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अंतःकरण, आदर्शवाद और बुद्धिमता गुणांक(IQ)

बिना सिद्धांतों के करी जा रही राजनीति के लिए सही शब्द कूटनीति है। कूट का अर्थ है छल, भ्रम, धोखा । आखिर कूटनीति का मानव मनोविज्ञान पर क्या असर पड़ता है?    दीर्घ अवधि में कूटनीत...

"भक्तजन" कौन हैं ?

भक्त जन हैं कौन?? यही तो है वह भ्रष्टाचारी जो भ्रम फैला कर खुद को बचा रहे हैं। स्वच्छ नागरिक को स्पष्ट पता होता है की आदर्श रूप में एक न्याय पूर्ण समाज चलाने के लिए क्या क्या कद...

तर्क और सिद्धांत के मध्य के सम्बन्ध पर एक विचार

सिद्धांत और तर्क में एक सम्बन्ध होता है। तर्क अपने आप में दिशाहीन हैं। कुछ होने और कुछ न होने - दोनों पर ही तर्क दिए जा सकते हैं। मगर जब तर्कों का संयोग आपस में मिलता है और एक सं...

सिद्धांतवाद -- एक बेतुकी राजनीति का अंत

   यह सिद्धान्तवाद का ही कमाल है है की जनता में यह स्पष्ट हो पा रहा है कि समाचार मीडिया भी पैसे के बल पर मरोड़ा हुआ चल रहा है। सिद्धान्तवाद आदर्शवाद में से ही प्रवाहित होता है मगर फिर भी आदर्शवाद से थोडा जुदा सा है।    सिद्धान्तवाद को बस यूँ समझिये कि माध्यमिक स्कूलों में रसायनशास्त्र विषय में पढ़ाये जाने वाले "गैस के नियम" के सामान है। विभिन्न गैस कैसे आचरण करती हैं, यह अगर हम परस्परता में अध्ययन करते तो कभी भी किसी भी गैस को समझ नहीं पाते। अगर ऑक्सीजन की तुलना करके नाइट्रोजन और नाइट्रोजन से मुकाबला कर के हाइड्रोजन को समझते तब तो आजतक इंसानों की समझ में कुछ भी बढ़त नहीं हो पाती।    तो इस समस्या का समाधान किया गया एक काल्पनिक गैस, "आदर्श गैस", को अपनी बुद्धि में ही, कल्पना में जन्म दे कर। एक बार जब हमने आदर्श गैस के आचरण को समझ लिए तब हमने कुछ सिद्धांतों का अविष्कार कर लिया। जैसे की "चार्ल्स लॉ" , " बॉयलस लॉ", और एक परिपोषित "गैस लॉ"।    फिर इन सिद्धांत के प्रयोग से ही हमने अपने आस-पास के वास्तविक जीवन में विद्यमान सभी गैसों और मिश्रणों...

हास्य और सिद्धांतवाद

      सिद्धान्तवाद में हास्य के लिए स्थान नहीं होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कई बार सिद्धांतों को स्वयं भी तानों और जग हँसाई के बाच से ही गुज़र कर आना होता है। हास्य एक दिशाविहीन विचार प्रविष्ट कराते हैं और कभी-कभी तो यह सिद्धांतो के विपरीत को सत्य दिखलाने की त्रुटी कर देते हैं।       हास्य के दो प्रकार - ताना कशी ( एक प्रकार का नकारात्मक व्यंग्य) और उपहास (किसी की क्षमताओं पर लगे प्राकृतिक अंकुश के कारणों से एक नकारात्मक, निकृष्ट आनद लेना) - हास्य कहने वाले के, और हास्य के पात्र- दोनों पर ही शब्दों का दबाव बनाते हैं।      इतिहास में पलट कर देखें तो पता चलता है की फूहड़ हास्य ने कहाँ-कहाँ सिद्धांतों के साथ क्या त्रासदियाँ करी हुई हैं। जीवविज्ञानी डार्विन को ही लीजिये। जब डार्विन ने 'क्रमिक विकास' का सिद्धांत दिया था तब तत्कालीन ब्रिटेन के समाचारपत्रों ने डार्विन के बन्दर की शक्ल वाले व्यंग्य चित्र प्रकाशित कर के उन पर ताने कसे थे, कुछ ने डार्विन के पूर्वजों को बन्दर की शक्ल का दिखाया था, और कुछ ने डार्विन को इश्वर के स्थान पर बंदरों की पूजा करने...

