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Sierra's predicament

Predicament of Sierra is happening from the lack of Intellectual viewpoint that Tipping and Bribery, though they very closely similar , but are still different.
      This refusal to accept this difference is creating the moral vacuum which is making Sierra to endorse the political groups which are indulging in the wrong. What remains shocking is that Sierra scathes the corruption of Party A , while he desires to give way to the Corruption of Party B. Therefore, he is someone who doesn't want a cure, he wants the diminishing.
   However, in ground, there is no way to distinguish between the choice of complete cure AND the choice of diminishing. There is no rational criteria to judge this. It is hypocrisy to even attempt to create a distinction. No ethics, no morality offers to us this distinction.
  But rational and moral thoughts do endorse the distinguishing between the tipping and Bribery. From top notch academia, to philosophers, ample evidences can be shown to prove that Tipping and Bribery are separate human interactions, although very closely inter-linkable.
    The debate of Sierra ,therefore, is rising from the lack of distinction , which is causing in him a moral vacuum, and that in turn, causing him to endorse the political group which is as much grossly wrong as the other political group. The personal outlook, lacking the nuances, is leading to the choice of political group, which is admittedly wrong too.
  I would rather Sierra should for the sake of purging his confusion of morality, avoid receiving and giving of the tips, than to confuse away himself as a morally wrong-doer, and therefore seek defense for himself by endorsing the wrong and anti-social political viewpoints.
   There is a large section of population in India which is having the predicament that Sierra has. Lack of nuances on Tipping and Bribery, is causing in them a feeling of Guilt, to alleviate which they make the choice of going "unHyprocritical ", thus choosing the corruption and Scams of Party B, against those of Party A.
  Overall, this Intellectual deficiency to observe the differences is paving way for Corruption to survive. 

Dynasticism is in itself not a problem, the problem is stagnant powers.

अगर आप परिवारवाद (वंशवाद) के ही विरुद्ध है तब आप कोई समझदारी नहीं कर रहे हैं। आखिरकार परिवारवाद नेत्रित्व हस्तांतरण की समस्या का सबसे प्रचुर और सरल पद्धति है जो दुनिया भर में प्रयोग करी जाती है।
   चाहे आप ब्रिटिश साम्राज्य को देखें जहाँ की आज भी शाही राजघराना परिवारवाद के द्वारा ही चल रहा है, या कि अमेरिका के अमीर बैंक उद्योगी। सब के सब परिवार पर ही चल रहे हैं।
   मूल समस्या जिससे जनता परेशान होती है वह है शासन शक्ति का स्थाईकरण। शासन शक्ति किसी एक व्यक्ति या परिवार में जा कर अहंकार लाती है। यह अभिशाप बन जाती है। भारत में हिन्दू धर्म में घटी जात वादी प्रथा परिवारवाद से उत्पन्न हुयी सबसे बड़ी ऐतिहासिक त्रासदी है। जातिवाद ने एक परिवार वंशियों का समाज में अधिक ऊपर का दर्ज़ा दे दिया और दूसरे को अछूत और मानव जन्म के अधिकारों से ही वंचित कर दिया था।
   परिवारवाद समाज में व्यक्तिगत प्रगति की प्रेरणा को नष्ट कर रहा होता है। यह सक्षमता पर अंकुश लगा देता है।
  बस यही वह समस्या है जिसका निवारण करना आवश्यक है। अन्यथा परिवार ही इंसान को प्रगति करने की प्रेरणा भी देता है।
आख़िरकार, आदमी कमाता किसके लिए है ?? परिवार के लिए ही तो ।
     परिवारवाद को शासन शक्ति पर हावी होने से रोकना ही परिवारवाद विरोधियाँ का उद्देश्य होना चाहिए,न की परिवारवाद का सम्पूर्ण समापन। परिवारवाद आखिर में नेतृत्व की समस्या का समाधान भी तो है। और इंसान को प्रगति करने की प्रेरणा भी।

A fixed-match is the one having lost its oomph factor, its interest level.

