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Showing posts from 2018

The effects of Helmet laws on the Intellectual courage of liberated people ; the Fake Reasonings

this kind of video is custom-generated just to spread scare ! Think critically, if u may, you should notice that Helmet is a mitigating device, not a preventive device. The better action is the preventing action, not the curative or mitigating action. A helmet makes ZERO contribution in preventing an accident. The helmet, may , IF AT ALL, come of use POST AN ACCIDENT, not before an accident. ___-____+____-___+____- Sometimes there is no actual horror in the story. It is only the work of cameraman by shaking the camera, taking some acute angle shots, and then the sound editors adding the background score , which give a feeling of scare. The Helmet wearing "inspirational" videos are in the same line. The logic of un-avoid-ability of the helmet device has never been found. The Video-makers generate them only from their own imaginary stories. One can create such "inspirational" stories for other devices as well -like, for driving gloves, the windsheeter jackets, the …

लोक सेवा भर्ती में घटाई गयी उम्र

अब लोक सेवा की भर्ती की उम्र घटाने से देश का कौन सा भला हो जाने वाला है?
एक सेवादार लोकप्रशासन किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी ज़रूरत है। मगर जिस तरह की अजब-गज़ब आदेश हमारे देश की सरकारें देती रहती है - जैसे कि हाल का आदेश जनता के कंप्यूटर डाटा का बे-रोकटोक ताका झाँकी, और बढ़ती महंगाई में बार बार भाजपा-कांग्रेस के कुचक्र में फँसता हुआ राजनैतिक विकल्प,--
तो आखिर आयोग में भर्ती की उम्र को कम कर देने से क्या मुक्ति मिलेगी आम आदमी को? लोकसेवा आयोग से ज्यादा तो जनता और मिडिल क्लास को यह बात समझनी पड़ेगी की लोकसेवक लोग आखिरकार समाज के आर्थिक पटल पर production से जुदा लोग है, जो की आखिरकार खाते तो हैं professionals, agriculturist और businessmen के जमा कराये टैक्स से ही हैं। तो फिर हम क्यों यह उम्मीद करें की लोक सेवा वाले कभी भी एक real solution देंगे समाज में कुप्रशासन और बढ़ती महंगाई के? Fake Reasonings की ही तरह Fake Solutions भी होते हैं। प्रबंधन शास्त्रियों के द्वारा दी जाने वाली मिसाल Dakota Indians Dead Horse Theory एक समूचा उदाहरण हैं की कैसे लोक सेवक देश में बढ़ती सड़क दुघर्टनाओं का…

Loyalty versus Dharma :- Challenges due to varying standards in the Indian society

They surely don't see it as a war between Good and Evil, truth and lie, righteousness and wrong, They see it as loyal versus traitors ! And that may best explain why people of this country fail to unite as one nation. And that is because the best string that ties the members of a society into oneness is the thread of Morality . Morality connects with Conscientiousness. Loyalty unfortunately connects through thesurrender ofVoice of Reason and Voice of Conscience. Loyalty leads to bondage and Slavery . They fail to understand that.

What are the different standards of Trust in the contemperory Indian society

Most Bhakts think that Trust is an emanation of Heart, a kind of Emotion which comes when someone have devotion towards something.Of course that is why they are Bhakts.सभी भक्त यह समझते हैं की विश्वास (Trust) एक उत्सर्जन है मानव हृदय का, एक प्रकार की भावना है जो की तब प्रवाहित होती है जब इंसान किसी अन्य व्यक्ति में अपनी श्रद्धा डालता है।
जाहिर है की ऐसे लोगों को तभी ही भक्त पुकारा गया है।
-----____++++______-----Trust यानी विश्वास के अलग अलग अभिप्राय होते हैं भक्त वर्ग और secular वर्ग में।असल में trust के प्रति यह अलग अलग दृष्टिकोण वही है जो की आस्तिक और नास्तिक के विवाद केंद्र में है; जो sacramentalist और secular के विवाद के केंद्र में है, जो rationalism और superstition के केंद्र में हैं।ज्यादातर आधुनिक विज्ञान में trust मस्तिष्क के चिंतन से निकलता है,  इंद्रियों के परीक्षण से ही प्रमाणित माना गया है।
पुराने युग में , जब ज्ञान के शोध इतना गहरा नही हुआ करता था, तब विश्वास एक भावना हुआ करती थी। भक्त वह वर्ग है जो आज भी trust को वैसे ही समझता है। जाहिर भी है, आप खुद महसूस कर सकते हैं की…

