अहंकार और सत्यवाचकों को अनसुना करने का आचरण

चुनाव जीतने के लिए सामाजिक चितंन तक को खोखला कर देने से परहेज़ नही किया था।।
तो अब आत्ममुग्धता के पीड़ित आदमी से बौद्धिकता की अपेक्षा कैसे करि जा सकती है? तब भी सत्यवाचकों ने चेतवानी दी थी की संस्थओं के संग छेड़खानी राष्ट्र निर्माण के कार्य में महंगी कीमत पड़ेगी, तुम चुनाव जीतने की छोटी उपलब्धि तो प्राप्त कर लो गे, मगर दीर्घकाल में समाज में से एकता को नष्ट कर दोगे।

मगर आत्ममुग्धता से ग्रस्त इंसान सत्यवाचकों की ध्वनि को सुनता ही कहां है ?!

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