I no more watch Cricket ever since the match-fixing has come to settle in my beliefs.

The core challenge before a Conscience-driven political party, such as the Aam Aadmi Party ,is to demonstrate to the people that **you can be winner by BEING TACTFUL, ALBEIT WITHOUT being Corrupt**.
      This is what the AAP has to demonstrate and prove to everyone.
Generally, it settles out as a common belief that a person who is conscience-driven cannot afford to be Tactful ,to be able to adopt the winning strategies because of the risk of being labeled as Corrupt.
   Therefore, as a last measure, a conscience-driven man or party is lead into depending ,as a strategy,on the winner side themselves leaving the trails of mistake . The conscience-driven is left with the only means-- that of crying and whine on mistake committed by the corrupt winner, and thereof, to collect the support of the losers so to make his victory for tthemselves.
   This is the belief which needs to be cracked and shattered.
In my own understanding it is not an impossible challenge as such. But it requires a huge support of the Public Conscience itself to be able to overcome the challenge. The fundamental crack to this challenge is available from the very fact that the Entrusted Tasks of a Government in a democracy is to create a LEVEL PLAYING FIELD . This condition will force that even if a political party has risen to power by use of combination of "unfair and fair" tactics, it will still have to atleast pretend to be Conscience-driven, and act out the hypocrisy of being Fair and Just throughout.
  This is the catch.
   The Realpolitik inside the group of Political groups is largely about Hypocrisy. The hypocrisy on ground will surely create a vast section of the dissatisfied,"disillusioned", loser population, which should help the opponent political camp to rise to power. Infact,this is what we see as the "Anti-incumbency factor".
   Only catch thing at this point is that If the public conscience can be raised to the level of preventing the "anti-incumbency phenomenon" from making repeated dwindling of administrative powers between the eventual two political groups, then the level playing field for a Conscience-driven man/political group can be created.
    In my thinking, Many of the western democracies have a public conscience nearing this levels to be able to put more effective checks on such forms of anti-incumbency, and the power dwindling.
    Scandinavian countries are in the top order of such a list.
        War against corruption is a contest between Conscience and the Slavery of human mind. Where there is Conscience, there will be free-will and the freedom which the Conscience so regularly demands. Freedom leads to the political system of democracy.
    Therefore, Democracy will become a natural loser too ,if the conscience loses out.
     While the weakness of the Conscience-driven party is so apparent, its vulnerability areas so well known, the best service to the common good can only be by ensuring the victory of the Conscience-driven political group.
  The level playing field between each of us can only arrive when the umpires can be trusted to be the most neutral and objective as one can be. The Governments are the Avatars of the Umpire in this game whose business is to guarantee the level ness of the field.

   Therefore,if you want to enjoy the game, it is in your interest to ensure the neutrality of other factors. A fixed-match is the one having lost its oomph factor, its interest level.