तानाशाही और ज़मीदारी प्रशासन पद्धति एक नैसर्गिक प्रबंधन कला है

ऐसा सोचना गलत है की प्रबंधन सीखने के लिए इंसान का पढ़ा लिखा होना ज़रूरी है। प्रबंधन के तमाम पद्धितियों में ज़मीदारी वाला तरीका तो हर इंसान नैसर्गिक तौर पर जानता है। ज़मीदारी पद्धति में जोर जबर्दस्ती, bullying, तथकथित indiscipline की सज़ा, तिकड़म बाज़ी, धूर्तता-मक्कारी, सारे दुर्गुणी व्यवहार एक मान्य युक्तियाँ होती है प्रबंधन करने की। बल्कि पढ़ाई लिखाई की ज़रूरत तो दूसरे उच्च मानसिक स्तर के प्रबंधन को सीखने के लिए ही होती है। जिसमे की आधुनिक प्रजातांत्रिक प्रबंधन पद्धति खास है। वरना तो अनपढ़ता या 'देहाती गिरी' की भी अपनी प्रबंधन पद्धति होती है- तानाशाही। देहाती गिरी इसलिए, क्योंकि अनपढ़ता देहात(=गाँव) में सहजता से मिलती है, वहां जीवन यापन में अनपढ़ता कोई  बाधा नहीं होती है। कई सारे प्रबंघकिये कहावते जो हम अक्सर सुनते पढ़ते रहते हैं, वह वास्तव में देहाती प्रबंधन व्यवस्था में ही लागू होती है। जैसे Wheel that makes the loudest noise gets the largest grease . तानाशाही "देहाती" पद्धति में ही किसी प्रकार के व्यवहार को प्रसारित करने का एक वजह कारन यह भी होता है की "Management  want…

राजनीति से ऊपर उठाने की ज़रूरत सिर्फ नेता नही, जनता की भी है

👆👆✍यह ऊपर लिखा मैसेज व्हाट्सएप्प पर कही से त्वरित हो रहा है।अगर बात सच भी है, तो भी एक बात हर एक भारतीय को सोचनी चाहिए। *वह यह कि हम लोग कब तक ऐसी नाकामियों को कभी भाजपा का और कभी कांग्रेस पार्टी की नाकामी सिद्ध करने में अपना दम लगते रहेंगे?*ऐसी नाकामियां किसी राजनैतिक पार्टी की नही, देश की होनी चाहिए जब देश में महंगाई ताबड़तोड़ बढ़ती जाए और एक दिन बैंकिंग प्रणाली का भी भट्टा बैठ जाये तो। अगर यह सब गुज़र जाए तो हमे राजनैतिक पार्टी की व्यवस्था से ऊपर उठ कर अपने तंत्र का मुआयना करने पर ध्यान देना होगा क्योंकि तंत्र तो दोनों ही पार्टियों को एक समान मिला था। तो फिर कैसे तंत्र खुद में विफल हो गया कि ऐसी चालबाजी करने में भाजपा अकेली, या कांग्रेस पार्टी अकेली, या की दोनों ही पार्टियां आपसी किसी मिलिभगति मे सफल हो गयी? आखिर खामियाजा तो भारत के नागरिक की जेब से जाएगा? आर्थिक स्वतंत्रता ही तो राजनैतिक स्वतंत्रता और जीवन मुक्ति का प्रथम गणतव्य स्थल होता है। जब इतनी बड़ी आर्थिक त्रासदी घटती है तब ही हम सब लोग आर्थिक ग़ुलाम बनते है , और तब हम और ज्यादा भाजपा-दोषी-कांग्रेस-दोषी के खेल में फँसते है। हमा…

