Saturday, June 10, 2017

जॉर्ज ओरवेल का विकृत कलयुगी उपन्यास "1984"

4 अप्रैल 2017 को अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के विरोध में देश के करीब 200 सिनेमा घरों में एक 1956 में रिलीज़ हुई श्याम/श्वेत फिल्म को फ्री में जनता के लिए नुमाइश करवाया गया। फ़िल्म का नाम था "1984"।

 क्या है यह फ़िल्म "1984" , और क्या सम्बद्ध है इस फ़िल्म का राष्ट्रपति ट्रम्प से ? 

 "1984" नाम की यह फ़िल्म अंग्रेजी उपन्यासकार जॉर्ज ओरवेल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। इस उपन्यास को ऑरवेल ने 1949 में लिखा था, और काल्पनिक श्रेणी का उपन्यास है जो कुछ राजनैतिक-प्रशासनिक व्यवस्था पर रचा बुना है।  मगर इतने पूर्वकाल में भी लिखे हुए होने के बावजूद इस उपन्यास में ऑरवेल की काल्पनिक शक्ति इतनी सटीक है कि वह जिस कलयुगी-विपरीत(dystopic) भविष्य की कल्पना करके सं 1984 को अपने ख्यालों में गढ़ते है, काफी सारे लोगों का मानना है कि वह आज राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के काल में सत्य होता साबित हो रहा है। 

सिनेमाघरों के मालिकों का मानना है कि जन जागृति के लिए इस उपन्यास और उस पर आधारित फिल्म का मंचन मुफ्त में करना राष्ट्र और सामाजिक हित में आवश्यक हो गया है।

 Orwell का यह उपन्यास अपने प्रकाशन के बाद कई सारे देशों में प्रतिबंधित हुआ । क्योंकि इसमें एक विकृत समाज की कल्पना रची हुई थी। मगर काफी सारे देशों में इसे भविष्य की चेतावनी के रूप में भी देखा गया। आखिरकार यह उपन्यास 200 से भी अधिक भाषाओँ में लिखा गया, और कई सारे प्रकाशनों ने इसे इतिहास के सबसे बेहतरीन उपन्यासों की सूची में शामिल किया। आज यह उपन्यास और इस पर आधारित फिल्म, दोनों ही इन्टरनेट पर सहज उपलब्ध है, इस मंशा के साथ की समाज और देशों के नागरिकों और सरकारों के भले के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

 "1984" उपन्यास में क्या पदार्थ है ?

1984 में बताया गया है कि 'आज' दुनिया में सिर्फ तीन ही महादेश बस्ते है। विश्वयुद्ध और परमाणु बमबारी के बाद दुनिया और जटिल हो गयी थी। कहानी एयरस्ट्रिप वन की है, जो की ओशिनिया नाम के महादेश की उपराज्य है। कुछ ठीक से याद नहीं है , मगर शायद अतीत में इसी उपराज्य को ब्रिटेन या इंग्लैंड , ऐसे ही किसी नाम से बुलाया जाता था। 
   बाकि के दो महादेश है *यूरेशिया* और *ईस्टासिया* । ओशिनिया महादेश असल में अमेरिका द्वारा ब्रिटैन और दक्षिणी अमेरिका देशों पर कब्ज़ा कर लेने से बसा है। 

यूरेशिया बसा है रूस द्वारा अधिकांश यूरोप पर कब्ज़ा कर लेने से। 

और ईस्टासिया बसा है चीन, जापान, दक्षिणी एशिया, भारत, और गरीब अफ़्रीकी देशी के एक हो जाने से। यह देश पहले तो एक confused लड़ाई लड़ते रहे थे, मगर फिर बाद में एक महादेश बनाने को राजी हो गए।

