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The system of Democracy is not meant for non-market people

Democracy as a system is not meant for two class of people - the farmers and the soldiers .  (Actually the soldiers are just an extended job of the farmers of the olden era of mankind.) The system of Democracy is simply not designed for the agriculturalists class -- this includes all such people who do NOT engage in the Market activities for earning their means of suvival. It is not that the agricultural produce is not required by the society , but then the method of transacting the produce by socialist means is just what the Democracy despises. These are the people who have failed to create a space for themselves in markets. Anyone who fails to create the market-space is surely going to be a loser in the Democractic system of Governance.

बनारस और वर्तमान भारतीय संस्कृति की अशुद्धियाँ

  बनारस नाम संभवतः वानर अथवा बानर मूल शब्द से आता है , जिस जीव को हम वर्त्तमान में बन्दर कह कर बुलाते हैं। यह शहर बंदरों से भरा हुआ था और उनके शरारतों से गूंजता है , और शायद इसलिए कुछ लोगों ने इस शहर को बनारस नाम दिया था। बन्दर इस शहर के आराध्य देव हनुमान जी का प्रतीक होता है और यहाँ शहर में हनुमान जी का एक प्राचीन संकट मोचन मंदिर स्थापित है। कहते हैं की गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामायण का अपना संस्करण इसी मंदिर के प्रांगण में लिखा था जो की हनुमान जी ने उन्हें स्वयं सुनाया था ।(हिन्दू मान्यताओं में हनुमान जी एक अमर देव हैं)। हनुमान जी को भगवान् शंकर का ही एक रूप माना जाता है, और आगे भगवान् शंकर और काशी (बनारस का वैदिक काल का नाम) का रिश्ता तो सभी को पता होगा।   (बनारस से आये देश के बहोत बड़े संगीत शास्त्री, स्वर्गीय उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब का मानना था की बनारस नाम पान के रस से उत्पन्न हुआ है , क्योंकि यहाँ का पान बहोत प्रसिद्द है |)     मौजूदा बनारस को मैं स्वयं एक पागल युवक के माध्यम से समझने की कोशिश करता हूँ जिसने चंडीगड़ शहर में सन 1995 में घटी एक लड़की रुचिका ...

अब और कितने पतन की और जायेंगे हम /

खुर्शीद सही कहते हैं : "इस हमाम में तो सब नंगे हैं "|   क्या नेता , क्या अभिनेता , क्या क्रिकेट खिलाडी , क्या दर्शक , क्या साधू बाबा , और क्या तांत्रिक योगी बाबा , क्या जज और क्या मुजरिम , क्या पत्रकार , और क्या भावी प्रधानमंत्री, और क्या आम आदमी  -- यह भारत नमक देश एक ऐसी सभ्यता बन गयी है जो एक 'नंगा हमाम' की तरह ही है | मानो की जैसे भारतीय सभ्यता ख़त्म ही हो चुकी हो |    यह वो देश नहीं रह गया है जहाँ सभ्यता का विकास यहाँ की कला, विज्ञानं ,सत्य . धर्म और न्याय की खोज को एक शिखर की और अग्रसर करे , जहाँ सभ्यता विक्सित हो और प्रफ्फुलित हो| यह पतन और खात्मे की कगार पर खडी एक सभ्यता है जो की फिर किसी विदेशी ताकत के आधीन होने के लिए तत्पर है |यहाँ लोग सिर्फ हमाम में ही नंगे नहीं होते, अब तो महफिलों और शासन के गलियारों में भी नंगे लोग पहुच चुके हैं| यहाँ जन-विश्वास पारदर्शिता के द्वारा नहीं , गोपनीयता में दूंढा जाता है | यहाँ शक्ति ने धर्म को अपने आधीन कर लिया है | यह धर्म का अर्थ सत्य और न्याय से नहीं , शक्ति के उपयोग से तय किया जाता है | लोकप्रियता का अर्थ फिल्मी सितारा...

'मंगलयान' अभियान का प्रेरणा उद्देश्य क्या होना चाहिए ?

