प्रजातंत्र की दुविधा - मूर्खतन्त्र

*प्रजातंत्र की दुविधा*  - मूर्खतन्त्र

प्रजातंत्र की अपनी बहोत सारी सीमाएं है जिनका एहसास हमें सदैव रहना चाहिए।
मसलन, न्यायालय अक्सर करके मूर्खता के मुख्यालय में तब्दील हो जाते हैं। क्योंकि अभिव्यक्ति की असीम स्वतंत्रता होती है, इसलिये सवाल तो कुछ भी उठाये जा सकते हैं। इस एक आज़ादी के चलते न्यायलय खुद में प्रजातंत्र में खुशहाली लाने के रोहड़ा बन जाते हैं क्योंकि वह अवरोधक शक्तियों को पोषण देने का मार्ग खोल देते हैं। काम को करना मुश्किल हो जाता है, अवरोध करना आसान।

दूसरा, कि कोर्ट  प्रशासनिक सिद्धांतों के विकास को भी बंधित करते हैं, या नष्ट भी कर देते हैं। एक व्यक्ति अपने अनुभव से होता हुआ कोई सिद्धांत पर चलता हुआ एक दिशा के कार्य को आरम्भ करता है। तब तक उसकी सेवा समाप्त हो जाती है, और फिर दूसरा आ कर किसी दूसरे कार्य को करने लगता है जो ठीक विपरीत दिशा वाले सिद्धांतों पर ले जाता है। जनधन व्यय होता है, मगर "किसी के बाप का क्या जाता है"। महंगाई बढ़ती रहती है, मगर यह विषय को कोर्ट की jurisdiction के बाहर होता है, इसमे वह क्या कर सकता है।

प्रजातंत्र में खुशहाली आदर्श हालात में यूँ आते हैं की किसी एक दिशा के सिद्धांत पर चलते हुए trial and error से उसमे सुधार होते हुए आगे बढ़ा जाये। सोचिये मगर तब क्या होगा जब रोज, नित नये सिद्धांत के बहाने नये नये कार्य होते रहें ? Trial and error प्रक्रिया के साथ एक छल हो जायेगा।

यदि गणतंत्र में प्रशासन सेवकों का मुखिया - राष्ट्र का दंड धारक- चिरायु न हो, हर पांच सालों में बदलता रहे , तब फिर यही छल होता है सिद्धांतों के trial and error से विकास के प्रति। नित नये सिद्धांत खोज दिये जाते है, नौकरशाही की मनमर्जी बदौलत, बजाये की किसी एक को स्थायी रखते हुए उसका विकास हो।

गणतंत्र के मुखिया के कार्यकाल का पांच वर्षीय बनाये जाने के और भी कई घातक नतीजे हैं। जैसे, नौकरशाही ही वास्तविक दंड धारक बन जाती, बजाये राष्ट्रपति या की किसी राजनैतिक पार्टी के। वह राजनैतिक पार्टी से सांठगांठ में आ कर भ्रष्टाचार को अपना मुख्य कौशल बना लेती है, और संविधान तो बस नाम के वास्ते रह जाता है। यह कार्यपालिका की अंतिम मर्ज़ी रह जाती है की किस भ्रस्टाचार कांड में किसी नौकरशाह को पकड़ना है, और किसे बरी कर देना है।

प्रजातंत्र को देखादेखी, नकल करके अपनाना तो आसान , आकर्षक और सुविधाजनक लगता है, मगर उसके वास्तविक निचोड़ को समझ कर उसको अपने शासन तंत्र में कायम रखना बेहद परिश्रम का कार्य है।

Comments

Popular posts from this blog

The Orals

About the psychological, cutural and the technological impacts of the music songs

आधुनिक Competetive Examination System की दुविधा