आज, यानि 1984 में, यह तीनों महादेश आपस में न ख़त्म होने वाली लड़ाई लड़ रहे है। सभी की समझ में आता है कि इस लड़ाई में कोई भी विजेता कभी भी नहीं आने वाला है, मगर वह फिर भी लड़ते रहते हैं।
असल में इनकी लड़ाई के पीछे एक षड्यंत्र है। वह आरम्भ होती है इनकी राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था से। 
ओशिनिया में उपन्यास का मुख्य पात्र ,विंस्टन स्मिथ, एक मंत्रालय में काम करता सरकारी कर्मचारी है। ओशिनिया में जो सरकार है, उसे "पार्टी" कह कर पुकारा जाता है। और यहाँ अब सिर्फ चार ही मंत्रालय हैं, ministry of truth, ministry of love, ministry of plenty, और ministry of peace। आज यहाँ की सरकार, यानि "पार्टी" ने अपनी खुद की एक नयी भाषा भी ईज़ाद कर लिया है और जिसे ओशिनिया का आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया है। इस भाषा को न्यूस्पीक यानी newspeak , बुलाते है। न्यूस्पीक में चारों मंत्रालयों का नाम उनके संक्षिप्त रूप में बोला जाता है, minitrue, miniplenty , miniluv , और minipec। इन चारों मंत्रालयों का काम अपने नाम का ठीक उल्टा है। 

विंस्टन स्मिथ जो की minitrue में काम करता है, उसका काम झूठ फैलाने का, ऐसे की "पार्टी" हमेशा सकारात्मक छवि में ही रहे। इन लोगों के सोचने का तरीका को doublethink करके बुलाया गया है, जिसने एक साथ दी विरोधास्पद विचारों को एक साथ सच माना जाता है। कब कौन सा विचार लागू करना है, यह पार्टी ही तय करती है। नियम यही है कि विरोधियों और विपक्ष पर नकारात्मक विचार को लागू करो और पार्टी पर सकारात्मक विचार को। 
1984 के आज के युग में सच कुक भी नहीं होता है। पार्टी जो भी बोलती या करती है, mini true मंत्रायल में स्मिथ का काम है की वह तुरंत सभी report, तस्वीर, दस्तावेज़, ब्यूरे, तथ्य में फेरबदल करके पार्टी की छवि के प्रति अनुकूल बना दे। आज इतिहास नाम की कोई वस्तु रह ही नहीं गयी है, क्योंकि न जाने कितनों ही बार हर जगह दस्तावेजों और तस्वीरों में फेरबदल या छेड़छाड़ हो चुकी है। मगर "पार्टी" इस छेड़छाड़ या फेरबदल की कार्यवाही को "आवश्यक सुधार" कह कर बुलाती है।

1984 के युग में कोई कानून नहीं होता है। यहाँ वह काम गलत है जो की पार्टी को नापसंद है। यहाँ की पुलिस नहीं होती है, कोई टैक्स, कुछ भी नहीं है। बस एक ही पुलिस है, thought police, जो की मिडिल क्लास लोगों के ऊपर हर समय निगाह बनाये रहती है। मिडिल क्लास इसलिए क्योंकि इतिहास में सभी क्रांतियां मिडिल क्लास लोगो ने ही  शुरू करी  है। इसके लिए सभी मिडिल क्लास लोगों के घरों में हर जगह tele screen लगी है, जो की हर समय देखती और सुनती रहती है। आज व्यक्तिगत एकंकता (privacy) "पार्टी" को बिलकुल नामंज़ूर है। टेलेस्क्रीन को कभी भी बंद नहीं किया जा सकता है, और उसकी निगरानी क्षेत्र के बाहर जाना बहोत गंभीर अपराध है। 

 कोई अगर गलत काम के लिए सजा झेलता था, तब उसे unperson करा जा सकता था। unperson में न सिर्फ उस आदमी को नष्ट किया जा सकता था, उसके इतिहास और सभी किस्म के अस्तित्व के प्रमाण की भी ऐसे नष्ट कर दिया जाता था कि मानो उसने कभी जन्म ही नहीं लिया था।

"पार्टी" का सञ्चालन एक big brother नाम का अनदेखा, अंजान पदनाम से होता था। शायद यह कोई व्यक्ति नहीं था, बल्कि एक समूह का codename था। समूचे देश भर में बैनर लगा था big brother is watching you. और पार्टी की आइडियोलॉजी। 

