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Showing posts with the label Yug Chetna

गैर–ब्राह्मण हिंदू समाज में ब्रह्म की पूजा क्यों नहीं करी जाती है

कहते हैं की गैर–ब्राह्मण हिंदू समाज में ब्रह्म की पूजा नहीं करी जाती है। धरती पर सिर्फ एक ही मंदिर था, पुष्कर (राजस्थान) में, जहां कि ब्रह्मा की पूजा होती थी। जानते हैं क्यों? पुराने लोग आपको बताएंगे कि तीनों महादेवों में सिर्फ ब्रह्म जी की ही पूजा नहीं करी जाती है क्योंकि उन्होंने एक बार झूठ बोला था । मगर आजकल ऐसा नहीं है। दरअसल ये चलन टीवी के युग में चुपके से ब्राह्मणों ने साजिश करके बदल दिया है ! क्योंकि ब्राह्मण लोग खुद को ब्रह्म की संतान बताते हैं, तो फिर वो कैसे अपने परमपिता, ब्रह्मा, की संसार में ऐसी अवहेलना होते देख सकते हैं। इसलिए उन्होंने थोड़ा हिंदूवाद, धर्म-पूजा पाठ, आस्था का चक्कर चलाया और नई पीढ़ी को हिंदू – मुस्लिम करके बेवकूफ बना लिया है। पुराने लोग आपको शायद ये भी बताते कि कैसे हिंदुओं का कोई भी त्रिदेव अवतार जिसकी पूजा हुई है संसार में, वो ब्राह्मण वंश में नहीं जन्मा। और यदि किसी त्रिदेव ने ब्राह्मण वंश में जन्म लिया भी, —तो फिर उसकी पूजा नहीं करी गई संसार ने। जैसे कि, — राम चंद्र जी — विष्णु अवतार, क्षत्रिय वंश में थे, और संसार में पूजा होती है भगवान क...

The origins of the Uniform

The origins of the Uniform Uniforms originated , not from the defense forces or any other type of the force unit of the people . It started from the professionals , back in Europe . Professionals are those people who earned their living by giving service-good to the people , such as the work in carpentry, the iron smith, hides men, mason, the tailors, and so on. These people used to wear a kind of dress so to advertise that they were sellers of certain kinds of  commodity or good  ,in the form of specialised  skill . It is better understood as  service-good . Earlier , the formation of military forces was not regular . The farmers and their young sons were forcefully   taken up by the local Feudal Lords and just given some weapons and sent away to fields to fight, without being given any training. The problem was no one would know which side the other person , that they were fighting and hitting by their weapons, belonged with. The pro...

Safety professionals and the clerk-skill led bureaucracy

There is something about safety which I have learnt after so many years of seafaring . That , the very concept of safety by its nature is pitched against the business profits. Look at all the safety items you see around yourself on the Merchant ships. The lifeboats, the liferafts, the EPIRBS, the SARTs, ...you name it, everything. Have you ever considered the worth of these items from the point of view of a finance manager? If you ever do, you will notice that all of these items are a waste of money, a reduction in the profits of the business. The challenge of all the argument that come to promote the cause of Safety is that they deal in the imaginary and unseen, unheard events for the finance manager and other non-seagoing people. So it is always difficult to argue out how something is important, particularly when the argument have to contest their battle against the business profits by using scenarios which they may have hardly experienced from the comforts of their offices...

