आज़ादी चाहिए तो सबसे पहले गुलामी के आचरण और मूल्यों को चिन्हित कीजिये

किसको चाहिए आज़ादी और किससे ?

भई, इंसान को कैद इंसान की मानसिकता ही रखती है। जब मानसिकता में मनोविकृति बन जाती है।  कैसे आई होंगी यह सब प्रकार की गुलामियां जिनसे आज़ादी के लिए संघर्ष हुये और हो रहे हैं :- भारतियों को अंग्रेजों से आज़ादी चाहिए थी। देश आज़ाद हुआ, आज़ादी मिली; कश्मीर को भारत से आज़ादी चाहिए थी, विशेष प्रावधान अधिनियम बना, आज़ादी मिली ; दलितों को उच्च वर्गों से आज़ादी चाहिए थी, आरक्षण बना, आज़ादी मिली ; स्वतंत्र चिंतन को धार्मिक उन्माद से आज़ादी चाहिए थी, देश सेक्युलर भी बना, आज़ादी मिली।
मगर फिर क्यों यह सब गुलामियों के तौर तरीके आज भी देखने सुनने को मिल रहे हैं। क्यों फौजों में ख़राब खाना खिलाया जाता है और शिकायत करने वाले को प्रताड़ित किया जाता है? क्यों फौजदार सिपाहियों से व्यक्तिगत सेवा लेता है? क्यों ऑफिसों में boss is always right कल्चर चलता है ? क्यों प्रशासन में पॉलिटिशियन और ब्यूरोक्रेट की धाक चलती है ? क्यों खेल में कोच की मर्ज़ी चलती है, जी हजूरी और खुशामद चलती है , खिलाड़ियों का कौशल नहीं ?

शायद कही कुछ गलती हुई है हमारी शिक्षा नीति में। उसने हमें कुछ गलत पढ़ाया है, कुछ छिछला सा यह बताया है कि 'देश को किसने ग़ुलाम बनाया था ? -- अंग्रेजों ने' । उसने हमें यह नहीं बताया कि ग़ुलामी का अंश काया का रंग नहीं था, बल्कि असमान न्याय था । और असमान न्याय होता है सामंतवाद में। इसलिए ग़ुलामी खत्म करने के लिये अंग्रेजों को भारत छुड़वाना इलाज़ नहीं था, बल्कि सामंतवाद का ख़ात्मा ग़ुलामी से मुक्ति का जरिया था।
और सामंतवाद का निवारण होता है rule of law से । जब मनमर्ज़ी वाले कानूनों , व्यक्तिनिष्ठ पैमानों से मुक्ति मिलती है, जब discretion और arbitrariness से मुक्त कानून का चलन आता है। आज़ादी क्या खाक मिलेगी अगर ऑफिसों में आज भी performance evalutaion में व्यक्तिनिष्ठता को खेल करने का अवसर मिलेगा । जब बिना किसी स्पष्ट कारण ही सेना प्रमुख अपने दो वरिष्ठों को लांघ कर बन जायेगा। जब कुछ रंगीन "कारणों"  का बहाना दे कर मनमर्ज़ी करी जाती रहेगी। जब शिकायत कर्ता भुगतभोगी  को ही और यातना दी जाती रहेगी ।

आज़ादी की लड़ाई तो स्वाभाविक अंतहीन चलती ही रहेगी, बड़ी इकाई की छोटी इकाई से, फिर छोटी इकाई की और अधिक छोटी इकाई से । मगर असल आज़ादी कभी मिलेगी ही नहीं  अगर हमने सामंतवाद से मुक्ति के मार्ग को नहीं पहचान किया तो। सामंतवाद खुद इंसानी मनोविकृति में से ही तो आता है।इसलिए कहते है की इंसान को ग़ुलाम उनकी मानसिकता ही तो बनती है।

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