Minipec का काम लोगों में "पार्टी" के विरोधियों और विपक्ष के प्रति नफरत फैलाने का था। इसके लिए अक्सर करके hate week यानि घृणा उत्सव का भी आयोजन करवाया जाता था, जिसमे लोग जम कर "पार्टी" के विरोधीयों को कोस सकें। घृणा और नफ़रत फैलाने का एक लाभ यह भी मिलता था कि इससे लोगों में विश्वास कायम रहता था कि देश का हर पल कोई दुश्मन है, जिसका सामना करने में देश एक युद्ध लड़ रहा है। 

मगर युद्ध लगातार लड़ने का असल मकसद था फैक्टरियों के व्यर्थकारी, अतिरिक्त उत्पाद का खपत होता रहे। फैक्ट्री और उद्योग के मालिक लोग अरबपति पैसे वाले लोग थे। और यही लोग "पार्टी" के सञ्चालन में भी बैठे हुए थे। असल में तेरहवी शताब्दी से ही उद्योगिक क्रांति के बाद से फैक्टिरी उत्पादन की एक भीतरी समस्या थी। वह यह की फैक्टरियों के मालिक को फैक्टिरी चलाने से लाभ दीर्घ संख्या में उत्पाद करने से ही मिलता था। ऐसे में वह समाज की वास्तविक जरूरत से अधिक उत्पाद बना देते थे। ऐसे में आने वाले अतिरिक्त उत्पाद को खपत करते रहने का तरीका चाहिए था। अतिरिक्त उत्पाद में पर्यावरण का अंधाधुंध उपभोग तो होता ही था, समाज से बुनियादी समस्याएं, भूखमरी, गरीबी, बिमारियां या तो और बढ़ रही थी या समाप्त नहीं ही रही थी। मगर उद्योगपति वर्ग समझता था कि किसी भी तरीके से पूरे समाज की पूर्ण समस्या मुक्त कर सकना असंभव था। तो ऐसे में समाज के अधिकांश लोगों का भला करते हुए अपनी प्रभुसत्ता कायम रखने का तरीका यही था कि फैक्ट्री उत्पादन वाली आर्थिक व्यवस्था कायम रखी jaye

और अतिरिक्त फैक्ट्री उत्पाद को कृत्रिम तरीके से नष्ट करवा कर नए की मांग रचने की विधि थी देश और समाज को किसी दुश्मन से युद्ध में ग्रस्त रखना। तो यहाँ से घृणा और नफरत का काम शुरू होता था।

Wednesday, June 07, 2017

आरएसएस और उनकी भेदभाव को प्रसारित करती कानून व्यवस्था

आरएसएस का कहना है कि वह जातपात में विश्वास नही करता है। और फिर अपने खुद के गढ़े हुए *तथ्य* के मद्देनजर वह आरक्षण नीति का भीतर ही भीतर विरोध करता है यह तर्क देते हुए की *आरक्षण नीति से तो जातपात और अधिक फैलेगा* ।

खुद से मुआयना करने की ज़रूरत है कि क्या वाकई में आरएसएस जातपात में विश्वास नही करता, या सिर्फ एक lip service यानी मुंहजबानी बोल्बचन कर रहा है ।

जो संस्था *थूक कर चाटने* वाली नीतियों के लिए बदनाम है, कांग्रेस पार्टी की *gst, आधार* से *मनरेगा* तक जिन नीतियों का विरोध किया और फिर *थूक कर चाटते हुए* खुद वही ले आयी, यानी जो कि सामान न्याय व्यवस्था में विश्वास ही नही करती, क्या वह वाकई में भेदभाव नही करने वाली संस्था हो सकती है ?

