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आत्म -पूजन मनोविकार से कुटिल बुद्धि चिंतन की कड़ी

        क्या यह संभव है की पुराने सामंतवाद के युग का आत्म-पूजन मनोविकार हमारे आधुनिक प्रजातंत्र में कुटिल बुद्धि का कारक बना हुआ है ? कुटिल बुद्धि से मेरा अर्थ है जुगाड़ बुद्धि (crooked thinking), वह जो विचारों के अर्थ को उसके ठीक विपरीत कर के समझतें हैं / पुराने युग में सामंतवादी , ज़मीदार, अक्सर आत्म-पूजन मनोविकृत लोग हुआ करते थे/ इसलिए क्यों की उनके पास जनता पर शासन करने के ताकत असीम थी/ भई कोई सरकार , कोर्ट, कचेहरी तो थी नहीं/ राजा-रजवाडो का ज़मान था/ अगर राजा को शिकायत करें भी तब भी राजा से ज़मींदार की नजदीकियां उनकी ताकत का पैमाना बन कर दिखाती थी /        रामायण का पूरी कहानी रावण के अन्दर बैठे अहंकार से उत्पन्न हुए त्रुटियों को झलकाती है / आश्चर्य है की यही अहंकार को उसके सही मानसिक-रोग के लक्षणों में हम लोग आज भी नहीं पहचान सकें और आज के युग में भी भारतीय संस्कृति में लोगो की एक दूसरे से सर्वाधिक जो शिकायत रखतें है वह है 'ईगो' की /           "ईगो प्रॉब्लम" इंसान में व्याप्त 'अहम्' का ही बढा हुआ स्वरुप है/ अहम् ह...

सम्मान क्या है , और किसी राजनेता का सम्मान क्यों होना चाहिए

            बहोत दिनों से विचार कर रहा था की किसी राजनेता का सम्मान क्यों होना चाहिए ?    पहले तो, की यह भी एक बहुत जटिल सूझ का विचार है कि सम्मान है क्या और किसी का सम्मान करने में क्या घुमावदार उलझी बातें है ।    सम्मान को ज्यादातर कुछ शब्दों और कुछ ख़ास संस्कारो के द्वारा दर्शाते है, जैसे बात-चीत में 'आप' का प्रयोग और चरण स्पर्श इत्यादि से । एक उलझी हुई बात यह है की ऐसा नहीं की सभी भाषाओँ में "आप" या उसके सम-तुल्य शब्द है किसी के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए । उधारण में अंग्रेज़ी को लीजिये , जिसमे सिर्फ "यू" शब्द ही है, हर एक के लिए, चाहे बड़ा, चाहे छोटा। और सम्मान के लिए खोई ख़ास अलग शब्द नहीं है, या यूँ कहे की सभी के लिए एक समान का सम्मान है।  कुछ ऐसे ही हाल इधर भारत में भी कुछ भाष्यों में मिलता है, जैसे मुंबई की मुंबईया-हिंदी में,या हरयाणवी-हिंदी में । इसके विपरीत हिंदी (और उर्दू) में अगर "आप" सम्मान के लिए है, तो फिर "तू" या 'तुम" किस मनोभाव के लिए यह आप खुद ही सोचने के लिए आज़ाद हैं ।            ...

समालोचनात्मक चिंतन का आभाव --भारतीय शिक्षा पद्वात्ति की मुख्य गड़बड़

समालोचनात्मक चिंतन (= सम + आलोचना + त्मक , अर्थात, सभी पक्षों या पहलुओं की समान(=बराबर) रूप में आलोचना करते हुए उनको परखना , उनके सत्य होने के प्रमाण दूड़ना) (अंग्रेजी में, क्रिटिकल थिंकिंग, critical Thinking) एक प्रकार का बुद्धि योग है /        भारतीय शिक्षा पद्वात्ति में जिस पहलू पर गौर नहीं किया गया है, वह क्रिटिकल थिंकिंग है / ऐसा पश्चिम के समाजशास्त्रियों का भारतीय शिक्षा पद्वात्ति के बारे में विचार है / भारतीय शिक्षा में मूलतः स्मरण शक्ति पर ही ध्यान दिया जाता है / वैसे भारतियों को भी इस बारे में एहसास है की उनकी शिक्षा पद्वात्ति में कुछ गड़बड़ ज़रूर है , मगर यही "समालोचनात्मक चिंतन" की कमी से अक्सर हम लोग इस गड़बड़ी की जानकारी को भी अपनी स्मरण शक्ति द्वारा ग्रहण करते है और एक दूसरे को यह बतलाते फिरते है की यह कमी "प्रैक्टिकल नॉलेज " ( प्रयोगात्मक जानकारी ) की कमी की है /              'प्रैक्टिकल नॉलेज' एक मुख्य गड़बड़ नहीं है , और क्यों और कैसे नहीं है यह भी समझने के लिए कुछ समालोचनात्मक चिंतन होने की आवश्यकता है , जो की आ...