सिद्धांतवाद और आदर्शवाद की राजनीति की वापसी

    सिद्धांतवाद और आदर्श वाद की राजनीति में उन विचारों को त्यागना ही पड़ता है जो स्थापित सिद्धांतों से मेल नहीं रक् सकते हैं। अर्थात जन लोकपाल विधेयक चाहने वालों और नहीं चा...

आत्मनिष्ठ प्रश्नों के हल --- मत-विभाजन से कहीं महतवपूर्ण है मत-संयोजन

   कभी न कभी ,कहीं किसी पल हमे, हम सभी इंसानों को एक समाज का निर्माण करने के उद्देश्य से इस प्रकार के प्रश्नों पर भी एक राय, एकरुपी विचार रखना पड़ेगा की, "वह जो लाल रंग है वह कितना लाल है ?"।           आत्मनिष्ठ विषय(subjective issues) उन्हें कहा जाता है जिनको हम निष्पक्षता से माप नहीं सकते हैं। एक उदाहरण के लिए इस प्रशन के उत्तर के विषय में मंथन कर के देखिये, " राम अपनी माता से अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कितना अधिक प्रेम करते थे?" ( क्या प्रेम को नाप सकने वाले यंत्र भी बने हैं ?!!!) यह एक आत्मनिष्ठ प्रशन है जिसको की सर्वश्रेष्ट तर्कसंगत व्यक्ति भी उत्तर्रित नहीं कर सकते हैं। जहाँ तक आज के, आधुनिक विज्ञान का सवाल है अभी तक तो इंसानों ने इस प्रशन के निष्पक्ष(objective) उत्तर दे सकने के संसाधन विक्सित नहीं किये हैं।         मगर दुविधा तो देखिये - एक समाज का निर्माण करने के लिए हमे ऐसे ही प्रशनों का एकरूपी उत्तर दूंढ कर ही आगे का रास्ता मिलता हैं। ऐसे उत्तर जो समान रूप से सर्वस्वीकार्य हों। हम इन प्रशनों को अनउत्तरित कर के एक समाज का न...

बिगड़ती प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का उपचार - शक्तियों का संतुलन

     भारत में प्रयक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में हर जगह राजनीतिज्ञ ही नियंत्रण करते हैं| कभी यह तंत्र हमे धोखा देने के लिए 'नेता-विपक्ष' और 'नेता-सदन' नाम के दो अलग-अलग से प्रतीत होते व्यक्तियों का ज़िक्र कर देता है , कभी एक 'संसदीय-दल' का नामकरण कर लेता है -- मगर असल प्रकृति में रहेता एक ही है -- चुनावी प्रक्रिया से आया वह अयोग्य व्यक्ति जो की मात्र अंधभक्ति से प्राप्त लोकप्रियता से सब नागरिकों और संस्थाओं पर नियंत्रण करे हुआ है |    संविधान के निर्माताओं ने यहाँ पर एक बहोत बड़ी भूल कर दी लगती है | आयरलैंड और अमरीका के संविधान से अनुकृत हमारे संविधान ने लोकतंत्र के ठीक वही पेंच गायब कर दिए है और एक भ्रमकारी, आभासीय प्रतिस्थानक लगा दिया है जिससे के प्रजातंत्र एक मुर्ख-तंत्र में परिवर्तित हो जाए |     हम में से अधिकाँश व्यक्ति हमारे भारतीय प्रजातंत्र की कमियों को महसूस करते है --और इसका दोषी हमारी अंधभक्त, अल्प-शिक्षित जनसँख्या को मानते है | मगर एक अनभ्यस्त तर्क में समझे तो पता चलेगा की प्रजातंत्र का निर्माण ही अशिक्षा और गरीबी को मिटाने के लिए हुआ था ! यान...