IAS Association की सोच क्या है भारतीय समाज को प्रजातांत्रिक प्रशासन व्यवस्था मुहैया करवाने के प्रति

तो जब private sector से लोगों को सरकारी क्षेत्र में सीधे सयुंक्त सचिव लिया जाने लगा है तो हमारे देश के नौकरशाह associations की माँगे हैं की IAS को भी sabbatical जैसी अवकाश की राहत दो कि निजी क्षेत्र में कुछ वर्ष कार्य के वापस IAS में join कर ले ! यानी सरकारी ज़मीदार साहेब लोगों को अपने पद के profits भुनाने के और अवसर दिये जाएं ! सरकारी सेवा अब सामाजिक हितों के किये त्याग नही, बाकायदा भोगवादी निजी मुनाफे का धंधा है ! आलम यूँ है कि हमारा प्रजातंत्र चूंकि हमारे विशिष्ट ब्रिटिश राज उपनिवेश तथ्यों की वजहों से उल्टे विधि पैदा हुआ है, इसलिए हमारे नौकरशाहों की खोपड़ी भी उल्टी ही है। उनके अनुसार प्रजातंत्र का वरदान सिर्फ IAS/IPS लोग है, न कि देश का आम आदमी जो समाज की दैनिक ज़रूरते पूरा करते हुए अपना व्यवसाय करता है ! कहने का मतलब है कि राजगीर मिस्त्री, बढ़ई, वेल्डर, लोहार , ग्वाल , किसान, चमड़े के कारीगर, motor गाड़ी के चालक, हवाई pilot ,समुद्री नाविक इत्यादि से कोई प्रजातंत्र नही बनाते है।इसको प्रजा तंत्र वरदान की क्या  ज़रूरत।  और प्रजातंत्र तो बनता है सिर्फ IAS या IPS लोगों से ...

नौ निजी क्षेत्र से लिए संयुक्त सचिव और दलित पिछड़ा चिंतकों का IAS सेवा का बचाव

पिछड़ा और दलित वर्ग के चिंतकों की आलोचना अभी ज़ारी रखनी होगी। यह Social Justice Lobbyists , इनके मीडिया घराने और पत्रकारों की समस्या शायद यह है की कई सारे लोग "IAS की तैयारी" वाली बीमारी से होते हुए इन पेशों में आये हैं और उस बीमारी से अभी तक उभर नही सके हैं। इसलिए उनके मूल्यांकन में मोदी सरकार ने अभी जो नौ निज़ी क्षेत्र के कर्मियों को सीधा संयुक्त सचिव पद पर लिया है, यह समस्या इसलिए है कि इसमे आरक्षण नही है। या कि यदि प्रधानमंत्री कार्यालय से IAS अधिकारी "पलायन" कर रहे है तो समस्या है की नौ निज़ी क्षेत्र कर्मियों को सीधे उस पदस्थान पर ले लिया है जहां ias को पहुंचने में 17 वर्ष लगते हैं। असल में आरक्षण नीति का एक प्रकोप हमारे समाज पर यह पड़ा है कि पिछड़ा और दलित वर्ग के लोग आरक्षण का लाभ उठाने के चक्कर में IAS की तैयारी में लग गये हैं और यह आर्थिक सामाजिक चक्र की जरूरतों के अनुसार एक बीमारी है, प्रगति का मार्ग नहीं। और फिर जो लोग IAS की 'कठिन परीक्षा" को भेद नही सके हैं वह आजीवन उससे मंत्रमुग्ध पड़े 'बीमारी' का प्रसार करते रहते हैं, उस सेवा का बचाव करत...

संविधान सुधार की चाहत के विषय में स्पष्टीकरण

संविधान को बदलने के विचार कई सारे नेता बोल रहे हैं, और इस बिंदु पर भी राजनीति गरम होने लगी है। ऐसे में आवश्यक हो चला है की कुछ स्पष्टीकरण हो जाये की क्या-क्या बिंदु स्वीकृत हैं, और क्या-क्या नहीं। सर्वप्रथम तो यह जानना ज़रूरी है कि भारत के संविधान का बहोत बड़ा गुण है ही यह की इसे समय की ज़रूरतों के अनुसार बदलाव किया जा सकता है। Amendability. तो इसमे तो कोई विरोध नही किया जाना चाहिए की बदलाव की चाहत एक जायज़ मांग है खुद संविधान की मंशा के नज़र से भी। अब कुछ इतिहासिक ज्ञान। कि, संविधान के स्वरूप से पूर्ण रूप से संतुष्ट तो खुद बाबा साहेब भी नही थे। उनको भी आभास था की संविधान से कई सारे असंतुष्ट वर्गों की जायज़ मांगो को पूर्ण नही कर सके थे। उन्होंने भी आशा जताई थी की भविष्य में शायद उनके संविधान की amendability के गुण के सहारे कभी कोई ऐसा ढांचा तलाश कर लिया जायेगा जिसमे सभो वर्गों की जायज़ मांगो को शायद संतुष्ट किया जा सके।  तो यहां बदलाव में जो स्वीकृत किया जा सकता है वह यह की  देश की जनता ने आपसी संकल्प के कुछ मूल्यों को इन सत्तर सालों में इस तरह अपना लिया है की अब शायद उन्हें बदल...

