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भक्तों का राष्ट्र

नीति से न्याय मिलता है, न्याय से समाज । और समाज से राष्ट्र । सीधे राष्ट्र की बात करते हैं, और संविधान का पालन नही करते हैं, पुलिस आपकी सीधा सीधा पक्षपात करती दिखाई पड़ रही है - jnu के हमलावर ढूंढे नही मिल रहे हैं, और कपिल की आआपा की सदस्यता तुरन्त मिल जाती है पुलिस को... यही है न आपका " राष्ट्र "... पक्षपात, भेदभाव, अपने-पराये करने वाली पुलिस और पक्षपाती न्याय होता है जहां !

जासूसी पेशेवरों का व्यावसायिक मानसिक स्वास्थ

ये सिर्फ डोवाल बाबू की दिक्कत नही है, मुझे ऐसा लगता है की सारे ही जासूसी agent के दिमागों में यह विकृतियां आ जाती है की वह समाज को बेकूफ़, फ़ालतू लोगों का जमावड़ा समझने लगते है, और ख़ुद को ज़रूरत से ज्यादा विद्धवान, जिसका काम ही है दुनिया को बचाना। जासूसी का पेशा करने वालों में ऐसा क्यों होता होगा? क्यों यह अहम भरी और अंतर्मन को नष्ट करने वाली psychiatric दिक्कतें आती है इनमें? क्या लागत है- क्या इन्हें खुद बोध होता होगा की इनके पेशे के चलते इनमें कुछ occupational mental health समस्या आ जाती हैं? नही। जासूसी पेशों में रहते रहते इंसान तरह तरह के पाखंडों को रोज़ रोज़ होते देखता होगा, जिसमे उनका subject(शायद इनकी शब्दावली में 'target') दुनिया में कहता कुछ है, मगर भीतर ही भीतर करता कुछ और है, जिसको की यह जासूस लोग चुपके से देख ले रहे हैं। तो सालों तक ऐसे ही माहौल में रहने में क्यों नही इन जासूसी पेशेवरों में खुद की ही mental health दिक्कत हो जाती होगी जिसमे यह लोग इंसान में conscience के अस्तित्व और महत्व के बोध को ही अपने खुद के भीतर समाप्त कर देते होंगे। इन्हें सभी इंसान...

उत्तर भारत की क्षेत्रीय पार्टियों पर बौड़मता का अभिशाप

उत्तर भारत की आरक्षणवादी पार्टियों वास्तव में बौड़म लोगों की पार्टियां है, जिनकी राजनीति का एकमात्र उद्देश्य होता है कि जो कुछ भी इस देश को दोनों बड़ी ब्राह्मणवादी पार्टियां - कांग्रेस और भाजपा - समाज को चलाने  के लिए नीति  निर्माण करें , उसमे इन्हें आरक्षण नीति द्वारा संरक्षित अंश जरूर मिले। बस। तो आरक्षणवादी पार्टियां है क्या ? क्या आदर्श हैं इन पार्टियों के? क्या दृष्टिकोण होता है इनका, इस देश और इसके समाज को चलाने के ? सोचा जाए तो कुछ भी नहीं। यह पार्टियां इतनी बौद्धिक क़ाबलियत न तो जमा करना पसंद करती है कि कोई सोच, कोई ideology को जन्म दे , उनको विकसित करें, उन पर अमल करें और समाज को उसके माध्यम से व्यवस्थित करें। यह पार्टियां मौकापरस्ती उद्देश्य से ही चलती हैं, और  प्रत्येक  समाजिक महत्त्व के सवाल पर अपना मत अपनी विचारधारा प्रस्तुत करने से कतराती हैं। मौक़ापरस्ती की रणनीति के अनुसार यह पार्टियां  तनिक विलम्ब करके किसी विजयी दिखते हुए विचार को तलाशती हैं , फिर उस ओर थाली के बैंगन की तरह किसी भी तरफ लुढ़क जाती हैं। वास्तव में यह पिछड़े दल और इनके स...

उत्तर भारत की छात्र राजनीति के विषय में

छात्र राजनीति पर एक और गंभीर बात है, जो की हमें "sir" या फ़िर "हाँसिल" जैसी फिल्मों से देखने को मिलती है। वह ये कि बहोत बड़ी आबादी राजनीति में असल में दिलचस्पी के नाम पर नशा कर रही होती है ! राजनीति में दिलचस्पी एक प्रकार का नशा होता है, यह जानकारी बहोत कम लोगों को है। राजनीति करने में इस किस्म की kick यानी नशे का आनंद का प्रभाव मिलता है मस्तिष्क को, और जो की युवाओं में बहोत पसंद किया जाता है -पुरुष और महिलाएं, दोनों ही। अपने प्रतिद्वंदी को तमाम तिकड़मों में हराने की कोशिश करते रहने में कुछ वैसा ही नशा मिलता है जैसा की सत्यजीत रे की फ़िल्म "शतरंज के खिलाड़ी" में दोनों नवाबों को शतरंज खेलने से मिलता था। यह वो आवश्यक आत्मज्ञान है, जो की लोगों के चिंतन से विलुप्त है। ये वो लोग हैं, बहोत बड़ी संख्या में, जो राजनीति को समाज और प्रशासन के साधन की तौर पर नही देखते-बूझते हैं , आर्थिक विकास को प्राप्त करने के लिए, या फिर की समाज के आसपास उचित नैतिकता और अध्यात्म का प्रभाव क्षेत्र निर्मित करने के लिए, उचित उदाहरण प्रस्तुत करके। यह आबादी विश्वविद्यालयों के य...

