Showing posts from November, 2019

If the Constitution is being murdered, the fault is within the law code itself

Speak a blunt truth , If you feel the Constitution has been choked , then it is not the fault of the killers, but of the Constitution itself ! Think crudely and with honesty to your ownself. A law , if it fails to protect the people and even itself , the the fault is in the law itself that the writers have not composed it well, perhaps because they were not sufficiently exposed to various fields of human affairs. Maybe the writers of the Constitution  had good experience of the social discrimination, BUT insufficient idea of the INDUSTRIAL workplace unfairness and injustice. They would not know the industrial rules, regulation with the bureaucracy and the government department setups. Therefore the writers failed to produce a law code which may achieve effectively the protection of the citizen class from the evil forces as much as the code failed to protect it's own effective interpretations and the implementation. They just gave us rough draft LADEN with the property of AME

The Socialist Democracy explosive mixture

Do you know that the concept of "DUTIES" of citizen , in the CONSTITUTION of our DEMOCRACTIC country is taken from the erstwhile USSR ? USSR was a SOCIALIST STATE , which has collapsed , maybe under the strains of such policies, and it ceases to exist as of today. It has left behind a legacy of an usurped territory , taken over by corrupt and uncontrollable Political class, which has originated from the Bureaucracy and the secret services . Otherwise, in rest of the world, FREEDOM is suppose to be unrestricted and UNCONDITIONAL. The citizens have the freedom , whereas it is state which is DUTY bound. How many of us realize that this point  is big KICHHADI MIXTURE where the failures of our system are rooted ? #The_Constitution_Day

प्रजातंत्र की दुविधा - मूर्खतन्त्र

*प्रजातंत्र की दुविधा*  - मूर्खतन्त्र प्रजातंत्र की अपनी बहोत सारी सीमाएं है जिनका एहसास हमें सदैव रहना चाहिए। मसलन, न्यायालय अक्सर करके मूर्खता के मुख्यालय में तब्दील हो जाते हैं। क्योंकि अभिव्यक्ति की असीम स्वतंत्रता होती है, इसलिये सवाल तो कुछ भी उठाये जा सकते हैं। इस एक आज़ादी के चलते न्यायलय खुद में प्रजातंत्र में खुशहाली लाने के रोहड़ा बन जाते हैं क्योंकि वह अवरोधक शक्तियों को पोषण देने का मार्ग खोल देते हैं। काम को करना मुश्किल हो जाता है, अवरोध करना आसान। दूसरा, कि कोर्ट  प्रशासनिक सिद्धांतों के विकास को भी बंधित करते हैं, या नष्ट भी कर देते हैं। एक व्यक्ति अपने अनुभव से होता हुआ कोई सिद्धांत पर चलता हुआ एक दिशा के कार्य को आरम्भ करता है। तब तक उसकी सेवा समाप्त हो जाती है, और फिर दूसरा आ कर किसी दूसरे कार्य को करने लगता है जो ठीक विपरीत दिशा वाले सिद्धांतों पर ले जाता है। जनधन व्यय होता है, मगर "किसी के बाप का क्या जाता है"। महंगाई बढ़ती रहती है, मगर यह विषय को कोर्ट की jurisdiction के बाहर होता है, इसमे वह क्या कर सकता है। प्रजातंत्र में खुशहाली आदर्श हालात में यूँ

Olden days dabate of school life - Why Science is a blessing or a curse

पुरानी, स्कूल level की debate है -कि, विज्ञान एक वरदान होती है, या अभिशाप।, इसका निष्कर्ष यही हुआ करता था की विज्ञान तो मात्र एक औज़ार है, अच्छाई या बुराई का चरित्र तो उसको थामने वाले हाथों में होता है - मानवता करुणा भरा, या क्रूरता का। और जब विज्ञान और तकनीकी को थामने वाले हाथ ही क्रूर, हृदय विहीन , मानव संवेदना से विमुख होते हैं, तब विज्ञान और प्रौद्योगिकी पुराने ज़माने के तानाशाहों और जमींदारों से अधिक क्रूर बन जाती है। प्रोग्रोगीकि मानव संवेदना को ही नष्ट कर देती है, Dr Frankstein's monster बन जाती है।  लोग चीखते चिल्लाते रह जाते हैं, और प्रौद्योगिकी एक sound proof, ध्वनि तरंग रिक्त कक्ष बना देती है जिससे की दर्द भरी चीख बाहर ही न निकल सके और किसी को सुनाई ही न पड़े - "किसी और को परेशान न करे"। मानव बुद्धिमत्ता का उद्गम खुद भावनाओं में ही तलाशा गया है। यह जितनी भी प्रौद्योगिकी है, इसके मूल को हम मानव करुणा में देख सकते है। intelligence केवल thinking से नही निर्मित हुई है, बल्कि feeling भी एक अभिन्न अंग रही है। आश्चर्य की बात यह है की विज्ञान आजकल ऐसे लोगों के हाथों म