Marketing रणनीतियों की विद्या और चुनाव प्रचार

कल्पना करिए कि आप एक Marketing Professional हैं और आपको ज़हर बेचने का कार्य पूरा करना है। अब आपके सामने चैलेंज होगा कि दुनिया को कैसे संतुष्ट करें कि आपका उत्पाद, यानी वो ज़हर , उसके लिए बढ़िया है ? राबड़ी देवी या उनके किसी समर्थक के चलाये twitter handle की पोस्ट से एक युक्ति सुझाई पड़ती है ज़हर बेचने वाले काम को साधने की। यह तो समझी हुई बात है कि ज़हर को सीधा बेचा जा सकना एक नामुमकिन काम हो सकता है। तो फिर दूसरा तरीका है कि आप किसी बड़े और विपक्षी उत्पाद को ज़हर कहकर उसका दुष्प्रचार करना शुरू करो। दुनिया वाले इस वाक-विवाद में फंस जाएंगे और कम से कम कुछ एक "समझदार" बुद्धिजीवी यह बोल देंगे कि आपके बेचे जाने वाले उत्पाद को भला-बुरा कहने से पहले उसे एक बार परीक्षण के नाम पर प्रयोग करके स्वयं चेतना बनानी चाहिए।  तो आपकी इस चालंकि से देश के बुद्धिजीवी ही अनजाने में आपके ज़हर के प्रचारक बन जाएंगे!!! और इस तरह आपका 'ज़हर ' एक बार तो बिक जायेग। अब अगर दुबारा बेचना हो तो फिर आप क्या करेंगे? इसके लिए आपको दुबारा से कोई युक्ति ढूढ़नी पड़ेगी। शायद अब आप यह कहकर दुनिया को संतुष्ट कर...

निर्वाचन आयोग और नौकरशाही के निजी हितों का प्रतिनिधित्व

चुनाव आयोग को अपने आप में दूध का धुला न समझें।।यह गुप्त तरीके से देश की नौकरशाही के निजी हितों के प्रतिनिधितव करती संस्थान है। याद रखें की निर्वाचन आयोग को हमेशा से सिर्फ न...

हिन्दू योग और बौद्ध योग में अंतर

योग जिसने दुनिया में भारत को पहचान दिलवायी, यह योग वो वाला नही था जो वैदिक धर्म से निकलता था। बल्कि वह जो बौद्ध धर्म के अनुयायिओं वाला योग था। अभी कुछ-एक वर्ष पहले थाईलैंड में एक छात्र दल मनोरंजन क्रीड़ा के खोजी अभियान के दैरान एक भूमिगत गुफा में प्रवेश कर गया था। फिर वह लोग नीचे उतरते चले गये और कक्षाओं व्यूह के बीच अपना रास्ता भूल बैठे थे। बहोत जबर्दस्त बचाव अभियान के बाद एक ब्रिटिश दल ने उन्हें बहोत दिनों बाद बचा लिया। हालांकि बचाव अभियान के दौरान थाईलैंड के अपने नौसैनिक दस्ते के एक सदस्य ने अपनी जान खो दी थी। बाहर निकलने पर छात्र दल ने बौद्ध योग संस्कृति के माध्यम से अपने मन और शरीर की क्रियाओं को नियंत्रित करने को अपना जीवन रक्षक प्रेरणा स्रोत बतलाया था। छात्र दल के शीर्ष ने न सिर्फ अपनी जान बचायी, बल्कि योग द्वारा विकसित सब्र, धैर्य जैसे गुणों से समूचे दल को विचलित होने से रोक, नियंत्रण बनाये रखा, विद्रोह नही होने दिया और सीमित भोजन, वायु, प्रकाश, और निराशा से भरे माहौल में भी किसी को टूटने नही दिया था। यह अंतर है बौद्ध धर्म के योग क्रिया और तथाकथित हिन्दू योग क्रिया...

