विश्वास का प्राप्त करने का साधन बन रही थी — मुद्रा, यानी पैसा। अहीर अभी गाय पशु को ही अपना धन मानता था, जबकि व्यापारी समुदाय गाय से निकाले हुए दूध को बेच कर प्राप्त हुई मुद्रा को अपना धन मानता था। कुम्हार और बढ़ाई अभी राजा की शाबाशी और गले से निकली स्वर्णमाला को अपने बेहतर कारीगरी कौशल का ईनाम मानता था, व्यापारी समुदाय राजा को कर दे कर दोस्ती कर लेने में ईनाम समझता था। ऐसे ये मारवाड़ी और मेवाड़ी लोग(अधिकांशतः जैन परिवार के लोग) धनवान बन गए और वही आगे चल कर बिरला, अद...

वंशवाद कब , कहां हुआ है — इसको तय करने का मानदंड क्या होना चाहिए?

हीरो का बच्चा हीरो-हीरोइन क्यों नहीं बन सकते? क्रिकेटर का बच्चा क्रिकेटर क्यों नहीं बन सकता? राजनेता का बच्चा राजनेता क्यों नही बन सकता? क्या दिक्कत है? क्या किसी को किसी पेशे में जाने से रोकना मात्र इसलिए कि उसके पिता या पूर्वज पहले से उस क्षेत्र में नामी व्यक्ति थे,ये अपने आप में एक जातिवाद नही होता है?  होता है , न? तो फिर आखिर वंशवाद का मानदंड क्या रखना चाहेंगे आप? कैसे कहेंगे की भारत की उच्च न्यायपालिका में घोर जातिवाद/ब्राह्मणवाद होता है? जवाब है — सार्वजनिक /अथवा सरकारी पदों पर, जहां नियुक्ति किसी भी प्रकार की चयन प्रक्रिया से करी जाती है, यदि वहां पर बार बार एक वंश के व्यक्ति पहुंच रहे हों, जबकि चयन प्रक्रिया में पिता या पूर्वजों को सेंघमारी कर सकने की संभावना खुली हुई हो, तब वो "वंशवाद" माना जाना आवाशयभावी हो जाता है।

Suez Canal blockage and the so-called malpractice of complimenting.

Some guys are jestingly saying that the Suez Canal blockage by that large box ship happened because her Captain refused to give a small box of Marlboro as good-services compliment to the marine pilot who was suppose to help, virtually substitute as the Captain of the ship, and navigate the ship through the Canal .  Well, the trouble these days is that in all the socialists and the Communist countries , the professional services have all been turned into "paid jobs" which are controlled and operated by the Governments. Therefore, all types of practises of complimenting a service, even those which are happening from a voluntary expression of joy for receiving a good quality service, are straightforward perceived as an act of bribery and thereby, the corruption. .  There is the trouble which the Socialist system of Public Administration has brought with it, in the mass psychology .   In the free and liberal Democratic societies, the perception about the act of Complimen...

The origins of the Uniform

The origins of the Uniform Uniforms originated , not from the defense forces or any other type of the force unit of the people . It started from the professionals , back in Europe . Professionals are those people who earned their living by giving service-good to the people , such as the work in carpentry, the iron smith, hides men, mason, the tailors, and so on. These people used to wear a kind of dress so to advertise that they were sellers of certain kinds of  commodity or good  ,in the form of specialised  skill . It is better understood as  service-good . Earlier , the formation of military forces was not regular . The farmers and their young sons were forcefully   taken up by the local Feudal Lords and just given some weapons and sent away to fields to fight, without being given any training. The problem was no one would know which side the other person , that they were fighting and hitting by their weapons, belonged with. The pro...

Safety professionals and the clerk-skill led bureaucracy

There is something about safety which I have learnt after so many years of seafaring . That , the very concept of safety by its nature is pitched against the business profits. Look at all the safety items you see around yourself on the Merchant ships. The lifeboats, the liferafts, the EPIRBS, the SARTs, ...you name it, everything. Have you ever considered the worth of these items from the point of view of a finance manager? If you ever do, you will notice that all of these items are a waste of money, a reduction in the profits of the business. The challenge of all the argument that come to promote the cause of Safety is that they deal in the imaginary and unseen, unheard events for the finance manager and other non-seagoing people. So it is always difficult to argue out how something is important, particularly when the argument have to contest their battle against the business profits by using scenarios which they may have hardly experienced from the comforts of their offices...