प्रजातंत्र पर समालोचनात्मक चिंतन

आरम्भ में प्रजातंत्र का उत्थान राजशाही और जमीदारी जैसी प्रशासनिक व्यवस्था से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था।
    राजशाही व्यवस्था में सभी मनुष्य को बराबर का स्थान नहीं मिलता था। कुछ लोग उच्च कुलीन, बड़े और अधिक सम्मानित , न्यायालय में विशिष्ट पद-सम्मान के अधिकारी, और वह दूसरे व्यक्तियों पर शासन करने के लिए थे।
   और अधिकाँश लोग निम्म-कुलीन, छोटे, अशिक्षित अथवा आवश्यकता मात्र की शिक्षा और रोज़मर्रा के कामकाज करने के जन्म लिए माने जाते थे।
    प्रजातंत्र का निर्माण शासन व्यवस्था में सभी को समान अधिकार, और न्यायालयों के समक्ष समान स्थान, पद देने के हिसाब से हुआ था।
   मगर इस व्यवस्था की अपनी सीमाएं उन प्राकृतिक कारणों से स्वतः प्रस्तुत होती है जिन कारणों ने पुराने मनुष्यों के समाज में राजशाही व्यवस्था को उत्पन्न किया था।
                 वह प्राकृतिक कारण है की सभी मनुष्य समान योग्यतायों और कार्य दक्षता के होते ही नहीं है। यह तो भगवान् द्वारा स्वयं से निर्मित असमानता है जिसे मनुष्यों के द्वारा बनी कोई भी शासन प्रणाली निवारण कर ही नहीं सकती है। कुछ में नेतृत्व के गुण नैसर्गिक होते है, कुछ में पालन करने की प्रवृत्ति होती है। कुछ लोग मौलिक चिंतन कर सकने में सक्षम अपने जन्म और पालन पोषण के वातावरण की वजह से स्वतः हो जाते है। बाकी लोग चिंतन हीन होते है मगर अन्य दैनिक जीवन कार्यों में प्रवीण होते हैं।
   तो यह अभेद सत्य है की समानता तो प्रकृति की शक्तियों के विरुद्ध का विचार था। यही से प्रजातंत्र की प्रथम सीमा तय हो जाती है। प्रजातंत्र में समानता का अभिप्राय मात्र न्यायायिक और शासन प्रक्रिय में समान हिस्सेदारी से होता है, प्रत्येक रूप से समानता और परपरता से नहीं। प्राकृतिक न्याय में समानता बहुत विर्लय रूप में रची हुई है। किसी पशु के खुर शक्तिशाली हैं ,तो किसी पशु के पैर भागने और उछलने में कुशल हैं। प्राकृतिक न्याय में समानता का यही स्वरुप प्रजातंत्र में भी चलता है।  कुछ लोग अधिक धनवान है, कुछ श्रेष्ठ चिंतन वाले और कुछ बस यूँ ही जनसँख्या में अधिक। ऐसे में सर्वश्रेष्ठ न्याय के लिए सभी को समान भागीदारी दी जाती है। श्रेष्ठ चिंतन जो की जन्संख्या में कम उपलब्ध है ,को दीर्घ जनसँख्या के परस्पर संतुलित करने की प्रेरणा इसी विचार से उत्पन्न हुई है। इसी विचार से प्रजातंत्र में संसद भवनों में दोनो कसौटियों को प्रस्तुत करने के लिए दो सभा गृहों की रचना हुई थी- राज्य सभा और लोक सभा।

    प्रजातंत्र की दूसरी कमजोरी इसमें से निकलती है। क्या होगा जब श्रेष्ठ चिंतनशील विचार को दीर्घ लोकप्रियता का मोहताज़ बना दिया जाए? क्या ऐसा समाज मौलिक विचारों से प्रेरित मार्ग पर विक्सित हो पायेगा? या यह मात्र किसी दूसरे अधिक विक्सित समाज की नक़ल ही कर के रह जायेगा? यानी, जो कुछ किसी दूसरे समाज की नक़ल कर के इस समाज में लोकप्रियता प्राप्त करेगा वही इस स्वदेश के समाज में अपनाया जायेगा और लोग भ्रमित हो कर उस नक़ल करने में प्रथम होने की प्रवृत्ति को ही विकास का मार्ग मान लेंगे !!
   यहाँ इस भ्रमित और भटके हुए प्रजातंत्र में लोकप्रियता, दीर्घ जनसँख्या की पसंद, स्वतः ही श्रेष्ठ विवेक को नष्ट कर देगी। धीरे-धीरे दीर्घ जनसँख्या में प्रचलित निम्न, अपवित्र ,अस्वच्छ आचरण ही सामाजिक व्यवहार हो जायेगा। स्मरण रहे की प्राकृतिक न्याय की शक्तियां स्वयं ही इस परिणाम को प्रेरित करेंगी।
   इससे बचने के लिए किसी भी प्रजातान्त्रिक समाज को मानव संसाधन और उत्थान की प्रक्रियाएं विक्सित करनी ही पड़ेंगी। यह आवश्यक कदम है किसी प्रजातंत्र को संरक्षित करने के लिए, अन्यथा वह प्रजातंत्र स्वयं से ही निम्न-कुलीन मतदाताओं की शक्ति से चलने वाला उच्च कुलीन धनवानों की प्रसाशन व्यवस्था में तब्दील हो जायेगा।
               इसी को भ्रष्ट पूँजीवाद (crony capitalism) पुकारा जाता है।
       तो संक्षेप में समझे तो बात यह है कि प्रजातंत्र से भ्रष्ट पूँजीवाद में की दूरी ज्यादा नहीं होती है। किसी भी प्रजातंत्र को इस प्रकार की शासन व्यवस्था में बदल जाने में समय नहीं लगता। धन की शक्ति से लोकप्रियता और मानदंडो को प्रभावित कर देना, और इस लोकप्रियता से शासन शक्ति प्राप्त कर लेना - यदि सजगता न हो तब प्रजातंत्र में यह एक सरल मार्ग है।