संविधान के ढांचे में ही गड़बड़ होने से नौकरशाही बन जाती है अल्लाद्दीन का चिराग

एक बार यदि हम इस सच को समझ लें की गड़बड़ी के बीज संविधान में ही बोये हुए हैं, और वह क्या हैं, तब इस सच के ग्रहण से अलग ही logic और विचारधारा प्रफुल्लित होने लगेगी, जिसके अलग ramifications होंगे। उदाहरण के लिए, आप केजरीवाल जी से लोकपाल की मांग को किनारे रखने की बात सहर्ष करने लगेंगे।।आप को समझ आ जायेगा कि अगर सिसोदिया जी को यूँ ही स्कूलों का निर्माण और जैन जी को मोहल्ला क्लीनिक खुलते देखना है तो एकमात्र तरीका यही हैं की इन लोगों को सत्ता में बनाये रखने के लिए वोट दो। आप यह भी समझ जाएंगे की मात्र निर्माण हो जाने से सिसोदिया जी के स्कूल और सत्येंद्र जैन जी के क्लीनिक देश निर्माण में योगदान देंगे यह आवश्यक नही है। क्योंकि जब भी सत्ता पलटेगी, वापस इनको ध्वस्त भी आसानी से किया जा सकता है।
 यह सब भारत के संविधान के चौखटे में हो रहा है। यहाँ निर्माण से ज्यादा आसान है ध्वस्त कर देना। यहां नौकरशाही एक लावारिस पड़े अल्लादिन्न का चिराग की तरह है, जिसकी मर्ज़ी ही अंतिम सच है जो कि कुछ भी काम को हो जाने का तिलिस्मी भ्रम प्रदान करता रहता है आदमियों की आँखों में। सच यह है कि चिराग के जिन्न की मर्ज़ी है व…

नौकरशाही अधीनस्थ समझौते में रहती है राजनेताओं के संग

यूपी पुलिस इत्मीनान से बोलती है कि वह गौहत्यारों को पकड़ने की प्राथमिकता रखती है।अब बात को समझने के लिए न ही कोई "UPSC की तैयारी"  वाला हदों का ज्ञान चाहिए, न ही कोई राकेट साइंस लगेगी की राजनेताओं और नौकरशाह के बाच में शक्ति-संतुलन किस ओर झुका हुआ है, और क्यों और कैसे ऐसा हुआ है।यह पहली बार नही है पुलिस या किसी नौकरशाह की खुद 'कर्तव्य परायणता" की इज़्ज़त खराब हुई है राजनेता के आगे। इससे पहले उन्नाव कांड में एक साल लग गए FIR ही दर्ज करने में। कठुआ में यही "कर्तव्य परायणता "की इज़्ज़त लगी थी पुलिस की। सुनन्दा केस में सब छुट्टी पर भागने के चक्कर मे लगे रहे। dk ravi कर्नाटका IAS कांड में यही दिखा। सोहराबुद्दीन कांड और गुजरात के हालात तो पूछिये ही नही।जब पुलिस या कहें तो पूरी नौकरशाही का मुखिया- भारत का राष्ट्रपति- खुद ही एक पांच वर्षीय नौकरी वाला कोई पुराना, मार्गदर्शक मंडल वाला राजनेता हो, और उसके पद का चुनाव भी संसदीय लोगो को हाथों में बागडोर हो-- तो नतीजे यही मिलना तयशुदा है।अब यह गड़बड़ खुद संविधान में ही बोई हुई है।

आखिर कौन सा नया व्यावसायिक कौशल खोज निकाला है सेवानिवृत नौकशाही ने?