IAS Association की सोच क्या है भारतीय समाज को प्रजातांत्रिक प्रशासन व्यवस्था मुहैया करवाने के प्रति

तो जब private sector से लोगों को सरकारी क्षेत्र में सीधे सयुंक्त सचिव लिया जाने लगा है तो हमारे देश के नौकरशाह associations की माँगे हैं की IAS को भी sabbatical जैसी अवकाश की राहत दो कि निजी क्षेत्र में कुछ वर्ष कार्य के वापस IAS में join कर ले ! यानी सरकारी ज़मीदार साहेब लोगों को अपने पद के profits भुनाने के और अवसर दिये जाएं ! सरकारी सेवा अब सामाजिक हितों के किये त्याग नही, बाकायदा भोगवादी निजी मुनाफे का धंधा है ! आलम यूँ है कि हमारा प्रजातंत्र चूंकि हमारे विशिष्ट ब्रिटिश राज उपनिवेश तथ्यों की वजहों से उल्टे विधि पैदा हुआ है, इसलिए हमारे नौकरशाहों की खोपड़ी भी उल्टी ही है। उनके अनुसार प्रजातंत्र का वरदान सिर्फ IAS/IPS लोग है, न कि देश का आम आदमी जो समाज की दैनिक ज़रूरते पूरा करते हुए अपना व्यवसाय करता है ! कहने का मतलब है कि राजगीर मिस्त्री, बढ़ई, वेल्डर, लोहार , ग्वाल , किसान, चमड़े के कारीगर, motor गाड़ी के चालक, हवाई pilot ,समुद्री नाविक इत्यादि से कोई प्रजातंत्र नही बनाते है।इसको प्रजा तंत्र वरदान की क्या  ज़रूरत।  और प्रजातंत्र तो बनता है सिर्फ IAS या IPS लोगों से ...

नौ निजी क्षेत्र से लिए संयुक्त सचिव और दलित पिछड़ा चिंतकों का IAS सेवा का बचाव

पिछड़ा और दलित वर्ग के चिंतकों की आलोचना अभी ज़ारी रखनी होगी। यह Social Justice Lobbyists , इनके मीडिया घराने और पत्रकारों की समस्या शायद यह है की कई सारे लोग "IAS की तैयारी" वाली बीमारी से होते हुए इन पेशों में आये हैं और उस बीमारी से अभी तक उभर नही सके हैं। इसलिए उनके मूल्यांकन में मोदी सरकार ने अभी जो नौ निज़ी क्षेत्र के कर्मियों को सीधा संयुक्त सचिव पद पर लिया है, यह समस्या इसलिए है कि इसमे आरक्षण नही है। या कि यदि प्रधानमंत्री कार्यालय से IAS अधिकारी "पलायन" कर रहे है तो समस्या है की नौ निज़ी क्षेत्र कर्मियों को सीधे उस पदस्थान पर ले लिया है जहां ias को पहुंचने में 17 वर्ष लगते हैं। असल में आरक्षण नीति का एक प्रकोप हमारे समाज पर यह पड़ा है कि पिछड़ा और दलित वर्ग के लोग आरक्षण का लाभ उठाने के चक्कर में IAS की तैयारी में लग गये हैं और यह आर्थिक सामाजिक चक्र की जरूरतों के अनुसार एक बीमारी है, प्रगति का मार्ग नहीं। और फिर जो लोग IAS की 'कठिन परीक्षा" को भेद नही सके हैं वह आजीवन उससे मंत्रमुग्ध पड़े 'बीमारी' का प्रसार करते रहते हैं, उस सेवा का बचाव करत...