प्रजातंत्र में अयोग्य लोगों को सत्ता में आने के उतने ही अवसर होते हैं जितने की योग्य गुणवान लोगों को धन की उपलब्धता अयोग्यता को भी परवान चढ़ा सकती है। यहाँ प्रजातंत्र मूर्खतंत्र में तब्दील हो जाते हैं। शिक्षा का अर्थ सिर्फ शैक्षिक उपाधियों में सिमट जाता है - यह भूमि पर कोई विशाल प्रभाव नहीं दिखा पाता है। यह प्रजातंत्र की कमज़ोर कड़ी है। उच्च शिक्षा उपाधियाँ किसी कार्यकुशलता का प्रमाण नहीं रह जाती हैं।

      पाखण्ड प्रजातंत्र में जन आचरण पर हावी हो सकता है। जनता को जानकारी के बोझ से ही भ्रमित करा जा सकता है। जानकारी के प्रबंधन में सबसे महतवपूर्ण कार्य होता है समस्त जानकारियों को संगृहीत करना एवं वर्गीकरण, मानचित्र निर्मित करना। इसमें विपरीतबोधक जानकारियों और संपूरक जानकारियों (Contradictory Information and Complementary Information) को स्पष्टता से चिन्हित करके मानचित्र में स्थान देना आवश्यक क्रिया है। इसके बाद की क्रिया है आवश्यकता के अनुसार जानकारी के बिन्दुओं को रख कर निष्कर्ष निकलना ।
प्रजातंत्र में इस विकट कार्य में जनता को भ्रमित कर देना आसान है। यदि किसी देश की शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त न हो तब यह कार्य अधिक आसानी से हो जाता है। जनता अन्यायपूर्ण , अनैतिक आचरण को भी अनुसरण करने लगती है। प्रजातंत्र में यह संभव है। प्रजातंत्र में भ्रम और मिथ्या का भरपूर प्रयोग होता है। यहाँ प्रचार और विज्ञापन से सच को पराजित किया जाना आसन है।