सेवानिवृत्ति के बाद नौकरशाहों को आजकल भारतीय उद्योग घराने बहमुल्य वेतन पर contract सेवा में लेने लग गये हैं।
सोचने वाली बात है की ऐसा कौन सा professional skill set होता है इन सेवानिवृत नौकरशाहों में की उनकी इतनी कीमत आंकी जाती है?
शायद political manipulatuion , bribery और fool proof contractual scandal कर लेना भी अपने आप में एक professional skill माना जाने लगा है। वरना आखिर ऐसा कौन सा बाज़ार में चलने वाला कौशल इज़ाद कर लिए है service class लोगों ने ?
किसी समय दुनिया के इतिहास में रसायन शास्त्रियों के कौशल ने साबुन बनाने के अपने कौशल से दुनिया का प्रथम multi national corporation दिया था - lever brothers। वर्तमान काल में information technology वालों ने आधुनिक दुनिया को silicon valley दी, बंगलुरु दिया।  मगर अब हज़ारो सालों की ग़ुलामी से तथाकथित ताज़ा ताज़ा "आज़ाद " हुए भारतीयों ने अपने आप में एक नया ही professional skill सेट खोज निकाला है जो की शायद न तो किसी कॉलेज में पढ़ाया जा सकता, और न ही एक इस खास पेशेवर बिरादरी के बाहर कोई आसानी से सीख ही सकता है -- manipulation !
जी हाँ। आप गौर क…

A comparison of the Indian Politico Adminitrative system

कौन है भारत के leftist जिन पर इतिहास के पाठ्यक्रम को मरोड़ने का आरोप लगता है

भारत मे अक्सर हिंदुत्ववादी भक्त दल यह आरोप लगाते रहते हैं कि इतिहास को leftist मार्क्सवादी विचारधारा के लोगो ने लिखा है, इस तरह से मरोड़ कर की इतिहास की स्कूली पाठ्यक्रम में उनके पक्ष के साथ ज्यादती करते हुए सही से प्रस्तुत नहीं किया गया है।एक मनोरंजक बात यह भी है कि ठीक ऐसा एक आरोप खुद भक्त हिंदुत्ववादी लोगों पर भी लगता है, दलित-पिछड़ा अम्बेडकरवादी लोगों के हाथों की भारत के धर्म शास्त्र से लेकर जंग-ए-आज़ादी तक इतिहास के स्कूली पाठ्यक्रम मे उनके लोगो पर हुए शोषण और उनके योगदान की वीरगाथाओं को ठीक से प्रस्तुत नही किया गया है।इधर इतिहास के स्कूली पाठ्यक्रम विषय के बारे भक्तबुद्धि चेतन भगत ने तो एक टिप्पणी यह करि हुई है कि यह व्यर्थ का विषय है जिसका आधुनिक समाज की तुरंत आवश्यकताओं को पूरित करने में कोई महत्व और उपयोग नही होता है।  इस विषय का उपभोग बस राजनीति की रोटी सेकने के लिए ही होता है लोगो के दिमाग मे एकतरफा इतिहासिक दृष्टिकोण को भर कर उनको वोटबैंक में तब्दील करके।बरहाल एक सवाल यह है कि कौन हैं यह leftist मार्क्सवादी लोग जिनको क्ष्रेय भी दिया जाता हमारे देश का इतिहास पाठ्यक्रम लिखने का…

Why does history take side with the winners of the war ?

