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Don't suffer from Nostaligia

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छोटे बालको को कंप्यूटर का इतिहास पढ़ाया जाना क्यों जरूरी होता है ?

कंप्यूटर का इतिहास जानना क्यों आवश्यक होता है?  कभी आप एक प्रयोग करके देखिए :– छोटे बच्चों (करीब दस से बारह साल आयु वाले) से पूछिए कि,  'coding क्या होती है?' और फिर इन बच्चों से बारी बारी से जो कुछ भी जवाब मिलता है, उसको इकात्रण करिए। उनको थोड़ी देर के लिए आपस में कुछ बहस करने के लिए छोड़ दीजिए कि वे एक दूसरे के विरुद्ध खुद के जवाब को सही साबित करने की कोशिश करें; एक दूसरे के जवाबों का माखौल उड़ाए; एक दूसरे से अधिक श्रेष्ठ, बुद्धिमान पुरुष होने की कोशिश करें।  आप बस बैठ कर आनंद लीजिए, और उनके प्रयासों का खाका बनाते रहिए।  अगर अग्नि शांत होती दिखाई पड़े, तो वापस कुछ नया घी डाल दीजिए, कोई नया सवाल पूछ कर, जैसे कि, ' कंप्यूटर क्या होता है?'  उनके जवाबों में से ही कोई नया टांग खींचने वाला सवाल निकल लीजिए, जो उनको कुछ सोचने पर मजबूर करता रहे कि आखिर सही जवाब क्या हो सकता है।  आप एक बात गौर कर पाएंगे, शायद – कि, कितना जटिल काम होता है बच्चों को ये समझा सकना कि computer क्या होता है, क्या नहीं ; कंप्यूटर के प्रयोग से क्या क्या काम हो सकता है, और क्या क्या नहीं। ...

साहित्य (यानी कहानियां , कविताओं, फिल्मों, टीवी नाटकों , उपन्यासों इत्यादि) को छोटे बच्चों को कैसे पढ़ाया जाना चाहिए?

साहित्य (यानी कहानियां , कविताओं, फिल्मों, टीवी नाटकों , उपन्यासों इत्यादि) को छोटे बच्चों को कैसे पढ़ाया जाना चाहिए?  साहित्य पढ़ाने का उद्देश्य क्या होता है?   हिंदी cartoon, वीर द रोबोट boy , और जापानी कार्टून डोरेमॉन, या s inchan में क्या अंतर है?    भारतीय संस्कृति में साहित्य के पठान का उद्देश्य बच्चों को किसी विशेष सोच, संस्कृति, नैतिकता, और धर्म को स्मरण करवाना होता है। जब हम भारत में निर्मित हुए छोटे बच्चों के टीवी वाले cartoon कार्यक्रमों, जैसे की vir the robot boy को देखते हैं और फिर उनकी तुलना किसी अन्य देश (अथवा संस्कृति) से करते है, जैसे की doreamon (जापानी) तब आपको इस भेद का आभास खुद ब खुद होने लग जाता है। जापानी कार्टून अपने बच्चों के जहन (conscience) में कोई पूर्व निर्धारित नैतिकता, धर्म या सही–गलत प्रवेश करवाने की चेष्टा नहीं कर रहे दिखते हैं, जबकि भारतीय कार्टून ऐसा करते महसूस किए जा सकते हैं।   मातापिता की अपने बच्चों से कुछ अपेक्षा होना जाहिर बात है और जो कि सभी देशों की संस्कृतियों में प्रायः दिखाई पड़ती है। अंतर सिर्फ ये है क...

बच्चों की शिक्षा के प्रति मातापिता के लिए नया, उभरता उत्तरदायित्व

ज्यों ज्यों इंटरनेट पर अकादमी विषय ज्ञान का संग्रह बढ़ता जा रहा है, त्यों त्यों competitive exams भी मुश्किल होते चले जा रहे हैं। आज मातापिता की मुश्किल ये नही है कि किताबें महंगी है। मुश्किल है कि इतने सारे ज्ञान को अपने बच्चों में सोखा कैसे जाए।   बच्चों की मित्रमंडली और दिनचर्या को प्रतिदिन ज्ञान को सोख सकने के अनुकूल बनाए रखना वास्तविक चुनौती हो चुकी है। Coaching classes, online study courses, का बाजार खड़ा हो चुका है। और सभी कि उस तक पहुंच बन चुकी है। बच्चे में बाज़ार के ज्ञान को सोखते हुए अपनी रचनात्मकता को बनाए रखना भी एक चुनौती बन गई है बाजार में रखा अकादमी ज्ञान भेड़चाल को बढ़ावा दे रहा है। बच्चे अब पहले से और अधिक run–of–the–mill "श्रेष्ठ ज्ञाता" बन जा रहे हैं। Unsolved mysteries, unknown questions, puzzles को सुलझाने में बौद्धिक क्षीर्ण। ऐसा होने से बचा लेना मातापिता के नया, उभरता उत्तरदायित्व है।

अच्छे अध्यापक कैसे होते हैं? उनके चरित्र में क्या क्या चिन्हक होते हैं, एक अच्छे अध्यापक होने के?