   हिंदी भाषा के एक समाचार चेनल IBN-7 पर एक उच्च पदस्त अंतरिक्ष वैज्ञानिक को भारत के मंगलयान मिशन(अभियान) के प्रेरणा-उद्देश्य का व्याख्यान करते सुना की क्यों भेजा हैं भारत ने यह मिशन | उनकी बातों और विचारों को सुन के मुझ में फिर से वहीँ ग्लानी , वही शमंदिगी महसूस हुई जो बार-बार  , कितनो ही बार मैंने स्वयं के एक भारतीय होने की वजहों से महसूस करी हुयी है | वही बेईज्ज़ती और शर्मंदिगी, जिसमे की मेरे मन में वह संदेह होता हैं की क्या यही वह भारतीय सभ्यता थी जिसने समूचे विश्व को सभ्यता का पाठ अपने काव्य रचना, रामायण, के माध्यम से दिया था , और क्या यही वह सभ्यता है जिसने घर्म और न्याय के महाग्रंथ , श्रीमद भगवद गीता, की रचना करी थी |   अंतरिक्ष वैज्ञानिक जी का कहना था की मगल यान मिशन का प्रेरणा-उद्देश्य है इस दुनिया में भारत का नाम ऊँचा करने का -- यह साबित करने का की भारत के पास भी काबलियत है ऐसे उच्च तकनिकी मिशन को सफलता पूर्वक पूर्ण कर सकने की , और भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में लोहा मनवाने की | भारत ने यह मिशन मात्र रुपये 450 करोड़ में ही भेजा है , जब की रूस, अम...

Retirement Send-offs

Retirement Send-offs are very emotional movement. Or, they should have been so unless ofcourse our attitudinal Commondification did not take-over our Emotional Intelligence to respond appropriately to a given emotion. It's is surprising that we Indians who are so much into watching that Emotionally 'masala'-rich bollywood produces , in our real lives are acutely de-sensitive of emotionally appropriate responses. Sometimes it makes me doubt if bollywood is doing to the society on the emotional front or is it working to strip our people of the sensitivity through a clever way of over-feeding dislikeness.  People give more attention to food, the dresses, to meeting the seniors and giving 'respect' to them (to score the promotion brownie points) than to feel or express the depth of the occasion. It goes like that in Shaadi, Birthdays, and all that. Parties have become our heartless attitudinal way of deriving 'pleasure', almost an addictive habit with no real ...

राजनीतिज्ञों और सांसदों में पुनरावृत-कथनी के मनोविकार

      ऐसा लगता है की मानो भारतीय सभ्यता में कोई मनोरोग कई सदियों, कई पीढ़ियों से घर कर चुका है । हमारी भाषा , हमारे विचार या तो अतीत में फँस जाने की बीमारी से ग्रस्त है, या पुनरावृत-कथनी से । नहीं तो कुतर्क से, तर्क के विरूपण से । सत्य , स्पष्ट , और संतुलित विचार तो कर सकना जैसे की भारतीय नसल में एक असंभव योग है । बचपन से ही "स्मार्ट" बनने की चाहत में हम अपने बच्चों को अंसतुलित विचार की मानसिक क्रिया का आदि बना देते है । बचपन से ही हम इस तर्क मरोरण में अभ्यस्त होते हैं , और स्पष्ट विचार कहने में और सुनने में सनकोचते है ।     संसद में चल रही बहस को सुन कर मन में बहोत सारे विचार आते हैं। मुख्यतः खुद भारतीय होने की ग्लानी लगती है । आधे से ज्यादा वाचक तो उसी एक बात, एक विचार की पुनरावृत-कथनी करते सुनाई देते है । तकनिकी बिंदु तो शायद एक भी नहीं होता है । कैसे बनेंगी कार्य-पालक नीतिया इस देश में , सभी तो मानो सत्संगी विचारों में ही बात कर रहे होते है । इन विचारों को को क्रिया में बदल सकने के विचार तो जैसे किसी में हैं ही नहीं । सब के सब आ कर अपने "सत्संग" सुना जाते ...