ज़मीर-बिन वकील और निति-निर्माण करने वाले राजनेता

एक बेहद भ्रमकारी और बहस वाले तर्क का प्रयोग करते हुए राजनीति में बैठे शैक्षिक योग्यता और पेशे से वकीलों ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था को प्रजातांत्रिक तरीके से मात दे दी है/ अब 'लाभ के पद' पर ही विवेचन करिए / यह सिद्धांत इस लिए बनाया गया होगा की राजनीतज्ञों को शासन से मिली निति-निर्माण की शक्ति का प्रयोग  स्वः  हित में न हो / अब यानी राजनीतिज्ञों को राजनीति में आने से पूर्व अपने सभी व्यवसायिक संबंधो को कम से कम दस्तावेजों पर तोह विच्छेद कर हे देने चाहिए / मगर राजनीति कर रहे वकीलों की चपलता देखिये / आज ज़्यादातर राजनितज्ञ व्यवसायी है , और यही नहीं, वह उन कमेटियों में भी शामिल है जो उन विषयों पर निति-निर्माण करती है जो विषय उनके व्यवसाय से सीधा सम्बन्ध रखते हैं / और प्रश्न करे जाने पर राजनीतिज्ञ -वकील अपना आम आदमी का मौलिक अधिकार का वास्ता दे कर कहते है की "भई, मैं एक जन-प्रचलित सम्मानित राजनीतिज्ञ हूँ, एक व्यवसायी हूँ, और मेरे व्यवसाय के द्वारा कितने लोगों की नौकरी मिल रही है, कितनी के घर का चूलाह जल रहा है/ इसमें गलत क्या है / मेरा व्यवसाय ही तो मेरे समाज-सेवा का माध्यम है /...

Why are we so lazy ?

Laziness. we often accuse some of out rivals, their entire community of being Lazy. Like I'd like to say, "Indians are the laziest of all people i know of". So, what is laziness? What is the psychology of laziness? What is the evolutionary origin of Laziness?   Wikipedia speaks of laziness as "Laziness (also called indolence) is a disinclination to activity or exertion despite having the ability to do so. It is often used as a pejorative". Almost all the religions describe as a great sin. In Economics, Laziness is described as the purpose of all our hard work ! if laziness is taking a leisure and break from work, then one of the agenda of every hard working man is to take a great rest from work someday and laze around. ((((((((   quote from the website http://ronnyeo.wordpress.com/2008/08/06/evolutionary-psychology-laziness/   )))))))))) Our brain induce pleasure in order to motivate us to eat, socialize, copulate,  getting things which are hard-to-get, and...

Fallacies...the "maya"

Once a Fallacy situation is created, in the current scenario between the anti-graft campaigners and the "anti-destabilize protectors", the method to resolving out the fallacy would circle around the other *un essential information* about each other. The unesential informations become the most significant vital details: who wear what clothes, who dress like what, who said what and when, and so on.  Human life an unending trap of "maya", the "bhram" and the unlearned , unclear minds can never come out of it. Knowledge is not just information compilation, but sometimes the cause of our bondage if we do not know how to manage and collate the information. That again brings me to topic of difference between Intellectualism and Intelligence. The search of justice, the Dharma, is an never ending task for human beings, and Intelligence, the act of information gathering, is merely and essentially the first step, but not the last and only step. To make sense from t...

भारतीय प्रजातंत्र ...क्या यह उदारवादी तानाशाही का भ्रमकारी स्वरुप है ?

उदारवादी तानाशाही (benevolent dictatorship ) राजनीति शास्त्र में चिन्हित एक किस्म की शासन व्यवस्था है / इसकी एक खासित्यत यह है की यह प्रजातंत्र से मिलती-जुलती होने की वजह से प्रजातंत्र से भ्रमित हो सकती है / एक और शाशन प्रणाली , प्रबुद्ध निरंकुश राजशाही (enlightened absolutism ) , की भी यह खासियत है की वह प्रजातंत्र से भ्रमित करी जा सकती है /             तानाशाही में ज्यादातर तो तानाशाह एक बहोत की क्रूर , निर्दयी , सिर्फ अपनी मर्ज़ी से चलने वाला शासक होता है / मगर उदारवादी तानाशाही में शासक जनता पर जुल्म ढाने में व्यसनित नहीं होता बल्कि उनको उनके गरीब हाल पर जीवन-यापन के लिए छोड़ देता है / यदा कदा उनकी ज़िन्दगी में कुछ ख़ुशी के अवसर भी प्रदान करवाता है, और कुछ एक व्यवस्था से उनको जीवन में आगे बड़ने की उम्मीद भी दिलवाता है / इससे जनता में ना-उमीदगी नहीं फैलती और वह कभी भी शासक के विरुद्ध विद्रोह के लिए एकमत हो कर खड़े नहीं होते / शासक की तानाशाही अपनी रहा यूँ ही चलती रहती है, और जनता अलग अपनी राह पर , अपना जीवन सुधारने के संघर्ष में आजीवन व्यस्त रहती है / ...