कथा वाचन और u turn लेती वर्तमान काल की राजनीति

सत्य के साथ मे मुश्किल यह होती है कि वह औझल ही रहता है और फिर लंबे समय के उपरांत तभी प्रकट होता है जब कोई शोध, अन्वेषण या अविष्कार किया जाता है। सत्य  की आवश्यकता इंसान और समाज को इसलिए होती है क्योंकि इसके बिना तो समाज मे शांति,विकास और  समस्याओं का समाधान मुमकिन नहीं होता है। इतिहास के विषय मे सत्य के अप्रकट होने से समाज मे अपनी दिक्कतें घटने लगती हैं। सामाजिक इतिहास के तथ्य तम्माम समाजों को आपसी संपर्क होने पर तुरंत प्रतिक्रिया करने का प्रेरक होते हैं। वर्तमान काल के कूटनीतिज्ञ इसीलिए सामाजिक इतिहास के आसपास के तथ्यों को एक समान प्रमाणित होने देने से बचना चाहते हैं। क्योंकि एक ही बार में  बड़ी तादाद में वोटों को किसी एक के पक्ष में, या विरुद्ध में स्थानांतरित करने का सबसे आसान युक्ती इतिहासिक तथ्यों की मदद से अलग-अलग कथा  【 narrative  】 लिखने से ही बनती है। तभी तो सामाजिक तथ्यों में वही स्वतंत्रता संग्राम, वही गांधी और वही नेहरू है, मगर दोनों पक्षों की कथाएं अलग-अलग हैं इन सब इतिहासिक तथ्यों के प्रति। कथा रचना और इतिहास को समझाने के...

इंजिनीरिंग प्रौदयोगिकी की अंतर्मयी सीमाएं और नागरिकों की जान से खिलवाड़

( निम्मलिखित लेख एक गैर-अभियांत्रिकी प्रोफेशनल द्वारा लिखा गया है, जिसमे वह अपने स्वयं के व्यवसाय से प्राप्त अभियांत्रिकी की सैद्धांतिक ज्ञान के आधार पर विषय चर्चा करना चाहता है। ) मुम्बई में कल शाम विश्वविख्यात छत्रपति शिवाजी महाराज रेल टर्मिनल   के समीप एक नागरिक पैदलगामी पुल यकायक ध्वस्त हो गया, जिसमे कुछ जानें भी गयी है। बड़ी बात यूँ है की पिछले ही वर्ष इसी तरह से एक एल्फिंस्टोन पुल   भी " यकायक " ध्वस्त हुआ था और जिसमे जानें भी गयी थी। जैसा की होता है, कई सारे लोगों ने दावा किया है की उन्होंने अपने सोशल मीडिया के माध्यम से अपने पुराने पोस्ट के द्वारा इन पुलों के असुरक्षित होने की चेतावनी नगरमहापालिका को भेजी थी। तो इन लोगों के अनुसार यह घटनाएं " यकायक " सिर्फ दिखने मात्र हैं, क्योंकि इन पुलों के रखरखाव से संबद्ध सरकारी संस्थाएं अपने कार्य में लापरवाही करते हुए उनकी चेतावनियों को अनदेखा करती हैं, जिसकी वजह से अंत में यह दुर्घटनाएं एक के बाद एक हो रही है। सरकारी नौकरशाह की लापरवाही विषय   में लोगो के ध्यान ज्यादातर भ्रष्टाचार की ओर जाता है जिसमे की प...