आजकल जो  लोग यह शिकायत करते घूम रहे हैं कि इतिहास को leftist ने मरोड़ कर लिखा है और स्कूल शिक्षा में भारत के इतिहास पाठ्यक्रम में सिर्फ एकतरफा पक्ष के नज़रिए को ऊंचा करके दर्ज किया हैयह वही लोग है जिनको बच्चों पर वैसे भी स्कूली पाठ्यक्रम के load का अतापता नही है। यह लोग खुद अनपढ़, philister लोग है और बेवजह मासूम पढ़ने वाले बच्चों पर फिजूल के छिट्टपुट्ट
जानकारियों को रटते रहने का load देना है।---_-----_------_------__------- *Question* : Why do we know more about the intruders than our own warriors or kings.Answer
Because those great warriors or kings or the architect kings  could not prove to be victorious as their architecture monuments could not give to the society people with enough powerful skills that could help the king win the wars.So eventually the academics of History , which is always under pressure to trim down the contents to the "necessary" short lines , automatically takes favour with those historical figures who ruled over the society , as it is their deeds and a…

Indian dystopia : An outcome of the flawed wisdom of the Constitution makers and the subsequent courts

A more elucidating analogy to explain what our country and our Supreme Court has been doing by making the helmet-wearing compulsory, is a situation in the proverbial "andher nagari" (Dystopia), where the Government authorities make compulsory the carriage of Quinine tablets when the country is plagued by Malaria diseases, instead of setting out to cleanup the streets and the colonies. The Government authorities , since they have the power to write the rule books for the citizen, while also having a duty to do the routine clean-up, would never write a Law which may make compulsory on themselves to do some action , without doing which they may have to pay a fine. In the case of growing problem of criminalty in the Political space, the courts of this country continue to walk on their familiar line of idiocy . They see the problem as that of the citizen and the community , instead of the Political -administrative system 's own failure to ensure a Political neturality within…

Services are not Professionals, although they call themselves so in a cliché

It can be put as blind bet that the district administration Official must not even have made a visit to the site to make the safety and security assessment before signing the permission application. The 'services" are highly unprofessional people. They have no system operation manual, neither is there any check-list system , no system audits, no review meetings, no trainings, nothing.
Truthfully speaking, no man who collects his salary from the exchequer fund is a 'Professional". For the simple reason that such a man does not have to run in any market competition in order to improve his skills by which he may improve his income. "Services" people very often mistakenly think and label themselves as "Professional ". But the fact is that no working person who does not have to suffer the force of Market , the pressure of demand and supply, can qualify to think of himself as a Professional. The  academic knowledge in Commerce can testify the above s…

प्रशासनिक लापरवाही : गोरखपुर अस्पताल हादसे से बनारस पुल हादसा और अब अमृतसर रेल हादसे तक का सफर

गोरखपुर अस्पताल हादसे से बनारस पल हादसे तक क्या कोई जिम्मेदारी तय हो सकी? यदि नहीं, तो फिर तो अमृतसर ट्रैन हादसा तो बस एक कड़ी है, और न जाने ऐसी कितनी और कड़ियाँ अभी तो घटना बाकी है।क्या आपने कभी मंथन किया है कि क्या होता है उस समाज मे जिसमे लापरवाही के लिए किसी की जिम्मेदारी तय नही होती है।अरररे, मगर एक मिनट -- जिम्मेदारी तो तय हुई है एक केस में - मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई असम गए किसी मंदिर में दर्शन के लिए, और वहां हुई उनकी सुरक्षा की चूक में तुरंत जिम्मेदारी तय होते हुए एक आईपीएस अधिकारी को निलंबन किया गया।मगर फिर गोरखपुर हादसे में कैसे किसी डॉक्टर कफील को पकड़ा गया था, जिन्हें की बाद में कोर्ट से बरी किया गया ?
या फिर की बनारस पुल हादसे में सवाल तो उठे ,-- मगर कॉन्ट्रेक्टर पर, --और बाद में तो वह भी बरी रहा।तो फिर कब और कैसे तय होता की मुख्य न्यायाधीश की सुरक्षा चूक में तो कोई आईपीएस अधिकारी की जवाबदेही थी, मगर गोरखपुर अस्पताल हादसे में समय पर ऑक्सिजन सिलिंडर मुहैया नही करवाने के लिये, या फिर बनारस पुल हादसे में जिला या राज्य प्रशासन में बैठा कोई भी लोक सेवा स्तर का अधिकरी की जवाबदेही…