सोशल मीडिया , जन सुनवाई और जन-कल्याणकारी विचार

    यदि आप के विचार ऐसे हैं कि उनको सिर्फ गोपनियत में किन्हीं चुनिंदा लोगों के सामने ही प्रस्तुत किया जा सकता है, या कि आप के विचारों में से जन-कल्याण(Public Interest) के विपरीत के कर्म प्रवाहित होते हैं - तब फेसबुक औए ट्विटर जैसे सामाजिक विचार मीडिया आपके लिए उपयुक्त स्थल नहीं हैं।         सामाजिकता का प्रथम सूत्र न्याय है। जो सही होगा, जो उपयुक्त होगा उसको ही सब लोग स्वीकार करेंगे, और जो सही नहीं होगा उसको बहिष्कार करेंगे। मगर समाज में यह कहीं भी तय नहीं होता है की क्या-क्या सही माना जायेगा और क्या-क्या गलत माना जायेगा। समाज में जो तय है वह यह है कि सही और गलत का न्याय सभी लोग मिल कर करेंगे। यानी की न्यायायिक प्रक्रिया तय हो जाती है कि जन-सुनवाई का प्रयोग होगा। जन-सुनवाई(Public hearing) न्यायायिक प्रक्रिया का सर्वोच्च सूत्र है।         अन्तराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों में जन सुनवाई का कई बार उल्लेख है। न्यायालयों का दरवाजा खुला रखने के पीछे की मंशा यही से ही निकलती है कि कोई भी व्यक्ति कभी भी अन्दर आ कर प्रमाण परीक्षण क्रिया क...

Who is Aam Aadmi and what should he be wanting?

कौन है यह आम आदमी और इसको अपने लिए क्या चाहत रखनी चाहिए ? असल में "आम आदमी" शब्द एक पर्याय है एक ऐसे समाज के व्यक्तियों के लिए जिसकी चारित्रिक विशेषताएं यही हैं जो नीचे लिखी हुई हैं । इसमें कोई शक नहीं है। शेक्स्पेअरे ने इन्हें "प्लेबेइअन"(= निचले तबके के लोग) कह कर बुलाया था और प्राचीन रोमन साम्राज्य में भी इन्हें ऐसे ही पहचाना गया था ।    मेरी समझ से समाज अपनी बौद्धिक जागृती और नैतिकता के आधार पर दो प्रकार से प्रकट होते हैं : 1) आत्म-जागृत समाज conscietious society , और 2)अनुपालक समाज complaisant society। इन दोनों प्रकारों में अंतर और विशेषताएं क्या हैं?        क्रमिक विकास की दृष्टि से अनुपालक समाज एक पिछड़ा स्वरुप है एक आत्म जागृत-समाज का । अनुपालक समाज किसी नेता, किसी स्वामी, किसी राजा के आदेशों का पालन करना चाहता है। वह स्वयं से, अपने अंतःकरण के आधार पर नैतिकता के विषयों को नहीं तय करता है। ऐसे समाज में नियम कोई अन्य लिखता है और जनता का कार्य होता है कि नियम को जान कर उसका पालन करे। यहाँ नियम-कानून साधारण ज्ञान का विषय नहीं है जो की आप स्वयं अपने ...