Technology is a dangerous tool in the country of stupids

Techology produces Idiots ...most dangerous types ...The ones who think they are smart, more smart than anyone else around.And that disastrous thought can kill social wellness more cruelly than what the tyrants and autocrats did in olden days. IIT- Madras has come out with a solution to prevent suicides on the campus - by adding a Spring laden rod system in the Ceiling fans , in all the rooms of the hostel so that anyone attempting to hang by the fans will land up on the Floor That is how cruel the technology can become. It can make you search for a human problem in the inhuman , material world , thereof making the world and the society behave deaf to the cries of a dying soul. Remember that it was an IITian who had proposed the idea of AAdhar and its all-pervasive inter-linking , by doing which ,he thought he could succeed in ending all the corruption within the society . He quietly resigned away as the truth about endless limits of corruption, human Stupidity came upon him. He to

Learning is not about reading the Books; because Books are just the warehouses of the knowledge

It's important to understand in regard to Education, That that act of acquiring EDUCATION is just not about reading and endlessly reading the books. What are books , and what role do they play in the context of Acquisition of Education by a person ? Books are simply the warehouse They neither manufacture the Knowledge, nor do they put to use the knowledge to produce any gainful thing. They simply store the knowledge, for an on-ward delivery to someone , who we ignorantly term as the "learner" This is far from the truth of what is learning. A learner should ideally be a person who can either create the knowledge, or the who can put the knowledge to any kind of use for a gainful purpose. A book-learner is no learner at all. He is just a Kaun Banega Coroepati Winner, or a Civil Servi ces Aspirant !! Whose knowledge never comes to any gainful purpose of the society at all.. except the quirky way the society and its system have taken the belief and devised a way

The 'indiscipline-blaming psychopath'

An indiscipline-blaming psychopath is generally found in offices and work places. His persistent desires is that every subordinate must follow his orders without any questions, without exercising personal choices , thoughts and ideas, lest he accuse that subordinate of "indiscipline".  The summary of the conduct  of an indiscipline psychopath may be spoken of like this: Follow my order blindly, or else I accuse you of indiscipline . The indiscipline-blaming psychopath likes to promotes the idea that ' this country is not progressing, it is such a shabby and chaotic place because the people are not in discipline' . He has absolute belief in the concept of nationalism , (as the way it is understood from the external enemy threat theory), because such a belief hinges on promotion of Militarism , and which in turn promotes the obedience of orders as the virtue of 'discipline', which of course approves in his whimsical understanding and the interpretation

अयोध्या फैसला -- तर्कों के चीथड़ों से तैयार कोट

"न्याय क्या होता है?", इस सवाल को अक्सर jurisprudence विषय मे टटोला जाता है।  तमाम तरह के विचारों के संग्रह में एक जगह सूची में यह विचार भी है कि न्याय कुछ और नहीं, बल्कि जज की मनमर्ज़ी होती है। कोई भी जज अपनी सोच के प्रभाव में रह कर ही किसी निष्कर्ष या न्याय पर पहुंचता है। तो, न्याय वास्तव में किसी भी जज के इर्दगिर्द में उसके जीवन के प्रभाव क्षेत्र में पाए जानने वाले  मूल्यों , संस्कारों , से निर्मित होता है। और फिर , किसी भी जज के मूल्यों , संस्कारों को जान कर हम उसके हाथों लिखे जाने वाले न्याय का पूर्वानुमान लगा सकते है। कहने का अर्थ है कि न्याय आवश्यक नही की सत्य ही हो, हालांकि इच्छित , आदर्श न्याय की परिभाषा यह है उसे सत्य को ढूंढ चुका होना चाहिए । मगर यह परिभाषा एक आदर्श परिभाषा होती है, मात्र एक wishful सोच। व्यवहार में न्याय जज की मनमर्ज़ी बन कर रह जाता है। हमसे-आपसे अपेक्षा करि जाती है कि हम मूढ़ों की तरह सब "स्वीकार" करना सीख लें, और वह चाहे जो भी लिखते रहे। अयोध्या फ़ैसले में भी कुछ यूँ ही हरकरतें हुई है। रंजन "मिश्र" गोगोई ने अपनी मनमर्ज़ी से

