हिन्दू योग और बौद्ध योग में अंतर

योग जिसने दुनिया में भारत को पहचान दिलवायी, यह योग वो वाला नही था जो वैदिक धर्म से निकलता था। बल्कि वह जो बौद्ध धर्म के अनुयायिओं वाला योग था।
अभी कुछ-एक वर्ष पहले थाईलैंड में एक छात्र दल मनोरंजन क्रीड़ा के खोजी अभियान के दैरान एक भूमिगत गुफा में प्रवेश कर गया था। फिर वह लोग नीचे उतरते चले गये और कक्षाओं व्यूह के बीच अपना रास्ता भूल बैठे थे। बहोत जबर्दस्त बचाव अभियान के बाद एक ब्रिटिश दल ने उन्हें बहोत दिनों बाद बचा लिया। हालांकि बचाव अभियान के दौरान थाईलैंड के अपने नौसैनिक दस्ते के एक सदस्य ने अपनी जान खो दी थी।
बाहर निकलने पर छात्र दल ने बौद्ध योग संस्कृति के माध्यम से अपने मन और शरीर की क्रियाओं को नियंत्रित करने को अपना जीवन रक्षक प्रेरणा स्रोत बतलाया था। छात्र दल के शीर्ष ने न सिर्फ अपनी जान बचायी, बल्कि योग द्वारा विकसित सब्र, धैर्य जैसे गुणों से समूचे दल को विचलित होने से रोक, नियंत्रण बनाये रखा, विद्रोह नही होने दिया और सीमित भोजन, वायु, प्रकाश, और निराशा से भरे माहौल में भी किसी को टूटने नही दिया था।
यह अंतर है बौद्ध धर्म के योग क्रिया और तथाकथित हिन्दू योग क्रिया में।
हालांकि बौद्ध योग क्रिया अपने आप में वैदिक संस्कृति से ही आती है, मगर फिर भी वह अपने आप में इतना सशक्त पृथक विचार है की इसको अपनी नयी पहचान से ही बुलाना उचित माना गया है।
हिन्दू धर्म के योग का केंद्र बल होता है शरीर को अलग अलग मुद्राओं में मरोड़ने से अलग-अलग शारीरक लाभ और रोगों का निराकरण ।
जबकि बौद्ध धर्म के द्वारा विश्व में प्रचार किया हुआ योग का उद्देश्य है मन पर नियंत्रण करना क्योंकि भटकता हुआ मन ही तमाम शारीरिक और सामाजिक दुखों का जड़ है । मन पर नियंत्रण से शरीर भी स्वस्थ बनता है, और समाज से भी पाप और अधर्म समाप्त होता है। व्यक्ति को क्रूरता, क्रोध, स्वार्थ , दुष्ट कृत्य, इत्यादि दोष को अंदर नियंत्रण करना आ जाता है और जिससे अच्छा समाज बनता है।
बौद्ध विचारधारा ने दुनिया को ज्यादा प्रभावित किया था, वैदिक विचारधारा से कही ज्यादा। अफ़ग़ानिस्तान से होता हुआ जो 'रेश्म मार्ग' जाता था, उसपर पड़ने वाले बेमियान शहर में बड़ी विशाल बौद्ध मूर्तियों का निर्माण इस दावे के तामन सूचक हैं। पूर्व एशिया में जापान, चाइना, विएतनाम, कोरिया तक आज भी बौद्ध धर्म प्रचलित है, वैदिक धर्म नहीं।
मगर दिक्कत की बात यह है की आज भी भारत देश में बैठा ब्राह्मणवाद झूठ और मक्कारी से बौद्ध उपलब्धियों को हड़प करके हिन्दू या वैदिक ही बताता है। शायद यही वह अचंभित करने वाला कारण है कि भारत में बौद्ध धर्म के इतने अनुयायी आज भी नही हैं जितने की जापान, कोरिया, थाईलैंड, म्यांमार , कंबोडिया इत्यादि में हैं।
हिन्दू धर्म का योग शरीर को तोड़ने-मरोड़ने यानी contorting का नाम है। आप बार-बार भारत सरकार में ऐसे लोगों को योग के लिए सम्मानित होते देखेंगे जो की 'x-णायाम ' आसान कर लेते है, न की वो जो की तन के अलावा मन को नियंत्रित करने पर भी जोर देते हो।
बौद्ध योग यहीं पर अलग अलग है। बौद्ध योग है ही बौद्धिक क्षमता का विकास, यानी सहनशीलता बढ़ाना, धैर्य का प्रसार, शब्द और वाणी पर नियंत्रण, श्रवण शक्ति और समझने की शक्ति का प्रसार, उच्च ध्यान शक्ति, मानसिक नियंत्रण,  और आजीवन उपभोग का परित्याग, भावनाओं पर नियंत्रण करना - न ज्यादा जोशीला, खुशनुमा और न ही ज्यादा दुखी , अप्रसन्न रहना इत्यादि।
तो बौद्ध योग अलग है हिन्दू योग से। हिन्दू योग को अपने और भी अविकसित रूप में आप नागा साधुओं या औघड़ों में देख सकते हैं। वह लोग शरीर के हिस्सों को, या की जननेन्द्रियों, केश , दंत इत्यादि को अज़ीब तरीकों से मोड़ सकते हैं, वजन उठा लेते हैं, या ऐसी यातनाओं पर भी दर्द को महसूस नही करते जिन्हें देख कर ही साधारण मानव भयभीत हो जाते हैं। सांसों को लंबा रोक सकते हैं, छाती और रीढ़ से करतब दिखलाने वाली क्रियाएं कर सकते हैं।
यह हिन्दू योग है।
यह वास्तव में बौद्ध योग का पिछड़ा स्वरूप है, या दृष्टिकोण को बदल कर कहें तो - हिन्दू योग ही बौद्ध योग का जनक है।

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