'बिगेट' का अर्थ

Bigotry (बिगेट ) का अर्थ हिंदी भाषा के शब्दकोशों में कट्टर, अड़ियल इत्यादि दिया गया है । मगर भाषा-अनुवाद की असल दुविधा यह रहती है की न सिर्फ शब्द, वरन उसके सही भाव को भी अनुवाद करी गयी भाषा में परिवर्तित करना चाहिए । उदहारण के लिया अब Bigot को ही ले लीजिये । बाज़ार में उपलब्ध शब्दकोष के माध्यम से तो कोई भी छात्र यह समझ लेगा की जो व्यक्ति किसी वस्तु को पाने के लिए हट करे जब वह वस्तु उसे प्राप्त नहीं हो सकती तब वह Bigot हुआ ।      है, की नहीं? अब खुद ही सोचिये , “अड़ियल” से तो कुछ भाव ऐसा ही आता है । या फिर की ....वह व्यक्ति जो सिर्फ अपनी ही चलता है वह Bigot है । अब यह अर्थ सुनने के बाद कौन पसंद करेगा एक समालोचनात्मक चिंतन के भाव में अपने मस्तिष्क को डाल कर यह प्रशन करना की अगर “बिगेट” का अर्थ होता है 'वह जो सिर्फ हर समय अपनी ही चलता है ', तब फिर यह कैसे तय होगा की किस विषय में या किसी परिस्थिति में किसकी चलनी चाहिए ।     साधारणतः , हम लोग बिगेट से अर्थ निकलते है , "जिद्दी", या फिर "हट्टी "। और फिर जिद्दी का अर्थ समझने के लिए अपने बाल्य काल का उदाहरण ले लेत...

लुभावना हास्य खतरनाक हो सकता है !

   हास्य को हम सभी लोग क्यों इतना पसंद करते हैं ? फेसबुक पर, टीवी पर, सिनेमा में ..जहाँ देखो वहां , करीब-करीब हर पल हर कोई हंसने और हँसाने की कोशिश कर रहा होता है / और जब यह प्रश्न उठता है की इतनी हंसी इंसान को क्यों चाहिए होती है, तब एक 'शब्द-आडम्बर तर्क' (=Rhetorical) में हम यही उत्तर देते हैं कि, "आज कल के जीवन में तनाव इतना बड गया है कि उस तनाव को कम करने के लिए हास्य की आवश्यकता पड़ती है /"    हास्य मनुष्य को प्रकृति का अनोखा उपहार है / मानव विज्ञानी (=anthropologist ) हास्य को मनुष्य की बौद्धिकता का सूचक मानते हैं , की जब मनुष्य को मृत्यु की सत्यता की ज्ञान हुआ तब हास्य ही मनुष्य का प्रथम प्रतिक्रिया बनी /     मगर आज के युग में यह इतना हास्य स्वयं कुछ रोगी सा हो गया है/ जीवन को तनाव मुक्त करने के नाम नाम पर जो कुछ भी उपलब्ध हो रहा है , वह या तो किसी का उपहास करता है , या तर्क हीन हैं / किसी भी सूरत में यह हास्य वह हास्य नहीं है जो ज्ञान , विवेक अथवा बौद्धिकता से उदगल करता है /      आलम यह है की एक पूरा-पूरा कल कारखाना , एक उद्योग ...

Commodification is a conduct of Plebeianism

Commodification is a conduct of Plebeianism . The intellectual puritans developed the concept of money as a store of value to help the trade which was cumbersome when it was by a barter system. The Plebeians commodified the money and acquired it in large amount, leaving all the values behind, even the basic human values. The examination and marks were invented by the puritans to objectively select the wise and learned persons from the society. The Plebeians commodified the marks as the eligibility for wisdom and learning, no matter the candidate has it or not.  Marks slowly became the filters to disqualify the candidate, instead of selecting the learned wise candidates. The puritans developed the concept of nation and nation-state for peaceful co-existence of people of similar ideology. the Plebeians commodified the concept of nations to create wars between them. That is Plebeianism. When the rural mindset, an evolutionary primitive way of thinking, reaches the higher...