जातपात आखिर है ही क्या ?
भेदभाव ।
और भेदभाव कैसे किया जाता है ?
असमान न्याय , अप्रकट न्याय, अघोषित कानून ही तो भेदभाव है।
अभी ndtv पर हुए cbi रेड की कहानी को ही देख लीजिए। या फिर भ्रष्टाचार निरोध के नाम पर आम आदमी पार्टी के लोगों पर आए दिन हो रहे कार्यवाही को देख लीजिए। मोदी पर सहारा और बिरला से करोड़ों रुपये लेने का सबूत तक है, मगर रेड केजरीवाल के दफ्तर पर होती है, या ndtv के लोगो पर। और फिर ऐसे भेदभाव वाली कानून व्यवस्था करने वाले लोग कितनी निर्लज्जता से कहते फिरते हैं कि वह लोग जातपात में विश्वास नही करते ।

आश्चर्य ..घोर आश्चर्य।

जातपात के अंधकार युग की दास्तान वही है जो कि आरएसएस और भाजपा आज  भी प्रशासनिक शक्तियों के माध्यम से कर रहे हैं।यानी,  किसी निम्म जाति के लिए वही कार्य गलत , पाप या फिर अवैधानिक होते थे, जो किसी उच्च जाति के लिए स्वीकृति और मान्य या वैधनिक, या फिर छोटी भूलचूक करके पारित हो जाते थे। यही तो थी वह ब्राह्मणपंती जिसका इतना विरोध हुआ इस समाज मे ।
और आज फिर हम आजादी के इतने सालों बाद उसी व्यवस्था से ग्रस्त हो गए है।
असमान न्याय।
यानी सोनिया, मुलायम, मायावती, लालू, ममता के लिए वह कार्य अवैध, अमान्य, पाप माना जायेगा जो कि मोदी, जेटली , मोहन, नितिन या सुरेश के लिए वैध माना जायेगा ।

और फिर कहो कि हम जातपात नही मानते, यानी कोई भेदभाव नही करते ।!
पूरा प्रशासन शक्ति खुल्लम खुला भेदभाव नीति पर चलवा रहे है और फिर सफेद झूठ बोलते है।

आरएसएस की समस्या ही यह है कि वह उन शब्दों के मूल विचार और अभिप्रायों को नही समझता है जिन्हें वह यूँ ही रट्टू तोते की तरह दिन भर बोलता फिरता है।

किसी भी किस्म के भेदभाव का दूसरा बड़ा स्रोत होता है व्यक्तिनिष्ठ पैमानों का उपयोग। और तीसरा बड़ा स्रोत है तार्किक प्रमाण के बजाए अंधविश्वास करने पर जोर देना।
भाजपा के शासन में यही हो रहा है । कही देशभक्ति के नाम पर, कही सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर, कही सेना के नाम पर, और कही गाय और गौमांस के नाम पर--- जनता को *तार्किक प्रमाण* नही, *अंधविश्वास* करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। जबकि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया को बुला कर अपनी सीमा क्षेत्र का निरक्षण कैमरे पर करवा कर प्रमाण देता है, तब भी मोदी जी की सरकार चाहती है कि देश की सशत्र सेना पर विश्वास करते हुए हम मान ले कि *सर्जिकल स्ट्राइक* हुई थी ! यह जनता पर अंधविश्वास करने का प्रशासन का दबाब नही तो और क्या है ? और फिर भेदभाव यहाँ से ही तो आरम्भ होता है। जब तर्कशक्ति नष्ट हो जाती है और सही-गलत का पैमाना किसी दूसरे की मनमर्ज़ी बन जाती है, जिस पर की अंधविश्वास करना जनता की मजबूरी होता है। तब आरम्भ हो जाता है भेदभाव, यानी जातपात, क्षेत्रवाद, वर्णवाद, भाषावाद, लिंगभेद। भेदभाव ही तो इंसान की गुलामी का स्वरूप है। आज़ादी का एक अर्थ यही है -- भेदभाव वाले कानून से मुक्ति। याद है न गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में ट्रैन से उतारे जाने वाली घटना।

आरएसएस मूर्खियात का गढ़ है। वह सिर्फ मुंहजबानी ही शब्दों का भोग करता है। उनके अर्थ और अभिप्रायों को नही समझता है। भाषण देने सीखना उनका दैनिक कार्य है। शब्दों और तर्क पर चिंतन करना नही। खोखले शब्दों को बोलता है।

