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अपशब्द क्या हैं, और उनका भाषा विज्ञानं की दृष्टि से क्या योगदान होता है ?

अपशब्द क्या हैं, और उनका भाषा विज्ञानं की दृष्टि से क्या योगदान होता है ?  साधारणतः वाक्य में, अथवा किसी वार्तालाप में बिना किसी तर्क के प्रवाह से, यों ही अर्थहीन तरह से प्रेषित करे गए वह शब्द जो हमे किसी मलिन (गन्दा ) ,अशिष्ट वस्तु का स्मरण कराते हैं , वह अपशब्द होते है ।     यहाँ कुछ विचार आवश्यक है । सबसे पहले की (अप )शब्द का प्रयोग वार्तालाप के विषय से किसी स्पष्ट तर्क से नहीं जुड़ा होना चाहिए । अर्थात अगर शब्द किसी तर्कसंगत रूप से विषय से सम्बन्ध रखता है तब वह अपशब्द नहीं है,भले ही वह किसी मलिन वस्तु का स्मरण कराता हो ।    साधारणतः यौन , यौन क्रिया , प्रजनन प्रक्रिया आदि से सम्बंधित शब्दों को अपशब्दों के लिए प्रयोग करा जाता है । हालाँकि फिर इस प्रकार के प्रयोग के लिए इन शब्दों के किसी स्थानीय रूप का प्रयोग होता है , स्थापित भाषा के स्वरुप का नहीं । स्थापित भाषा के स्वरुप वाला शब्द का प्रयोग वैज्ञानिक , चिकित्सीय अथवा न्यायायिक तथ्य के सन्दर्भ में किया जाता है ।    भाषा में अपशब्दों का प्रयोग मानव मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है । मनुष्य अपशब्...

मूक की "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता "

कुछ लोग अक्सर यह विरोध करते हैं की , "क्या जिसको अच्छी लच्छे दार इंग्लिश भाषा नहीं आती उनके कोई विचार नहीं होते ? अगर किसी को अच्छी हिंदी या अच्छी इंलिश नहीं आती तो इसका यह मतलब नहीं है की उसके मन मैं किसी बात के लिए कोई राय नहीं होती ।"             मैं अक्सर यह सोचता हूँ की क्या अपने विचारों को व्यक्त करना इतना ज़रूरी होता है । और यदि हाँ तो क्या विचारों को सिर्फ भाषा के माध्यम से ही व्यक्त किया जा सकता है ?             संविधान ने हम सब को विचारों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी हुयी है । यह अभिव्यक्ति हम किसी भी रूप में कर सकते हैं -- अपने लेखन , चित्रकारी , संगीत , कविता , व्यंग-चित्र , चल-चित्र , -- किसी भी रूप में । तब फिर उन लोगों का क्या जो कभी भी कोई विचार अभिव्यक्त नहीं करते मगर विरोध ज़रूर करते हैं की इसका यह मतलब नहीं है की हमारा कोई विचार नहीं है ।            बात सही भी है , कभी कभी तो मौन भी अभिव्यक्ति होती है । ...

Logical Fallacy of Indians on the heels of non-absoluteness of Fundamental Rights

reference the Debate happening at the Blog page of Bhagirath Baria   http://www.rathandeconomics.co.in/2012/02/are-fundamental-rights-absolute.html My quest to the know the implications of the condition that Fundamental Rights are NOT absolute after I heard  our Presidentail Candidate Mr Pranab Mukherjee speaking this in TV News talk. I am of the opinion that Indian Intellect comes to a sudden halt at such juncture of Logic, and rolls back into it's old state of feudal governance by assuming that there is not path ahead of this fact. It is life walking on a mathematical graph where a point of Discontinuity has resulted into interpretations that the curve has no value further onwards. Indian philosophy overall suffers a jolt when there is failure in application of a philosophy derived from studies in pure mathematics, into the field of Sociology and Political Science. Producing hereunder  a response I have made to the debate about the path ahead when the Fundamental...