ग़ुलामी और दासता में क्या अंतर है? पूर्वी संस्कृति में स्वतंत्रता के अभिप्राय क्या है?

ऑफिस के कंपाउंड में एक खुल्ली जगह पर एक कैंटीन हैं। कैंटीन वाले ने अंदर ही एक बड़े से पिंजड़े में दो तोते पाले हुए हैं। वो रोज़ दोपहर में पिंजरे को एक-दो घंटे के लिए खोल देता है। तोते बाहर आते हैं, उड़ कर इधर उधर पेड़ो की डालियों पर बैठते हैं। शायद थोड़ा मटरगश्ती करते है। फिर कैन्टीनवाला एक छड़ से उनको थोड़ा परेशान करता है, या शायद इशारा करता है। दोनों ही तोते थोड़े समय मे खुद ही उड़ते हुए आ कर पिंजरे में बैठ जाते हैं, और फिर पिंजरे का दरवाजा बंद कर दिया जाता है। फिर बगल में 10-12 कबूतरों वाला पिंजरा है। उनके साथ भी यही सिलसिला दोहरता है। अब दोनों ही पक्षियों के संग यह पूरा सिलसिला प्रतिदिन कई सालों से होता आ रहा है। कहने का मतलब है कि जो लोग यह सोचते हैं कि पंक्षी का निवास आज़ादी से खुल्ले आकाश में उड़ना है, तो वो लोग शायद गलत है। अगर आराम से रोज़ाना भोजन यूँ ही आसानी से मिलता रहे, और संग में रहने को सुरक्षित छत्र-छाया, और फिर थोड़ी-सी एक-आध घंटों की आज़ादी, तो फिर यह तथाकतीत ग़ुलामी तो पंक्षियों को भी खराब नहीं लगती हैं। बड़ी बात सोचने वाली यह है कि ग़ुलामी और पालतू बनाये जाने में ...

The system of Democracy is not meant for non-market people

Democracy as a system is not meant for two class of people - the farmers and the soldiers .  (Actually the soldiers are just an extended job of the farmers of the olden era of mankind.) The system of Democracy is simply not designed for the agriculturalists class -- this includes all such people who do NOT engage in the Market activities for earning their means of suvival. It is not that the agricultural produce is not required by the society , but then the method of transacting the produce by socialist means is just what the Democracy despises. These are the people who have failed to create a space for themselves in markets. Anyone who fails to create the market-space is surely going to be a loser in the Democractic system of Governance.

लोक सेवा आयोग का भारतीय मूर्खतन्त्र में योगदान

बड़ा सवाल है कि जो व्यक्ति दिन-रात एक करके मेहनत से पढ़ाई करता है और IAS/IPS बनता है, तो क्या वह इतनी मेहनत समाज सेवा में योगदान देने के लिए कर रहा होता है? ज्यादा बड़ी गड़बड़ है। यह कि देश मे आर्थिकी ज्ञान और सम्बद्ध चेतना कमज़ोर है। लोग * सेवा* (services) और * व्यवसाय * (profession) को एक ही विचार के पर्यायवाची शब्द समझते हैं। यह दिक्कत सिर्फ आम आदमी की नहीं है, बल्कि सेना और लोक सेवा में बैठे बड़े-ऊंचे पद के अफसरों की भी है।   नतीज़ों में इन लोगों ने तंत्र को मरोड़ दिया है, शायद अपने निजी स्वार्थ हितों में । यहाँ * सेवादारी * ज्यादा आर्थिकी लाभ का कार्य हो गया है * व्यवसायों * से । क्योंकि सेवादारों की आमदनी टैक्स दाताओं (कर दाताओं) से आती है, इसलिए यह लोग एक सुनिश्चित आय का भोग करते हैं। दूसरा, की निजी कंपनियों में जहां आय में वृद्धि कपंनी के मुनाफे से जुड़ती है, और इसलिए market force पर निर्भर करती है, वही सरकारी सेवादारों की आय में वृद्धि भी सुनिश्चित है --प्रतिवर्ष वार्षिक वृद्धि, एक निश्चित क्रम में पदुन्नति पर  वृद्धि, हर पांच वर्ष पर pay आयोग से महंगाई आने पर वृद्धि, हर...