अख़बार और टीवी क्यों कभी भी Whole Truth नहीं बताते हैं ?

अखबारों और टीवी के समाचारों का क्या है ..? वो तो शायद चाहते ही नही हैं कि इंसानों में स्वचेतना आये की उचित-अनुचित खुद से तय कर सकें। इसलिये अखबार -या कोई भी समाचार- सिक्के के दोनों पहलुओं से एक साथ परिचय नही करवाते हैं। वह आधी जनता को एक तरफ का पहलू दिखाते हैं, और बाकी आधे लोगो को दूसरे तरफ का। और फिर जब लोग आपस मे ही भिड़ते है, मतविभाजन करते हैं, "राजनीति करते है" , तब ही इन अखबारों की दुकान चलती है। अखबारों या किसी भी समाचार कंपनी के बारे में यह कमी जानी जाती है - कोई भी whole truth नही बताता है। Whole truth जानने की कसौटी आसान नही है। उसमें घटनाओं का अध्ययन करना पड़ता है लंबे अरसे तक। अध्ययन से अभिप्राय है आसपास में रह कर चिंतन करना , विश्लेषण करना , सहयोगियों और विरोधियों के संग तर्क करना , दूसरों के चिंतन लेख पढ़ना । कहाँ , किसके पास टाइम ही होता है कि कोई किसी भी विषय पर इतना सब अध्ययन कर सके। सस्ते में काम चलाने के लिए अखबार कंपनी सिर्फ उसी की बात छापती हैं जो उनको पैसे देता है। मगर इस तरह के अखबारों को पढ़ कर आप आत्मविकास ,आत्मसुधार की अपेक्षा नही करिये। आप को स्

Words to ponder : Consciousness and Conscientiousness


Ego never accepts the truth

(copyrights neither owned, nor claimed)

भारत की संस्कृति में स्वेच्छा का अभाव , और मालिक नौकर संबंध में गड़बड़ का मूल

जब मै SCI में था, और उसके बाद private foreign companies में काम किया, एक बड़ा अंतर यही महसूस किया है, कि free will यानि * स्वेच्छा * को conserve कर सकने की क्षमता भारत के सरकारी तंत्र में बहोत निम्म और कमज़ोर है। * स्वेच्छा * की कमज़ोरी के  चलते employee और employer में एक game आरम्भ हो जाता है। employer काम को वसूलने की चालें चलता है, और employee(या worker) 'गाला मारी' की कोशिश करते हुए काम करने से बचने की। Employer पैसे कम देना चाहता, या इतने पैसे में कहीं अधिक काम वसूलना चाहता है। employee कम तनख्वा की शिकायत सदैव पालते हुए कम काम करना चाहता है, या अक्सर तो optimal से भी कम करते हुए कामचोरी कर देता है। मामले की जड़ भारत के तंत्र में " स्वेच्छा " की गड़बड़ से है। भारत की संस्कृति में " साम, दाम, दंड , भेद " का चलन है। यानी " स्वेच्छा " का सम्मान तो संस्कृति के अनुसार ही संभव नही है। यह दशा पश्चिमी संस्कृति के ठीक विपरीत है। भारतीय संस्कृति में मालिक-नौकर सम्बन्ध का अस्तित्व नही होता है। यहां भगवान राम और भक्त हनुमान वाला सम्बंध है। जिसमे स्वेच