दिल्ली विधानसभा चुनाव : पहचानिए , कौन है असली देश के गद्दार

आधुनिक प्रजातंत्र व्यवस्थाएं बहोत आगे निकल चुकी है राष्ट्रीय सुरक्षा संकट के दौरान आने वाले राजनैतिक सत्ता प्राप्ति के संघर्षों के प्रति। प्रजातंत्र व्यवस्थाओं की हमेशा से यह आलोचना होती आयी है कि जब राष्ट्र पर संकट आया है तब इन्ही प्रजातंत्रों से जन्म लिए नेता - Politicians - देश की सीमाओं से बहोत भीतर अपने सुरक्षित घरों में बैठे हुए सत्ता प्राप्ति की सौदेबाज़ी में व्यस्त रहते हैं, सैनिकों को आवश्यक संसाधनों पर सांप की कुंडली बनाये खुद के लिए सत्ता पाने की जुगत लगाते रहते हैं। यह आलोचना आम्रपाली जैसे प्रकरणों से सामने आती है जब अजातशत्रु आसानी से मगध राज्य को परास्त कर देते हैं। पश्चमी में 300 spartans नामक फ़िल्म में उनके इतिहास में घटी ऐसी त्रासदी को दर्शाया गया है। हालांकि आलोचना अमान्य नही है,  और इसलिये प्रजातंत्र व्यवस्थाओं ने politicians की इन मैली हरकतों से जन्म ले रही समस्याओं के निवारण के लिए बहोत प्रबंध करे हुए हैं। ब्रिटेन में पश्चमी विचारकों द्वारा यह जो द्विस्तरीय संसद (BiCameral Legislator) का निर्माण व्यवस्था थी,  वैसे यह भी इसी समस्या के निवारण के लिए ही करि...

शिक्षा का अधिकार और राज्य का उत्तरदायित्व

       शिक्षा का अधिकार एकमात्र ऐसा अधिकार है जो की एक अधिकार कम है और एक बंधन, एक उत्तरदायित्व ज्यादा है । पढ़ने वाले बालक, छात्र, पर बंधन होता है कि 'पढो', और पढ़ाने वाले अध्यापक पर उत्तरदायित्व होता है की 'पढाओ'| सयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों में यह एक ऐसा मानवाधिकार है जिस पर यह विवाद, यह आरोप रहा है की यह अपने आप में ही मानव स्वतंत्रता की विरुद्ध है। किसी मनुष्य को शिक्षा ग्रहण करनी है या की उसकी चाहत ही अशिक्षित रहने की है - यह भी प्रत्येक मनुष्य की स्वतंत्रता में आता है। मगर मानवाधिकार शास्त्रियों का तर्क रहा है की चूंकि बाकी अन्य मानवाधिकार का संरक्षण खुद प्रत्येक मनुष्य के अपने मानवाधिकारों के आत्मज्ञान पर ही निर्भर करेगा इसलिय प्रत्येक मनुष्य को कम से कम इतनी शिक्षा तो अनिवार्यता से लेनी ही पड़ेगी की उसके मानवाधिकार क्या है। इस तर्क का अर्थ यह है की शिक्षा को अनिवार्य तो करना पड़ेगा मगर सिर्फ इस हद्द तक ही की कोई भी बालक या मनुष्य यह जान कर, सोच-समझ कर चुनाव कर सके की उसके अधिकार क्या-क्या है, और कि उसे शिक्षा लेनी है की नहीं। इसी विच...

The argumentative man and the doctor

The argumentative man and the doctor I was reading through one doctor’s advisory to people who are 'habituated to arguing'. His was quite a medical prescriptive for people who, he thinks, are suffering from some kind of psychiatric troubles which are manifested in the form of an argumentative conduct. The meaningfulness advisory is something which I would like to talk . The doctor begins by stating “ Arguing is almost like a disease”. The start of the article itself left me much repulsed to it. Long ago, I have written my article on what does the arguing conduct bring to human relations and their society as a whole. Arguing is the hot process of evolution of right decisions. ‘Right’ is , as we all know, a very subjective matter to decide, but then an unavoidable one for human relations to continue and democracy to prevail ( Democracy, over here, means respecting everyone's view point when living in a multicultral society. ). There are methods known by almost all of u...