अच्छे अध्यापक कैसे होते हैं? उनके चरित्र में क्या क्या चिन्हक होते हैं, एक अच्छे अध्यापक होने के? अच्छे अध्यापक का सर्वप्रथम चारित्रिक चिंहक होता है विशाल क्षेत्रों का ज्ञान, और जिसके प्रयोग से वो अध्यापक दर्शनशास्त्र के गहरी, अघियारी भुलभुलैया गलियां में उतरने से भयभीत नहीं होता हो, शिष्य को प्रश्नों के पूर्ण व्याख्यान समाधान खोजने के लिए ताकि उसका शिष्य विषय की वास्तविक mastery प्राप्त कर सके, न कि सिर्फ परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाए। अब आगे, किसी भी व्यक्ति में यदि व्यापक ज्ञान आएगा, तब वो अपने आप में कुछ व्यवहारिक झलक दिखाने लगेगा — जैसे, समानता का भाव, अनुशासन पूर्व जीवन यापन, रोचक वर्तपालाप, अनुभव तथा कहानियां से भरा हुआ संवाद करना, इत्यादि।

शिक्षा प्राप्ति के दौरान व्यवहारिक नीत क्या होनी चाहिए?

कई सारे आधुनिक शिक्षकगण थोड़ा " व्यवहारिक ( Practical )" हो कर बात करने लगे हैं, और वे लोग परीक्षा में उत्तीर्ण हों जाना उचित मापक मानते हैं, पढ़ाई लिखाई के उद्देश्य की सफलता पूर्वक प्राप्ति का।  जीवन एक आर्थिक संघर्ष होता है, – की दृष्टि से वे लोग गलत नहीं हैं। मगर ऐसी सोच रखने पर जीवन संघर्ष में केवल जी लेना और चुनौतियों को पार लगा लेना , दो अलग बाते बन जाती हैं। जीवन की चुनौतियों को पार करने के लिए " व्यवहारिक(Practical) " स्तर का ज्ञान चाहिए होता है — और जो पढ़ाई लिखाई के दौरान ' विषय की प्रखरता (Mastery of the subject) ' को प्राप्त करने से आता है, सिर्फ exam में उत्तीर्ण हो जाने से नहीं। सोचने का सवाल है कि — 1) आप " व्यवहारिक " किसे समझते हैं। 2) आप शिक्षा प्राप्ति के दौरान किसे अपना उद्देश्य मानेंगे— a) Mastery of the subject;      b) Passing the exam with excellent grades  आगे,  इस दोनो सवालों की गुत्थी हमे ये बताती है कि क्यों कई सारे लोग अच्छे grades वाली markssheet के बावजूद बेवूफ होते हैं, और कई सारे लोग विषय में बिना किसी उपाधि रखत...

रामप्रसाद की मां उसकी पढ़ाई लिखाई में क्या भ्रष्टता कर देती है अनजाने में

रामप्रसाद की मां उसकी पढ़ाई लिखाई में क्या भ्रष्टता कर देती है अनजाने में  रामप्रसाद की मां उसकी शिक्षा दीक्षा में ऐसा करती थी कि केवल syllabus के अनुसार और कि परीक्षा में क्या पूछा जाने वाला है, बस उतना ही तैयार करवा देती थी कैसे भी, ताकि उसका बच्चा exam में पास हों जाए अच्छे नंबरों से।  कुछ गलत नही था मां की चाहत में, अपने बच्चे के प्रति। मगर मां को अभी अनुमान नहीं था कि पढाई लिखाई के दौरान किसी विषय की mastery करना, वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना कैसे एक अलग प्रक्रिया होती है, मात्र exam पास कर लेने भर के प्रयासों से। ये भी अनुमान नहीं था कि वास्तविक ज्ञान या mastery प्राप्त करना क्यों उसकी संतान के हित में था, भविष्य की शिक्षा दीक्षा के लिए आवश्यक था अभी से ही वैसे तर्क, प्रयत्न करने की आदत डालने के लिए। मां के अनुसार तो दुनिया का व्यवहारिक सत्य यही था कि जो बच्चा परीक्षा अच्छे नंबरों से पास करता है वही आर्थिक संघर्ष में विजयी होता है, अच्छी नौकरी पाता है, अच्छी तनख्वा कमाता है।  मगर ये सब सोच – आर्थिक संघर्ष में विजई हो जाने वाला भविष्य का परिणाम– कैसे गलत थी , ये अभी मां को अनुमान न...