अगर Lord Dicey भारत में पैदा हुए होते तो...

Lord Dicey ने जो न्याय के सिद्धांत दिए थे वह मात्र संभावना की बुनियाद पर टिके थे कि ' कोई भी इंसान खुद अपने विरुद्ध फैसले नही सुनाता है । ' Lord Dicey के सिद्धांत दुनिया भर के rational समाज मे स्वीकृत किये गए। मगर कल्पना करिए यदि यही कोई D icey जैसा व्यक्ति भारत के ब्राह्मणवादी समाज मे ऐसी कुछ बात कहता तो उसको कैसे-कैसे उत्पीड़न से उसके सिद्धान्तों को स्वीकार नही किया जाता -- यह dicey तो हर इंसान को झूठा और मक्कार समझता है -- dicey को लगता है कि बस वही सच बोलता है। - dicey दूध का धुला है, बाकी सब चोर हैं -- भारत की संस्कृति को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है dicey। यहां राजा हरिश्चंद्र से लेकर सचिन तेंदुलकर तक ईमानदार लोग रहे हैं जो कि आउट हो जाने पर खुद ही पवेलियन लौट जाते है अंपायर के इशारे का इंतज़ार किये बिना। - dicey जजों को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है कि सब जज झूठे होते हैं। - dicey न्यायपालिका पर उंगली उठ्ठा रहा है, -- dicey ने सारे जजों को चोर कहा -- निर्वाचन आयोग का कहना है कि dicey ने कोई भी empirical सबूत नहीं दिया है कि जज झूठ बोल सकते हैं अपने खिलाफ मुक़द...

Labour Exploitation reports by the CAG in the Indian Railways

Via Whatsapp unknown So the tragedy-comic story goes something like this:- The Railways does not keep any "gold standards" about the labour conditions for their contractors to follow. The contractors pick the half-baked railways contracts and make profit by exploiting the labour under sub-standard work conditions. As a result , when dis-hygiene comes around, the bureaucracy, instead of auditing on the labour conditions, employs the tactics of marketing through the powerful ministers and influential celebrities that the people should do the brooming by themselves.! Labour exploitation -->buisness profits--> marketing --> vote politics ....An unimaginable poisonous cocktail where all the wrong is happening, and yet no one is responsible.

Labour Welfare, too ,is a component of the Market Forces, which must be freed for achieving the genuinly world-class goods and services.

Labour Welfare , too ,is a component of the Market Forces , which must be freed, so for achieving the genuinely world-class goods and services . Via Whatsapp unknown Regarding hi-skill professionals, there are some observation and thoughts which i have learnt after some experiences. The foremost is that, contrary to how many of us think, the hi-skill develops NOT in the laboratories, but in the market. The core reason why democracy became successful in alleviating the problems , such as the unemployment and mass indigence which plague most of the societies, is that democracies managed to bring about technological advance with it. But the question is how do the Democractic systems manage to bring about the scientific and technological development? Here is where most of our Desi thinkers go amiss. Most of our thinkers like to talk about Democratic system only from the social justice , and human (political) equality perspective only, whereas there is also an economics offshoo...

मूर्ख देश मे शैतान बौनों की मचाई तबाही

यदि किसी देश मे आपको दो-दूनी-चार भी साबित करने में लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं, तो फिर आप मूर्ख देश मे खड़े हैं। मूर्ख देश की सबसे बड़ी पहचान यही है। कि यहां का न्याय उल्टा होता। ...