   प्रजातंत्र अभी तक के मनुष्य के प्राकृतिक व्यवहार से विरुद्ध की प्रसाशन व्यवस्था है। इसे चलाने में अधिक उर्जा लगेगी। यहाँ प्रजातंत्र में लोग गुणों को और अधिक निखारने के स्थान पर दुर्गुणों और सदगुणों में समझौता करवाने की चाल भी चल सकते हैं। प्रजातंत्र में उपलब्ध न्यायायिक समानता का दुरूपयोग अनैतिक और न्यायपूर्ण आचरण वाले लोग समय और अवसर खरीदने के लिए भी कर सकते है कि जब तक न्यायालयों में स्थापीय नहीं हो जाता है कि वह अनैतिक अथवा अन्यायपूर्ण हैं तब तक उन्हें भी नैतिक तथा न्यायसंगत ही माना जाये।
   इसी प्रकार, शक्ति के संतुलन के लिए उपलब्ध  संपूरक विचारों का आपसी संतुलन को विशिष्ट भोग अभिरुचि वाले लोग अच्छाई की बुराई से समझौता कराने के लिए दुरूपयोग करवा सकते हैं।
        कुल मिला कर यह समझ सकते है कि दूर से आकर्षक दिखने वाली यह प्रशासन व्यवस्था -प्रजातंत्र- इतनी सरल और स्पष्ट नहीं है जितना की हमें आभास देती है। अगर प्रजातंत्र में निरंतर नागरिक समीक्षा व्यवस्था कमज़ोर हो जाए तो प्रजातंत्र अपने घोषित उद्देश्यों के ठीक विपरीत कार्य करने लगता है। सबसे बड़ा खतरा यही है की जब यह व्यवस्था प्रदूषित हो कर विपरीत दिशा में बढने लगती है तब भी इसकी आह किसी को भी समय पर नहीं मिल पाती है जब की सामजिक हानि आरोग्य विहीन पहले ही हो चुकी होती है।

Supreme Court inhibits the Transparency

Within a short span of time, the Supreme Court has twice delivered in favour of Privacy and Secrecy, where the Transparency should have been upheld, instead. 
Transparency represents Public Conscience. Secrecy and Privacy provide that necessary Obfuscation which the Corruption so badly needs to keep itself going.
The Supreme Court of India has acted a house of Stupids and Idiots. Its behavior has proven the veteran lawyer Ram Jethmalani's criticism of court, that there is an acute ''intellectual bankruptacy'' in the Judges who preside over these courts of India.
India therefore is a proven Idiocracy, surviving itself in the guise of a Democracy. The socio-economy conditions stand as a on-ground testimony to this argument.
  The case of Supreme Court endorsement to CBI Director Mr Ranjit Sinha not disclosing his Visitor's Log on the reasoning of Right to Privacy, and now the same Supreme Court sponsored guard of secrecy to disclosures of Blackmoney account holders name reveal too much about the India government system and the link between the Judiciary and the Executive wings , which betray the claims of Independent Judiciary in India.
Indeed, the official stand in the Government and the Parliament of India in regard to the appointment of Judges endorses the theories of the Parliament that the Executive wing headed by the Prime Minister and the Leader of Opposition should have a say in the appointment of Judges of Supreme Court, 'Since the Supreme Court verdicts have a bearing on the Decision made by the Government'.
   Thus, our country is at a point of failure of the administrative system because it does not have two, or more, completely independent Centers of Public Conscience to correct for each other's faults. It is this way that the Political Class stands the tallest, above the rest.

"Intellectual Bankruptacy'' is the new core problem we need to diagnose out, and investigate why the public Conscience which is winning overtime is a crooked, distorted, wicked one. The genuine, moral and ethical conscience is being left groveling in the dust, humiliated.      

For the start, we will have to take notice that our philosophy is controlled by some hypocrites who masquerade away as Spiritual and Religious leaders; those who have least of exposure of cultures and the knowledge comparative studies in various Schools of thoughts. There are hardly any college and universities which offer a curriculum in Philosophy, while some Asaram and Ramdev type ''street doctors''  of various Religions continue to occupy our spiritual thinking Mind.
The system is a failure because it doesn't have Intellectualism. Where Intelligence meets its limitation, the Intellectualism and Rationalism had to take over. What has gotten instead is the emotionalism, which allows for immortality too.
We are a leading stupid and world's biggest ''Idiocracy'', today.

Outweighing the Secrecy and the Privacy against the Transparency : A sureshot indicator of Political Corruption

What the accusers have been calling as the "Shoot and scoot" practise, is the tactical "Unmask the corrupt" method suggested by the leading anti-corruption agencies such as the Transparency International.
   By not letting the Public Conscience to play its part in weeding out the corruption, it is possible for a large syndicate of the politicians and the bureaucrats to create a big "Mafia" to run a parallel government in a country where a majority of the citizen may stand in very denial about the existence of such a mafia.

