रामप्रसाद की मां उसकी पढ़ाई लिखाई में क्या भ्रष्टता कर देती है अनजाने में


रामप्रसाद की मां उसकी पढ़ाई लिखाई में क्या भ्रष्टता कर देती है अनजाने में 

रामप्रसाद की मां उसकी शिक्षा दीक्षा में ऐसा करती थी कि केवल syllabus के अनुसार और कि परीक्षा में क्या पूछा जाने वाला है, बस उतना ही तैयार करवा देती थी कैसे भी, ताकि उसका बच्चा exam में पास हों जाए अच्छे नंबरों से। 

कुछ गलत नही था मां की चाहत में, अपने बच्चे के प्रति। मगर मां को अभी अनुमान नहीं था कि पढाई लिखाई के दौरान किसी विषय की mastery करना, वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना कैसे एक अलग प्रक्रिया होती है, मात्र exam पास कर लेने भर के प्रयासों से।

ये भी अनुमान नहीं था कि वास्तविक ज्ञान या mastery प्राप्त करना क्यों उसकी संतान के हित में था, भविष्य की शिक्षा दीक्षा के लिए आवश्यक था अभी से ही वैसे तर्क, प्रयत्न करने की आदत डालने के लिए। मां के अनुसार तो दुनिया का व्यवहारिक सत्य यही था कि जो बच्चा परीक्षा अच्छे नंबरों से पास करता है वही आर्थिक संघर्ष में विजयी होता है, अच्छी नौकरी पाता है, अच्छी तनख्वा कमाता है। 

मगर ये सब सोच – आर्थिक संघर्ष में विजई हो जाने वाला भविष्य का परिणाम– कैसे गलत थी , ये अभी मां को अनुमान नहीं था । आगे के स्तर पर परीक्षाओं में कोई syllabus नहीं होता है, केवल topics होते है। और कोई set, पूर्व निर्धारित प्रश्नावली भी नही होती है। और ऐसा सब कुछ जीवन के असल हालातों के अनुरूप ही तो होता है। जीवन कोई पूर्व निर्धारित syllabus के अनुसार चुनौतियां नही प्रस्तुत करता है हमारे आगे। छोटे बच्चे रामप्रसाद को ये सब कैसे मालूम चलेगा यदि उसकी मां ही उसको तैयार नहीं करेगी भविष्य में आने वाले जीवन संघर्ष के लिए। 

हालांकि कि मां की सोच पूरी तरह गलत नही थी। तभी तो अक्सर करके समझदार बच्चे लोग साल भर की पढ़ाई की दौरान अधिकतर समय तो वास्तविक ज्ञान को ग्रहण करने की पद्धति के अनुसार पढ़ाई लिखाई करते है। मगर exam की पूर्व संध्या पर अपने रवैये में थोड़ा सा बदलाव करके व्यवहारिक बन जाते हैं, तथा exam pass करने के अनुसार रट्टा लगाने लगते है।। मगर ये सदैव ध्यान रखते हैं कि वर्ष काल में तो वो सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने हेतु ही प्रत्यनशील बने रहें। 

स्कूल में अध्यापकों को, और घरों पर माता पिता को, अपने बच्चों में पढ़ाई लिखाई करने के तरीके को इसी सोच के अनुसार विकसित करना चाहिए। कि वह विषय में mastery प्राप्त करने अनुसार अध्ययन किया करें। 
किताबों में notes बनाएं, पेंसिल से, सवालों को हल करें, और अनसुलझी पहेलियों और सवालों के समाधान की खोजबीन करते रहें अन्य स्रोतों से। आजकल ये सब मोबाइल ,इंटरनेट और गूगल के प्रयोग से आसान भी हो गया है। तो फ़िर इसी को करना भी चाहिए, बजाए की हम हर पल केवल क्रोधित को कर internet, Mobile को अभद्र शब्द बोलते रहे। और उनके सदुपयोग के लिए स्वयं में तब्दीली ही न लाएं। 

किसी नई भाषा के विषय ज्ञान को प्राप्त करने के दौरान इंसान को बहुत कुछ सोचने को, मंथन करने को मिलता है, और जो मंथन उसे शब्द, भाषा और इनसे उत्पन्न होने वाले बौद्ध के प्रति तैयार करता रहता है। ज्ञान और बौद्ध एक समान विचार नहीं होते है। ज्ञान अक्सर केवल तथ्य संबंधित होता है। मगर ये आवश्यक नहीं होता है कि जिस व्यक्ति में ज्ञान है, उसको उस ज्ञान में से उसका बौद्ध प्राप्त हो ही गया हो। Infornation creates Knowledge। ये प्रक्रिया तो आसानी से ज्यादातर व्यक्तियों को एक से दूसरे हस्तांतरित करी जा सकती है। मगर Knowledge leads to Concepts वाली क्रिया ये प्रत्येक व्यक्ति में केवल स्वत स्फूर्त हो कर ही घट सकती है। इसे कोई भी माता पिता, या अध्यापक हास्तांतरिक नहीं कर सकते हैं, एक से दूसरे व्यक्ति हो ।

Concepts can not be taught. Concepts can only be caught. 

Concepts, यानि प्रत्यय, इंसान में बौद्ध के जागृत होने से पकड़ में आने लगते हैं। Concepts को ग्रहण करने में चुनौती होती है कई कई बार, शायद अनगिनत बार, सही और गलत का न्याय करते रहना उस विषय ज्ञान में। Concepts को जानने के लिए इंसान को अनेक दिशाओं से विषय को देखना पड़ता है। ऐसा कर सकना एक जटिल बौद्धिक निवेश होते है, जो शायद हर एक इंसान नही कर सकता है। केवल विरलय बुद्धि वाले, अत्यंत बुद्धिमान लोग जो बेइंतेहान संयम रखते है, और सत्य ज्ञान की तलाश के दौरान शांत व्यवहार रखने हों , बस वो ही ऐसा कर सकते है। Concepts शायद सिर्फ ऐसे लोगो को ही पकड़ में आ पाते है। 

प्रत्येक मां को अपने बच्चों को बचपन से ही Concepts को पकड़ सकने के अनुसार सुसज्जित करना चाहिए। इस दिशा में प्रथम क्रिया होती है — व्यवहार, और फिर, उसकी आदतें।

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