ब्राह्मणी शास्त्रार्थ कला में sophistry का प्रयोग

भक्त लोग मोदी जी और भाजपा की जीत को मोदी जी के क़ाबिल नेतृत्व साबित करने में लगे रहते है।।भक्त ज़ाहिर है कि evm को नही मानते हैं, और साजिशन विपक्ष को evm के प्रति शिथिल करने के लिए भाजपा की प्रचंड जीत को मोदी के काबिल नेतृत्व, विपक्ष की नाक़ाबिल नेताओं के सहारे justify करते हैं। यह एक चिरपरिचित तरीका है। आप खुद से देखेंगे कि कश्मीर से धारा 370 को हटाने के संग ही  भक्त वर्ग और उनके टीवी चैनल यही साबित करने लगे हैं कि कश्मीर लोग खुश हैं, बल्कि वह लोग मोदी जी का धन्यवाद कर रहे हैं। अब ट्रीपल तलाक़ में भी देखिए। भक्त लगातर यही साबित करने के दावे दे रहे हैं कि मुस्लिम महिलाएं खुश हैं। Demonetisation को याद करें। भक्त लगातार दावे कर रहे हैं थे कि आतंकवाद की रीढ़ टूट गयी है, काला धन खत्म हो गया है। पिछले युग मे जब ब्राह्मणों ने तंत्र पर काबिज़ हो कर बढ़त बनाई थी, तब भी यही दावा किया था कि पिछड़े और दलित वह वर्ग है जिनके यहाँ पढ़ाई-लिखाई कर सकने के दिमाग़ ही नही होता है। और बाद में जब आरक्षण नीति के माध्यम से दलित -पिछड़ा तन्त्र में आ बैठे और अपने को काबिल साबित करने लगे, तब ब्राह्मणों ने बात क

Rule of law बनाम Good Conscience प्रशासन और न्याय व्यवस्था

*Rule of law बनाम Good Conscience प्रशासन और न्याय व्यवस्था * Rule of law व्यवस्था के आने से पूर्व जो न्याय व्यवस्था थी , उसे हम good conscience व्यवस्था बुला सकते हैं। इसमे न्याय का आधार हुआ करता था "अंतरात्मा की आवाज़", स्वचेतना। आपको अभी तक इस पुरानी व्यवस्था के प्रति सुनने में कहीं कुछ ग़लत नही लगेगा। मगर इसकी खामियां आप बन्द आंखों से सोचिये। पुरानी व्यवस्था में प्रत्येक न्याय विवादों से घिरा रहता था। क्योंकि अंतरात्मा की आवाज़ हर इंसान की अलग अलग होती है !! तो हर एक न्याय , हर एक फैसला आरोप में घिरा हुआ था कि यह भेदभाव किया गया है, वह पक्षपात हुआ है ! असल मे समाज में भेदभाव और पक्षपात का जन्म ऐसे ही न्यायों में से हुआ है। कुछ न्यायिक फैसले असली में भेदभाव को जन्म देते है, कुछ आभासीय जन्म देते है जहां आरोप और विवाद हुआ होता है। Christian secularist यहां ही सभी समाज से आगे की सोच सके, और दुनिया से सबसे सशक्त समाज और राष्ट्र को जन्म दे सके। उन्होंने good conscience न्याय व्यवस्था की जगह rule of law की ओर रुख किया। असल न्याय का स्रोत तो आज भी good conscience ही है, मगर बी

Standardisation brings to end the Politics in the collective decision making work

At one point Devdutt says " swadanusar ".. And scoffs at it that the word explains our culture in shortest, simplest idea .. I apply the word _ Khichadi _ to mean the same. The different meanings of _ Dharma _ is what is the ado over here. And the comic relief is that the root of different meaning and interpretation of Dharma is a result of that single idea alone - " _* Swadanusar *_ " or the _ Khichadi _ Truth is that we as a culture have made almost no efforts to bring about * standardisation *. We have lived with _* Mixing up *_ A _ khichadi _ is a terrible mix-up of lots of ingredients. A _ swad anusar _ describes lack of * standardisation * , suggesting that each person is free to work as his own choice and can make endless argument to assert the supremacy of his interpretation over the other, instead of finding the _* conversion factor *_ between two different * standards * , which is often a positive result of the efforts of * standardisation * A m