संविधान सुधार की चाहत के विषय में स्पष्टीकरण

संविधान को बदलने के विचार कई सारे नेता बोल रहे हैं, और इस बिंदु पर भी राजनीति गरम होने लगी है। ऐसे में आवश्यक हो चला है की कुछ स्पष्टीकरण हो जाये की क्या-क्या बिंदु स्वीकृत हैं, और क्या-क्या नहीं। सर्वप्रथम तो यह जानना ज़रूरी है कि भारत के संविधान का बहोत बड़ा गुण है ही यह की इसे समय की ज़रूरतों के अनुसार बदलाव किया जा सकता है। Amendability. तो इसमे तो कोई विरोध नही किया जाना चाहिए की बदलाव की चाहत एक जायज़ मांग है खुद संविधान की मंशा के नज़र से भी। अब कुछ इतिहासिक ज्ञान। कि, संविधान के स्वरूप से पूर्ण रूप से संतुष्ट तो खुद बाबा साहेब भी नही थे। उनको भी आभास था की संविधान से कई सारे असंतुष्ट वर्गों की जायज़ मांगो को पूर्ण नही कर सके थे। उन्होंने भी आशा जताई थी की भविष्य में शायद उनके संविधान की amendability के गुण के सहारे कभी कोई ऐसा ढांचा तलाश कर लिया जायेगा जिसमे सभो वर्गों की जायज़ मांगो को शायद संतुष्ट किया जा सके।  तो यहां बदलाव में जो स्वीकृत किया जा सकता है वह यह की  देश की जनता ने आपसी संकल्प के कुछ मूल्यों को इन सत्तर सालों में इस तरह अपना लिया है की अब शायद उन्हें बदल...

कथा वाचन और u turn लेती वर्तमान काल की राजनीति

सत्य के साथ मे मुश्किल यह होती है कि वह औझल ही रहता है और फिर लंबे समय के उपरांत तभी प्रकट होता है जब कोई शोध, अन्वेषण या अविष्कार किया जाता है। सत्य  की आवश्यकता इंसान और समाज को इसलिए होती है क्योंकि इसके बिना तो समाज मे शांति,विकास और  समस्याओं का समाधान मुमकिन नहीं होता है। इतिहास के विषय मे सत्य के अप्रकट होने से समाज मे अपनी दिक्कतें घटने लगती हैं। सामाजिक इतिहास के तथ्य तम्माम समाजों को आपसी संपर्क होने पर तुरंत प्रतिक्रिया करने का प्रेरक होते हैं। वर्तमान काल के कूटनीतिज्ञ इसीलिए सामाजिक इतिहास के आसपास के तथ्यों को एक समान प्रमाणित होने देने से बचना चाहते हैं। क्योंकि एक ही बार में  बड़ी तादाद में वोटों को किसी एक के पक्ष में, या विरुद्ध में स्थानांतरित करने का सबसे आसान युक्ती इतिहासिक तथ्यों की मदद से अलग-अलग कथा  【 narrative  】 लिखने से ही बनती है। तभी तो सामाजिक तथ्यों में वही स्वतंत्रता संग्राम, वही गांधी और वही नेहरू है, मगर दोनों पक्षों की कथाएं अलग-अलग हैं इन सब इतिहासिक तथ्यों के प्रति। कथा रचना और इतिहास को समझाने के...

