भ्रम और प्रतीकात्मकता

यह मानव मस्तिष्क की अनंत काल से दुविधा रही है कि वह धीरे धीरे किसी प्रतिक और प्रतीक चिन्हों को ही संप्रत्यय(abstract, conceptual) के स्थान पर एक वस्तु समझ लेता है, जो की असल में संप्रत्यय ही है। उदहारण के लिए किसी भी भगवान् की मूर्ति --> मूर्ति मात्र एक प्रतीक है उस संप्रत्यय श्रद्धा सुमन भगवान् का, मगर मूर्ति खुद एक भगवान् नहीं है। मूर्ति खुद में एक पाषाण ही है।

परीक्षा के अंक --> अंक मात्र एक सूचक होते हैं संभावित ज्ञान के, और ज्ञान सूचक होता है बुद्धिमानी का , और फिर बुद्धिमानी सूचक है बौद्धिकता का। मगर परीक्षा के अंक स्वयं में बुद्धि, बुद्धिमानी और बौद्धिकता नहीं है। अच्छे अंक वाले व्यक्ति भी बुद्धू होते हैं और अनपढ़ भी बौद्धिक हो जाते हैं।

लाल बत्ति कल्चर एक प्रतीक है आज कल के कूटनेता और आम आदमी के बीच के अवयव अंतर का। लाल बत्ती अपने आप में अपराध/असामाजिक नहीं थी। अभी भी लाल बत्ती संवैधानिक पद , अग्निशमन वाहन ,और चिकित्सीय वाहन के लिए मान्य है।

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