कितना उचित समझा जाना चाहिए ISRO के वैज्ञानिकों का तिरुपति दर्शन ?

 ISRO के वैज्ञानिक चंद्रयान ३ के प्रक्षेपण से पूर्व तिरुपति जा कर भगवान के दर्शन करके आशीर्वाद लेकर आते हैं।

क्यों न करे वे ऐसा? आखिर 1947 की आजादी तो केवल शारीरिक बेड़ियों को तोड़ने वाली आजादी थी बस; गोरी चमड़ी वाले अंग्रेजो की आर्थिक गुलामी से केवल एक राजनैतिक मुक्ति थी वह। मानसिक गुलामी तो हजारों सालों की हो चुकी है भारत वासियों की। 

किस प्रकार की मानसिक गुलामी ? 

तर्क और कुतर्क का मिश्रण कर देने वाली कुबुद्धि; आस्था और विवेक में भेद नहीं कर सकने की बेअक्ल; श्रद्धा और logic को सहवास करवाने की अयोग्यता; गंगा और गंदे नाले को मिला देने की संस्कृति। 

भारत के समाज में विज्ञान का प्रवेश धर्म के प्रधानों के खिलाफ संघर्ष करके  नही हुआ है, अपितु किताबों के माध्यम से हुआ है। स्कूली शिक्षा से "माता सरस्वती" का नाम प्राप्त करके हुआ है। धर्म के प्रधानों ने विज्ञान को समाज में आने से पूर्व ही द्वारपाल बन कर उसको लाल कपड़े में लपेट दिया था। और उसके बाद से समाज में विज्ञान का परिचय "माता सरस्वती" करके दिया हुआ है।

 आज उसी परिचय से विज्ञान को जानने समझने वाला वर्ग ISRO का वैज्ञानिक बन गया है। उसे यूरोप का सांस्कृतिक इतिहास थोड़े न मालूम है, जहां कि विज्ञानवादियों ने कैसी कैसी कुर्बानियां दी थी, संघर्ष किया था विज्ञान की बाल्यावस्था में, मात्र उसका अस्तित्व बचाए रख सकने के लिए, इस समाज में । विज्ञानवादियों ने यह संघर्ष वहां के धर्म के प्रधानों के विरुद्ध किया था। 

हालांकि धर्म के प्रधान चाहे वहां के रहे हों, या यहां के, मानसिकता से दोनो एक किस्म के है— मगर समाज को ये बात कहां समझ आती है ? भारत के धर्म प्रधान ने अक्लमंदी दिखाई --और विज्ञान के हाथों अपनी प्रभु सत्ता गंवा बैठने से पहले ही मौका देख कर चौका लगा डाला -  विज्ञान का परिचय बदल कर !

आज यूरोप वाले समझ रहे हैं कि भारत कितना Secularism को अग्रसर समाज बन रहा है; जबकि भारत वाले समझ रहे है कि हमारी उच्च कोटि धार्मिक प्रवृत्ति हमे विज्ञान की उपलब्धियां प्रदान करवा रही है।

हम उन्हीं के मिले अन्न्न को खिचड़ी कर रहे हैं, और वे हमारी खिचड़ी को एक नया, नायाब व्यंजन समझ रहे हैं।

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