The Supreme Court ruling on the Blackmoney issue , to weigh out the Right of Privacy of Individuals AGAINST the Necessity to Publically Unmask the Corrupt, will only be working in favour of the big mafia which might be holding grips within our country. Such an action will leave more to be answered, than answering any questions which are already raised. 
  The global treaty on exchange of information is meant to provide inter-governmental transparency to reign in the tax evaders. It is shocking that the Government is using, rather ABUSING, the secrecy clause of the same treaty to defend the Corrupt.
The Supreme Court, by making a U- Turn on the matter has aggravated the concerns of the Conscience-driven citizens.
The question now is about how will the Public Conscience ever come to discover the involvement of the Politicians and the bureaucrats, a close nexus between them, resulting  in a "mafia-dom", if there be any.
   The secrecy clause of the west do not infringe upon the Public Conscience either while they to respectfully stand to guard the privacy of individual. There, the political and administrative system is to designed to work in such a manner to let the BALANCE OF POWER achieve the balance of Secrecy, privacy and the transparency. The [live] transmissions of the Court proceedings, the inquisition, the parliamentary sessions, et al the designed to ensure that Public Conscience is NOT left dependent on a "second-hand information".
  Over here in India, the Right to Privacy is being EXPLOITED while the system is already bent and twisted to work more of against the Public Conscience. The powers are lying disbalanced to settle in favour of certain class of "rulers", than for the common man individual.
  What is the way out, now, for the Public Conscience in India to know how trustable is their own supreme court? It has held Secrecy and Privacy more paramount than where a Public Conscience should have been served?
And our court has worked this while citing the enactments of the West-operated laws and treaties.
Will the West like to take the burden of assisting the corrupt Indian system to muzzle the public conscience??

SITs on court's order: Idiocy within the courts

In theory, no SIT should be working. The repeated Occurrence of having to form an SIT to investigate matters is a constant reminder to us as to how the Indian System is flawed from the very beginning.
The SIT's are formed to answer to the accusations of two parties , Party "A" (the accused political outfit) making the claims that "accusation on them are a result of political vendetta" , and the Party "B" ( the plaintiff) making the claims that "party in the ruling is in connivance with the guilty and hence it may hamper a fair investigation).
   In India, the solution to such a claim,in recent times, has come as SPECIAL INVESTIGATION TEAM or the SIT. But the flaw of the "mafia" type complete connivance Government and Opposition Political Class continues to infect the SIT too.
  The SIT ,even if working under a court, depend on the members of the parent departments of Government. Their personal interest may still be attached with the Government .
  Secondly, under the claims of secrecy and privacy, the Courts continue to bar the PIL litigants from making access to the PROCESS the SIT may be using. Thus ,the SIT have full chances of suffering in the corruption and provide a botched up reports to the Court to whom they may be reporting. This same report in turn is then made available to the PIL litigant, who then has little chance of seeing the errors and find the points of enquiry from the Courts or the SITs while he may continue to belief to have been wronged.
   The theoretical sense of SIT therefore is that Now the Judge and Accused become merged, leaving very little space for the plaintiff to take further his complain to.
   SIT also make inroads to this high mistaken culture of JUDICIAL ACTIVISM . In as much as the Court are finding the Street Activism as a wrong public behaviour, then so are the case of Judicial Activism and the SIT formation.
  SIT cannot guarantee an unbiased investigation. They simply eliminate away the opportunity from the complainant to accuse neither of the two parties who he may be thinking to be in connivance. This happens because the Court apparently "takes over" the control of Investigations, and then makes itself the prosecutors . Whereas, in truth, the SIT continues to depend on the same faulted the Government employees for the Speciaisation.

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