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क्या अहंकार और आत्ममुग्धता में अंतर होता है? यदि हां, तो क्या?

 जब इंसान में ज्ञान आने लगता है तब उसमे ego जन्म लेने लगता है, और जब इंसान में ज्ञान नहीं होता है, तब इंसान में narcissism जन्म लेने लगता है। इंसान दोनो दिशाओं में फंसा हुआ है।आत्मबोध के बगैर बच पाना मुश्किल होता है। Ego वाला इंसान स्वयं को दूसरे से अधिक श्रेष्ठ साबित करने में व्यसन करता है, जबकि narcissism वाला इंसान दूसरे को स्वयं से तुच्छ साबित करने में व्यसन करता है। Ego ज्ञान यानी बाहरी सासंकारिक बोध का प्रतिनिधत्व करती है। Knowledge से ego जन्म लेती है। जबकि Narcissism अत्यधिक self knowledge का प्रतिनिधित्व करती है। जब इंसान बहुत अधिक अपने में तल्लीन हो जाता है कि वह बाहर की दृष्टि से स्वयं को देखने छोड़ देता है, तब आतम्मुग्ध हो जाता है। अत्यधिक आत्म बोध करने से आत्म मुग्धता आती है। Knowledge : Self Knowledge : : Ego : Narcissism

भारत वासियों में शाकाहारी होने के पीछे क्या कथा छिपी हुई है ?

  भोजन प्रकृति के विषय में एक गहरा, क्रमिक-विकास सांस्कृतिक सत्य बताता हूँ आप सभी को ------- मनुष्य जाति आरम्भ से धरती के सभी भूक्षेत्रों में सर्वाहारी (वे जीव जो दोनों, मांस एवं वनस्पति, का भक्षण करते है ) रही है।   इस कारण से मनुष्य जाति में आरम्भ से ही कई सारे शारीरिक कष्ट भी रहे है।  जैसे कि , मांस में जल्दी कीड़े लग जाते हैं, सूक्षम बीमारी वाले जीवाणु  जल्दी मांस युक्त भोजन को ख़राब कर देते हैं, और यदि मांसाहारी मनुष्य उन जीवाणुओं को भी भक्षण कर ले ये सोच कर कि वह तो पहले ही माँसाहारी पाचन तंत्र से लैस है, उन्हें पचा जायेगा -- तब वह पूरी तरह गलत है ! सूक्ष्म बीमारी वाले जीवाणु (बैक्टीरिया , वायरस , अमीबा ) इंसानी शरीर में प्रवेश करके जटिल बीमारियां देते है।  युवा अवस्था में तो इंसान भले इन बिमारियों को झेल जायेगा, मगर उम्र बढ़ने के साथ मुश्किल आने लगती है।   आरम्भिक युग में समाज को बीमारियां इंसान के शरीर और मन के कष्ट बन कर दिखाई पड़ती थी। संभवतः इसरायली यहूदी लोग प्रथम समूह था मानव जाति का जिन्होंने भोजन और शरीर के कष्टों के बीच का सम्बन्ध कुछ...

We become polarised when we ...

We become polarised when we We become polarised when we start to see only one face of the coin  we hear only one side of the story We become polarised when we  abjure the Middle Path  we renounce the Enlightenment  we abandon the Buddha We become polarised when we  adopt too much of Lokniti  we become the Charvaks  we begin to think that searching for the Truth ... .      ...is the most futile exercicse We become polarised when we  forget the Rational Thinking,  When we  become versed in tampering the evidence  when we  forget to show our humble acceptance... ... ........ of the proof

बच्चों को ताश का खेल सिखाना

 सोच रहा था कि बच्चों को ताश खेलना सिखाऊँ।   ताश के खेल में बहुत किस्म की अक्ल को विक्सित और प्रयोग करने की ज़रुरत पड़ती है, जिनको व्यावहारिक जिंदगी से हासिल करना बहुत दुर्लभ होता है।  मिसाल के तौर पर -  १) दूसरे के पत्तों को बूझना उसकी अभी की चाल को देखते हुए -- inference और deduction बुद्धि कर प्रयोग करके।   २) अपनी अभी की चाल को decide करना भविष्य में आने वाली चाल या हालात की पूर्व दृष्टि क मद्देनज़र। prudence  ३) पहचान करना सीखना की कब हमारे खेल में सही चाल नहीं  चलने की वजह से हम हार गए हैं, और कब वाकई में पत्ते ख़राब आने से हमारा हार जाना तय था (जिसमें कुछ दुखी /बुरा नहीं मानना चाहिए। ) ४) और यदि नक़ल या cheating  हो रही है , तब उसे पकड़ना , और साथ में सफलता पूर्वक cheating  करना सीखना।  मगर तभी एक बात कौंधी दिमाग में -- कि , ताश का खेल (या कोई भी खेल ) बच्चों को मात्र सीखा देने से आप ये सब हांसिल नहीं कर सकते है।  खेल इस लिए नहीं पसंद या नापसंद किये जाते हैं क्योंकि उन्हें खेलना नहीं आता है , बल्कि इसलिए कि उन्हें खेलने ...

