विश्व ने अब आने वाली आपदाओं को स्वीकार कर लिया है
जलवायु परिवर्तन किस हद तक वास्तविक है और किस हद तक नहीं, यह आम जनता अपने आसपास के वातावरण में स्वयं महसूस कर रही होगी। पूर्व में, इसके प्रभाव को कम करने और रोकथाम के लिए विश्वभर के नेता प्रयास भी कर रहे थे।
किंतु, पिछले एक दशक में स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका को 'पेरिस समझौते' (Paris Agreement) से अलग करने के निर्णय के साथ ही इसकी शुरुआत हो गई थी। दरअसल, कुछ देश जलवायु परिवर्तन को रोकने के आवश्यक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु निश्छल भाव से त्याग करने के लिए तत्पर थे। वहीं दूसरी ओर, अन्य देशों के लिए यह अपनी हठधर्मिता और स्वार्थ के बल पर अनुचित लाभ उठाने का एक अवसर बन गया।
ऐसी स्थिति में, यदि कोई देश अकेले जलवायु परिवर्तन की रोकथाम का प्रयास करता, तो वह राष्ट्रहित और आत्महित की बलि देकर स्वयं को नुकसान ही पहुँचा रहा होता। दगाबाज़ देशों की सूची में रूस, तुर्की और यहाँ तक कि भारत जैसे देश भी शामिल होते दिखे। याद करिये प्रधानमंत्री मोदी का वह कथन, जिसमें उन्होंने कहा था, "जलवायु नहीं बदली है, बल्कि हमारी आदतें बदल गई हैं।"
जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक उद्देश्य केवल राष्ट्रों के बीच परस्पर विश्वास के आधार पर ही हासिल किए जा सकते थे, क्योंकि प्रत्येक देश को स्वयं को संवेदनशील स्थिति में रखकर सामूहिक प्रयास करने थे। परंतु, जब कुछ राष्ट्र पीठ में छुरा घोंपने और अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने में लगे रहे, तो इस संपूर्ण साझा उद्देश्य को ही त्याग दिया गया।
अब स्थिति यह बन चुकी है कि सभी देशों ने व्यावहारिक रूप से हाथ खड़े कर दिए हैं। वैसे भी वैश्विक जनसंख्या अपनी सीमाओं को पार कर चुकी है और पृथ्वी अब इतने अधिक मानवीय दबाव को सहन करने में असमर्थ दिखती है। ऐसा प्रतीत होता है कि विश्व ने अब आने वाली आपदाओं को स्वीकार कर लिया है।
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