आरक्षण नीति के प्रति आकर्षण पर लाभर्ती वर्ग की आलोचना

पिछड़ों और दलितों की आलोचना भी जम कर करनी होगी।  इसलिए क्योंकि यह लोग और इनके "बुद्धिजीवी" अपना सारा दम आरक्षण नीति के इर्दगिर्द लगा रहे हैं, न कि खुद को - अपने समुदाये को- एक व्यापारिक शक्ति में तब्दील करने में। यह युग व्यापार का ही युग है। और आरक्षण नीति एक साम्यवाद मानसिकता से प्रवाहित होती है। आरक्षण नीति को समर्थन देने का मतलब है कि आप निजी उद्यम को अभी भी प्रजातन्त्र का मुख्य आर्थिक इंजिन समझने में अल्पबुद्धि हैं। आप अभी भी "लोकसेवा " के जंजाल में फंसे हैं, जो कि हमारे देश मे अथाह भ्रष्टाचार , सामाजिक त्रासदियों, और व्यवसायी कौशल की कमी के असल अभियन्ता वर्ग है। दलित और पिछड़ा वर्ग वह वर्ग है जिसके पास व्यवसायी कौशल होता है। यह वर्ग हाथों के काम मे धनी है, बनस्पत ब्राह्मणों के जो कि कलम और बुद्धि कार्यों में तेज़ होते है। या की बनिया माड़वाड़ी वर्ग, जो कि हेंकड़ी गिरी से श्रमिक शोषण और कमीशन-खोरी से ही खाता आया है। विदेशों में उनके देश को उद्योगिक प्रधानता उनके व्यसायिक वर्ग ने दी है। हमारे यहां पहले तो कौशल-कार्य करने वाला वर्ग सामाजिक शोषण का शिकार हुआ। और अ...

The effects of Helmet laws on the Intellectual courage of liberated people

this kind of video is custom-generated just to spread scare ! Think critically, if u may, you should notice that Helmet is a mitigating device, not a preventive device. The better action is the preventing action, not the curative or mitigating action. A helmet makes ZERO contribution in preventing an accident. The helmet, may , IF AT ALL, come of use POST AN ACCIDENT, not before an accident. ___-____+____-___+____- Sometimes there is no actual horror in the story. It is only the work of cameraman by shaking the camera, taking some acute angle shots, and then the sound editors adding the background score , which give a feeling of scare. The Helmet wearing "inspirational" videos are in the same line. The logic of un-avoid-ability of the helmet device has never been found. The Video-makers generate them only from their own imaginary stories. One can create such "inspirational" stories for other devices as well -like, for driving gloves, the windsheeter jackets, the ...

Distinguishing between Business, Profession and Service

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Ordinarily we all depend on English dictionary, from where we acquire a knowledge that  Profession  and  Service  mean one and the same thing. But in deeper academics, there is a distinguishing between these.

भाजपा और उनके दोमुंहे तर्क

भाजपाइयों ने एक साथ दोस्ती और दुश्मनी का ऐसा ताना बाना बुन है की आम आदमी अगर इनके तर्कों को बिना अपनी अंतरात्मा के प्रयोग से सुलझाये पकड़ेगा तब वह व्यक्तिगत जीवन में एक बुद्धिहीन मनुष्य बन कर विकसित होगा।   अधिकांश भारतीयों को भी यही समस्या है। हमारी वर्तमान संस्कृति में तर्कों का एक विचित्र ताना बाना बंधा हुआ है जिसमे जन्म ले रहे नवजात बड़े होते होते अपने अन्दर की सृजन क्षमता को खो देते हैं, अंतर्मन को नष्ट कर देते हैं, माया और भ्रम के जाल में पल-बड़ कर उनके बौद्धिक गुण ख़त्म हो चुके होते हैं।    इस विरोधाभासी ताने बाने के अस्तित्व को हम सभी पहचानते भी हैं। इस ताने बाने को कभी तो हम लोग अपनी गंगा जमुनी सभ्यता बुलाते हैं, कभी करोड़ों देवी दवताओं वाला प्राचीन धर्म, कभी हमारी धार्मिक, संस्कृति और राष्ट्रिय विविधता , और कभी हमारा विश्व का सबसे विशाल संविधान।    जहाँ यह विरोधाभासी ताना बाना हमारी अस्तित्व बनाये रखने का सबसे बड़ा गुण हैं, वही यही ताना-बाना हमारी बुद्धि पर पड़ा सबसे बड़ा पर्दा है जो हमे दार्शनिक रूप में विकास करने में बाँधा बन रहा है।    भाजपा के कुछ एक विरोधाभासी हथकंडों पर...

भाजपा की 'सकारात्मकता' है क्या?

भाजपाई जिसको सकारात्मकता बुलाते हैं, और जिसे भंग कर के नकारात्मकता फैलाने का आरोप वह आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल पर लगा रहे हैं, मैं उसे Reality Distortion Field (RDF) बुलाता हूँ।   RDF को हिंदी ...