क्या होता है "पौरुष प्राप्त कर लेना"

जब इंसान का जीवन रस मयी हो जाता है, तब वह विश्वास से ओत प्रोत रहने लगता है, तमाम सफलताएं उनके कदम चूमने लगती है, सब उसे पसंद करने लगते हैं, वह लोगों की रुचि का केंद्र बनने लगता है, उसकी बातें सभी को मंत्रमुग्ध सुनाई पड़ने लगती हैं, उसका शरीर कष्ट मुक्त अनुभव करने लगता है, वह दीर्घायु प्राप्त करने लगता है, उसके रिश्ते मधुर बनने लगते हैं,  शायद इसी अवस्था को हिंदी भाषा में कहते हैं, "पौरुष प्राप्त कर लेना " (pinnacle of his existence)। वैसे शाब्दिक रूप में "पौरुष" का अर्थ होता है पुरुष होने वाले गुण और भाव अनुभव कर लेना। मगर , अभिप्राय में पौरुष प्राप्ति के मार्ग कुछ अन्य है, जैसा कि आगे विमर्श में लिखा है। पौरुष प्राप्त करने का सबसे महत्वपूर्ण कदम होता है भावनाओं को बहने का मार्ग उपलब्ध करवाना ।  और भावनाओं को बहने का मार्ग मिलता है कलाओं में से। आरंभिक युग में ये मार्ग होता था गीत गुंजन से, संगीत वाद्य यंत्र बना लेने से, gymnastics इत्यादि शरीर की बेहद कठिन कलाओं को अर्जित कर लेने से। Gymnastics करने हेतु शरीर और मस्तिष्क को एक sync में संचालित करने की योग्यता लगती ...

सांस्कृतिक आधुनिकता का मार्ग— तार्किक मंथन को अनुमति देना कि समाज में न्याय नीति में परिवर्तन कर सके

लेख में मैं विज्ञान के लिए एक दूसरा, नया शब्द प्रयोग करना चाहूंगा, तार्किक मंथन (Rational Thinking)। तो ,पश्चिमी समाज में भी, भारत की ही तरह, औरतों को कमज़ोर, निर्बुद्ध, गुलाम , "ताड़न के अधिकारी", करके समझा जाता था, जब तक की उनके समाज ने तार्किक मंथन करने का मार्ग नहीं पकड़ा था। ये तार्किक मंथन क्रिया ही थी जिसने इंसानों को यह बताया कि ऐसा सोचना गलता है। तार्किक मंथन से ही वह प्रमाण निकल सके जिन्होंने ये सिद्ध कर दिया कि औरतों पुरुषो से कम नहीं होती हैं, यदि उनको भी पर्याप्त अवसर प्रदान किए जाए।   तार्किक मंथन समाज के समस्त पुरुषों में उपलब्ध कभी , किसी जमाने में नही था। केवल कुछ चुनिंदा व्यक्ति ही तार्किक मंथन कर सकने के काबिल थे, और आज भी, होते हैं। ये ही वह लोग थे(और होते हैं) जिन्होंने तार्किक मंथन को अपने जन्मजात मिली न्याय और नैतिकता को बदल जाने देना का अधिकार दिया होगा। तब जाकर उन्होंने महिलाओं को समाज में उनको सर्वोच्च स्थान को प्राप्त कर सकने का अवसर दिलवाने का मार्ग स्वीकृत किया होगा। अन्यथा , आप इतिहास टटोल कर देख लीजिए, महिलाओं ने कोई युद्ध थोड़े न लड़ाई लड़ कर ...

कितना उचित समझा जाना चाहिए ISRO के वैज्ञानिकों का तिरुपति दर्शन ?

 ISRO के वैज्ञानिक चंद्रयान ३ के प्रक्षेपण से पूर्व तिरुपति जा कर भगवान के दर्शन करके आशीर्वाद लेकर आते हैं। क्यों न करे वे ऐसा? आखिर 1947 की आजादी तो केवल शारीरिक बेड़ियों को तोड़ने वाली आजादी थी बस; गोरी चमड़ी वाले अंग्रेजो की आर्थिक गुलामी से केवल एक राजनैतिक मुक्ति थी वह। मानसिक गुलामी तो हजारों सालों की हो चुकी है भारत वासियों की।  किस प्रकार की मानसिक गुलामी ?  तर्क और कुतर्क का मिश्रण कर देने वाली कुबुद्धि; आस्था और विवेक में भेद नहीं कर सकने की बेअक्ल; श्रद्धा और logic को सहवास करवाने की अयोग्यता; गंगा और गंदे नाले को मिला देने की संस्कृति।  भारत के समाज में विज्ञान का प्रवेश धर्म के प्रधानों के खिलाफ संघर्ष करके  नही हुआ है, अपितु किताबों के माध्यम से हुआ है। स्कूली शिक्षा से "माता सरस्वती" का नाम प्राप्त करके हुआ है। धर्म के प्रधानों ने विज्ञान को समाज में आने से पूर्व ही द्वारपाल बन कर उसको लाल कपड़े में लपेट दिया था। और उसके बाद से समाज में विज्ञान का परिचय " माता सरस्वती " करके दिया हुआ है।  आज उसी परिचय से विज्ञान को जानने समझने वाला वर्ग ISR...