सामंत वादी व्यवहार और साधारण समझ (IQ)

सामंतवादी मानसिकता भी मनुष्य की बौद्धिक योग्यता, उसका IQ घटा देने की क्रिया करती है | सामंतवादी मानसिकता एक प्रकार का सामाजिक व्यवहार है जब कोई व्यक्ति खुद को दूसरे से अधिक महत्वपूर्ण , शासन-सत्त, रासुक वाला और योग्य समझता है | मनोविज्ञान की समझ से देखें तो सामंतवादी मसिकता मनुष्य के सामाजिक न्याय की नैसर्गिक समझ को प्रभावित करती है जिससे की उसके तर्कों में तोड़-मरोड़ आ जाते है | तर्कों में आये , उत्पन्न , मरोड़ का सीधा असर विवेक , विवेचन बुद्धि पर पड़ता है और फिर बौद्धिक क्षमता ही कम हो जाती है | यह प्रकिय एक साथ पूरे-पूरे समाज या एक पूरे राष्ट्र के साथ घट सकती है -- जिससे की पूरे नागरिक बल ही अल्प-बुद्धि वाला बन सकता है |   भारत का इतिहास तो भरा हुआ है इस सामंतवादी मानसकित से | आप चाहे तो छुआ-छूत वाली जात प्रथा को देखें, या आधुनिक "लाल बत्ती " कल्चर को - या सरकारी अधिकारीयों के 'लाट साहबी ' व्यवहार को -- यह सब सामंतवादी मानसिकता के ही अलग-अलग स्वरुप हैं | सामंतवादी मानसिकता में धर्म -और-न्याय की जगह ताकत और हिम्मत को प्रयोग किया जाता है | सामंतवादी दिम्माग में यह एहसास...

तो सीबीआई के निर्माण से हुआ है भारत मुर्ख-तंत्र का निर्माण !

एटोर्नी जनरल, ज़ी ई वाहनवती जी ने CBI से सम्बंधित फैसले पर सर्वोच्च न्यायलय में अपनी दलील दे कर फिलहाल के लिए स्टे आर्डर ("ठहरना" का आदेश ) प्राप्त कर लिया है | यह ज़रूरी भी है क्योंकि जैसा की उन्होंने अपनी दलील में कहा -- सीबीआई आज एक ६००० से भी अधिक लोगों से सुसजित संस्था है , जो की आज भी १००० से भी अधिक केस को जांच कर रही है | गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले यह सब के सब , और करीब ९००० फैसले प्रभावित होंगे |     एटोर्नी जनरल जी का मुख्य नजरिया यह है की गुवाहाटी हाई कोर्ट ने जो प्रश्न किया था वोह ही गलत था, फिर उन्होंने एक त्रुटिपूर्ण आधार से आंकलन किया , और एक त्रुटिपूर्ण समाधान प्राप्त किया . जो की उनका फैसला बन गया |      भारतीय मूर्ख्तंत्र की दिक्कत यह है की हमारा मीडिया भी तर्क, वाद-विवाद को सही से समाचार में कभी दिखाते ही नहीं है | उनको तो बस भाषणों को दिखाने की लत लग चुकी है और तर्क, वाद-विवाद तो खुद उनके भी मस्तिष्क में घुसता नहीं है , इसको समाचार में दिखाने की आवश्यकता इनके सहज बोद्ध में नहीं आने वाली| यह क्या जन -जागृती लायेंगे | दिक्कत यह है की जनता का...

Do you say, "AAP is being too much idealistic".

Are you among those people who accuse the Aam Aadmi Party of being too much idealistic. Do you find something too much wrong with the too-much-idealism , which unfortunately you are not able to describe in exact, coherent terms. Here is one reply I want to send to you: There is a purpose of Idealism, although it is something akin to the perfection and divine-ness which the humans cannot achieve. Idealism sets the benchmark around which we measure our imperfections . This theory will help define the purpose and contribution of AAP to the current Indian Politics. It is alleged that AAP is highly idealistic and therefore likely to be unstable , something which cannot exist in the real world. It is so true a thought, i would concede. But the issue is, even if this idealism is of highly transient and rather illusionary and imaginary nature, this idealism has the potential to change the political landscape, the signs of which are already emerging through various legislative and justice ...