Wednesday, August 06, 2014

अंतःकरण, धर्म, आधुनिक संविधान और प्रजातंत्र

ऐसे ही , कुछ एक साल पहले एक फेसबुक बहस के दौरान एक बात आई थी की अंतरात्मा, अंतःकरण , अन्दर की ध्वनि, ज़मीर --क्या इसका कोई कानूनी अस्तित्व भी है क्या?
यह बात वर्तमान की राजनीति में चल रहे प्रसंगों से ही निकली थी-तब जब कांग्रेस सरकार भाजपा की मदद से RTI कानून में संसोधन करने वाली थी की राजनैतिक पार्टियां इसके दायरे में न आये। याद होगा, जब राहुल गांधी ने गुस्से वाली प्रेस कोंफ्रेंस करके इस संसोधन बिल को फाड़ने के लिए कहा था।
प्रशन था- की क्या राष्ट्रपति मुखर्जी को कोई मजबूरी और बाध्यता आने वाली थी इस बिल को अस्वीकार कर देने के लिए, क्योंकि अन्यथा मुर्खार्जी तो खुद कोंग्रेसी ही है।

प्रशन था)-- राष्ट्रपति पद का भारत की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में क्या स्थान है? क्या मात्र वह एक गरिमा मई पद ही है जिसके कोई कर्त्तव्य, शक्ति और उत्तरदायित्व नहीं है?
      इससे सम्बद्ध एक विवाद और हुआ था, कि - संसद और 'आम आदमी' में कौन सर्वोच्च है? सर्वोच्च न्यायलय और संसद में कौन सर्वोच्च है? क्या सर्वोच्चता की तुलना संसद बनाम आम नागरिक, तथा संसद बनाम सर्वोच्च न्यायलय ही होनी चाहिए?, या, संसद आम नागरिक का प्रतिनिधि है, और शक्तियों का संतुलन हेतु सर्वोच्चता की तुलना का उत्तर है ही नहीं, अपितु संसद और राष्ट्रपति के मध्य शक्तियों को संतुलित रख छोड़ने की मंशा है?

फिर, जब केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया तब भाजपा ने इसे "भगोड़ा" कहा, जबकि केज्रिवाल ने इसे "त्याग" कहा।

प्रश्)- एक भगोड़ा को एक त्यागी से कैसे भिन्न करा जाए? कैसे सिद्ध हो की केजरीवाल ने क्या किया? क्या राजा रामचंद्र ने अयोध्या का राजपाठ त्यागा था की वह भाग गए थे। और लाल बहादुर शास्त्री ने?

जब तर्कों और विचारों में मरोड़ उत्पन्न होता है तब यह कैसे पता करे की दोनों समान्तर मरोड़े विचारों में कौन सा विचार न्यायोचित है, और कौन सा नहीं।

प्रश् था)- धर्म क्या है? धर्म किसे कहते हैं? महाभारत में कृष्ण ने कैसे तय किया की धर्म पाडवों के पक्ष में हैं? और जब पांडवों ने भी निहत्थे भीष्म, कर्ण और दुर्योधन की जंघा पर वार किया ही था, तब धर्म उनकी और  ही है, कैसे सिद्ध होगा?

आधुनिक प्रजातंत्र में निति निर्माण, नियमों के संसद में पारित होने में धर्म का क्या स्थान?
नियम-कानून को धर्मसंगत बनाना चाहिए, या सुविधा प्रिय, या लोक लुभावन?

क्या आवशयक है की जो लोक लुभावन हो, वह सुविध मुखी हो, और वह धर्म संगत भी हो?

क्या नागरिक को "नियमों के पालन" अनुसार कर्त्तव्य निभाना चाहिए, या "धर्म" अनुसार? यदि किसी नागरिक को किसी नियम के पालन हेतु कोई कार्य करना था, मगर वह अपनी अंतःकरण की ध्वनि के कहने पर वह कार्य नहीं करता है, तब वर्तमान संविधान के ढांचे में ऐसे नागरिक के लिए क्या नियति तय की गयी है?

विज्ञान का धर्म , अंतरात्मा , अंतःकरण इत्यादि के लिए क्या नजरिया है? और आधुनिक संविधानों में अंतरात्मा, अंतःकरण इत्यादि के अस्तित्व पर क्या नजरिया है?
आपकी समझ से आम नागरिक, आपके आस पास के दोस्तों, मित्रों का अंतरात्मा पर क्या नजरिया है?