Dunning Kruger Effect या देहातों में जाना जाने वाला Over Confidence

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Dunning Kruger Effect जिसे गाँव देहात में लोग overconfidence केह कर बुलाते है, ये स्वभावतः ज्यादातर इंसानों में उनके बचपन से ही मौज़ूद होता है। कोई भी व्यक्ति स्वयं की क्षमता और योग्यता का सटीक अनुमान बिना उपयुक्त अभ्यास के, नहीं कर सकता है। मगर अक्सर इसके निराकरण में लोग दूसरे का माखौल उड़ा कर, या लज्जित करके छोड़ देते हैं कि शायद बेइज्जती और आत्म ग्लानि से परेशान हो कर वो कुछ सोच पड़ेगा और सुधर जायेगा !!! जबकि ये तरीका सच्चाई से बहोत दूर ,शायद विपरीत है। सही तरीका है बार बार ,अभ्यास परीक्षणों से गुज़ारते हुए स्वयं की योग्यता और क्षमता को सटीक से आंकलन करने का माप तैयार कर  लेना

Rules for sons

RULES FOR SONS: (किसी पिता के द्वारा अपने पुत्र के लिए रचे गए  नियम)  1. Never shake someone's hand while you are in a seated position. कभी भी किसी से बैठे हुए शरीर अवस्था में हाथ नहीं मिलाना।  2. Don't enter a pool by the stairs.  कभी भी तैराकी के पूल में कदम चलने वाली सीढ़ियों से मत उतरना।  3. Being the man at the BBQ Grill is the closest thing to being king. किसी भोज आमंत्रण के समय अतिथेय करने का जो अहसास होता है, वो वास्तव में किसी देश के नरेश होने के अहसास से सबसे समीप होता हैं।  4. In a negotiation, never make the first offer. किसी भी व्यापारिक लेन–देन की प्रस्ताव ले दौरान तुम कभी भी पहले ही offer मत रखना। 5. Request the late check-out. किसी भी होटल में रुकते समय आरंभ में ही निवेदन रख देना की check out करने के समय तुमसे थोड़ा सा विलंब हो  सकता है।  6. When entrusted with a secret, keep it. यदि कभी कोई आपसे अपने मन की बात, या कोई गुप्त बात सांझा करता है, तब उक्त बात की गोपनीयता सदैव बनाए रखना।  7. Hold your heroes to a higher standard. ज...

Distinguishing between Business, Profession and Service

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Ordinarily we all depend on English dictionary, from where we acquire a knowledge that  Profession  and  Service  mean one and the same thing. But in deeper academics, there is a distinguishing between these.

Commentary on the case of Mumbai University students, 1 of 3 student seeking a revaluation

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1 in 3 univ students applies for revaluation Unfairness and Wrong are not one and the same thing. On Internet (google), Fairness is defined as : not fair; not conforming to approved standards, as of justice, honesty, or ethics: an unfair law; an unfair wage policy. 2. disproportionate; undue; beyond what is proper or fitting: an unfair share. As we can see from the definition, the meaning of unfairness cannot be easily assumed to be Wrong. Unfairness is about something being not proportionate. This implies that it does not necessarily means something which is disproportionate is purposefully wrong. Human life is filled with instances, belief , judgements, which cannot be accurately measured. They are called Subjective evaluations. Every person can hold different proportion of his evaluation on these matter.   That means, merely because one’s evaluation does not meet the other’s standards , it should not be called out as Wrong .   There, we stumb...

Comparison : standard examination procedure of any university versus the DG Shipping

In a general system as practised in any university at random, the following features ensure that fairplay is not dismissed while a student is being evaluated, by any reason of prejudice or favoritism Processes which ensure that prejudices and favoritism of the Examiner towards any candidate do not have a room to become active :-- 1) The rules of the examination provide for a specially coded hall-ticket number to every candidate. This ensures that each candidate's identity is concealed so to prevent prejudices of the Examiner to become active. 2) Candidate are told not to reveal their identity in any form on the answer sheet. It enhances the above process. 3) The answer-sheets are given secondary coding, preferably by OMR computer. This puts a double-lock on the identity information, such that the Examiner has no means to detect the identity or even the hall ticket information. Processes which ensure that the Examiners are not inclined to fail the candidates for monetary gains ...

Lord Macaulay was probably indulging in polemics when he uttered these words

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Lord Macaulay was probably indulging in polemics when he uttered these words

अंतःकरण, आदर्शवाद और बुद्धिमता गुणांक(IQ)

बिना सिद्धांतों के करी जा रही राजनीति के लिए सही शब्द कूटनीति है। कूट का अर्थ है छल, भ्रम, धोखा । आखिर कूटनीति का मानव मनोविज्ञान पर क्या असर पड़ता है?    दीर्घ अवधि में कूटनीत...