आख़िर राष्ट्र भाव का भी क्या अर्थ और अभिप्राय रह जाता है यदि प्रशासन भेदभाव वाली नीतियों पर चलता रहे। क्या जनता का एक बड़ा हिस्सा मात्र किसी देशभक्ति नाम की अनजानी भावना को किसी दूसरे के दुख और भोग की खातिर अपनाने के लिए बाध्य होना चाहिए, जबकि प्रशासन उसके साथ भेदभावपूर्ण तरीके से पेश आता है ?

Monday, May 29, 2017

राजा भोज तथा भोजपुरी भाषा का संबंध

भोजपुरी भाषा पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में बोली जाने वाली बोली का नाम है। यह नाम इस क्षेत्र में प्रसिद्ध राजा भोज के नाम से आया है।

कौन थे राजा भोज , और क्यों प्रसिद्ध थे यह ?

राजा भोज का शासन करीब 12 शताब्दी में उज्जैन के राजसिंहासन से हुआ करता था। वह परमार राजवंश से आये शासक थे। उनकी प्रसिद्धि उनकी न्यायप्रियता और बुद्धिमता के चलते थी। टीवी पर 1980 के दशक में दिखाए जाने वाले दो धारावाहिक राजा भोज के इर्द गिर्द निर्मित थे। एक था सिंहासन बतीसी और एक था विक्रम और बेताल । इनके ही शासन के दौरान उज्जैन ने कला, विज्ञान, ज्यातिषी के माध्यम से नक्षत्रविज्ञान (astronomy) में श्रेष्टतम प्रदर्शन किया था।
     राजा भोज का शासन मध्य भारत मे एक विस्तृत क्षेत्र में स्थापित था। एक अन्य प्रसिद्ध कहावत कहाँ राजा भोज, और कहां गंगू तेली भी इन्ही से संबंधित है। कहते है कि कोल्हापुर (जो कि वर्तमान में महाराष्ट्र राज्य में स्थित है) ,तक उज्जैन के राजा भोज का शासन था। वहां एक बार एक किले के निर्माण के दौरान निर्माण का कुछ अंश बार बार गिर जाया करता था। कारीगरों और तत्कालीन विश्वकर्मा अभियंताओं का तत्कालीन श्रद्धाओं के अनुरूप मानना था कि ऐसे स्थानीय ईष्ट को प्रसन्न नही करने के कारण उनका अभिशाप की वजह से हो रहा है। निर्माण से पूर्व कोई नरबलि दी जाती थी कि ईष्ट उनको आगे निर्माण के दौरान कोई जानलेवा बांधा न पहुचाये। यहां पर आ रही बाधा से निपटने के लिए किसी नवजात की आहुति की बात उठने लगी। ऐसे में सवाल था कि कौन देगा अपना नवजात शिशु आहुति के लिए।
तब वहां के एक अमुक स्थानीय व्यक्ति गंगू तेली ने अपने शासक की मुश्किलों को समझते हुए अपने नवजात शिशु को प्रस्तुत किया। आहुति के बाद ही यह निर्माण सिद्ध हो सका, मगर राजा भोज ने इस परम त्याग के सम्मान में उस किले में गंगू तेली के पत्नी और शिशु की स्मृति में एक मूति स्मारक भी निर्माण करवाया। आज भी कोल्हापुर किले में इस स्मारक को देखा जा सकता है। कहावत का संदर्भ यूँ है कि लोगों में चर्चा यह बन गयी थी कि अपने इस परम बलिदान के उपरांत गंगू तेली खुद को राजा भोज का बहोत नज़दीकी परम मित्र मानने लग गया था, क्योंकि उसे लगता था कि राजा के दोने वक्त में वही उनके कार्य मे सहायक साबित हो सका। वही से यह कहावत निकल पड़ी, कहाँ राजा भोज और कहां गंगू तेली
यानी 
कभी-कभी किसी बड़े व्यक्ति की किसी छोटी , सहायता नही दिए जाने वाले कार्य को कोई मूर्ख व्यक्ति आगे बढ़ कर अपने बलिदान से पूर्ण करवा है और फिर गर्वान्वित महसूस करता है, और खुद को भी राजा का मित्र समझने लगता है कि आज वही राजा का सच्चा मित्र साबित हुआ है।

राजा भोज से संबंधित अनेको दंतकथाएं लोगो मे प्रचलित थी। कई सारे इतिहासकार मानते हैं अपने न्याय और प्रजापालन के लिए प्रसिद्ध काल्पनिक नाम,  राजा विक्रमादित्य , शायद राजा भोज का ही एक उपनाम था।
समूचे विश्व में प्रजापालन के लिए प्रसिद्ध शासक, जैसे इंग्लैंड के किंग ऑर्थर, और भारत मे राजा विक्रमादित्य इत्यादि का प्रमाणित इतिहासिक अस्तित्व आज भी पुरतत्वकर्ताओं के लिए एक अबूझ पहेली है। वर्तमान पुरातत्व विज्ञान के अनुसार अधिकांशतः ऐसे सम्राट दंतकथाओं की उपज ही पाए गए है।
   राजा विक्रमादित्य भी अपने न्याय सूत्रों के लिए बहोत प्रसिद्ध थे। टीवी पर बना धारावाहिक *विक्रम और बेताल* उन्ही के न्यायसूत्रों से प्ररित कहानियों का समूह है, जिसमे एक पेड़ पर उल्टा लटका भूत, बेताल, बार बार राजा विक्रमादित्य को कहानी के रूप में एक परिस्थिति वाला प्रश्न देता है और पूछता है कि इस परिस्थिति में क्या उचित न्याय होना चाहिए। *विक्रम* यानी राजा विक्रमादित्य न्याय परिस्थिति पहेली का सही उत्तर देते हैं, जिसका कि भूत बेताल प्रशंसा तो करता है, मगर अपनी एक शर्त के अनुसार, विक्रम द्वारा मूक टूटने की वजह से वह विक्रम के कंधों से बीच मार्ग से बार-बार उड़ कर वापस अपने वृक्ष पर लौट कर उल्टा लटक जाता है।
      बरहाल, राजा भोज ने आपने शासन के दौरान अपनी राजधानी उज्जैन से हट कर झीलों और तालाबो के समीप निर्मित एक नए शहर में स्थापित करी, जिसे की *भोजताल* कहा जाता था। ।समयकाल में यह नया शहर *भोपाल* नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो कि वर्तमान भारत के केंद्रीय राज्य क्षेत्र , मध्यप्रदेश की राजधानी है।
         राजा भोज के उपरांत परमार राजवंश समयकाल में बाकी सभी शासकों की ही तरह कही न कही अस्त हो गया। उनके वंशजो दो समूहों में विभाजित हो गए, जिनमे से एक समूह उत्तर पूर्वी भारत मे स्थापित हो कर वापस भोज साम्राज्य को स्थापित करने का प्रयास करता है। इसी समूह को समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों ने *पूर्बिया* या *पुरवईया* नाम से पुकारा। *पूर्बिया* लोग ने क्षत्रों में निवास किया, उसे यह लोग अपने प्रसिद्ध पूर्वज, राजा भोज , के नाम से भोजपुर कह कर पुकारते थे। बस वही से इन क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा को *भोजपुरी* नाम दे दिया गया।
मुगलों के शासन के दौरान यह समूह , *पूर्बिया परमार वंश*, कभी कभार बीच-बीच मे अपना एक राज्य स्थापित करते रहे हैं। आज़ादी के उपरांत भोजपुर क्षेत्र का छोटा अंश बिहार राज्य में एक जिला के रूप स्थापित किया गया।

भोजपुर क्षेत्र में राजा विक्रमादित्य के प्रजापालक और न्यायप्रिय होने की गवाही देती दंत कहानियों पर बना एक और टीवी धारावाहिक था *सिंहासन बत्तीसी*। प्रचलित दंतकथा के अनुसार भोजपुर में कहीं किसी मिट्टी के टीले में एक अजब शासन शक्ति का निवास था। एक चरवाहा घटनावश उस टीले तक पहुंच गया, और जब भी वह उस टीले पर बैठ कर कोई भी स्थानीय ग्राम समस्या का न्याय निवारण करता था, वह न्याय बहोत ही प्रशंसनीय हो जाता था। फिर एक मान्यता बंध गयी कि उस टीले के नीचे ही प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य का राज सिंहासन दफन है, और जो भी टीले पर चढ़ाता है, वह असल मे राज सिंहासन पर विराजमान हो रहा होता है। सिंहासन के गोल में बत्तीस, यानी 32, कठपुतलियां लगी हुई है, जो कि तिलिस्मी कठपुतली है, और विक्रमादित्य के सभी न्याय सूत्र इन्ही में संरक्षित है। यह कठपुतलियां चरवाहे को दिखाई देने लगती है और नाटक के द्वारा उसे उपयुक्त न्याय सूत्र समझा दिया करती है। बस, इसी के चलते वह चरवाहा भी किसी श्रेष्ठ शासक की भांति जन प्रशंसनीय न्याय वाचन कर देता है।    

Friday, May 19, 2017

secularism विरोध, और वैज्ञानिक चिंतन शैली का नाश

1986 या 1987 की बात है। जो आज की मध्य पीढ़ी है , उस समय अपने बचपने में, करीब 10वर्ष या उससे भी कम आयु की थी। टीवी पर दूरदर्शन ही एकमात्र सेवा प्रदानकर्ता हुआ करता था। तब भारत मे विज्ञान और समाज मे वैज्ञानिक विचारधार को प्रसारित करने के लिए बहोत सारे सार्थक प्रयासों की दिशा मे कई सारे science fiction , यह वैज्ञानिक परिकल्पना के कार्यक्रम आया करते थे।छोटे बच्चों में खास तौर पर वैज्ञानिक दृष्टि विकसित करने के लिये। उस धारावाहिकों में कुछ प्रमुख नाम है सिग्मा और और इंद्रधनुष।
इन परिकल्पनाओं में दिखाया जाता था कि भविष्य में जब कंप्यूटर आ जाएंगे तब कैसे सिर्फ बटन दबाने मात्र से कितनों ही बड़े और अजीबोंगरीब  मशीनी कारनामे यूँ ही पलक झपकने में ही घट जाएंगे।
भारत मे कंप्यूटर बस आना शुरू ही हुआ था और बहोत कम, शायद कुछ खुशकिस्मत लोगों की ही कंप्यूटर तक पहुंच संभव हो पाई थी।
और तत्कालीन छोटी पीढ़ी , जो कि आज की मध्य आयु युवा पीढ़ी है, ने इस परिकल्पनिक मंच कला से बहोत प्रेरित हो अपने अपने कंप्यूटरों से कुछ ऐसे ही कारनामा करने के प्रयास किये थे। वह यह कभी न कर पाए, मगर इस बहोत सी कोशिशों के बाद कंप्यूटर तकनीक का सत्य ज्ञान जरूर प्राप्त कर लिया था कि मात्र प्रोग्राम लिखने से कंप्यूटर कोई कारनामा नही कर देता है, उसको परिपूर्ण करने के लिए सम्बंधित कलपुर्जे यानी हार्डवेयर भी होना चाहिए।

यह पुराने चिट्टे को खोलने की आवश्यकता आज इसलिए पड़ गयी कि बहोत सारे लोगों ने कुछ मीडिया चेनलों के तथाकथित समाचार को व्हाट्सएप्प पर भेजा कि कुक विशेष 9 संख्या वाले फ़ोन नंबर को दबाने से आपका मोबाइल फ़ोन धमाका कर जाएगा, और यदि को आसपास हुआ तो उसको जानलेवा क्षति हो सकती है।

मैं आस्चर्य में हूँ कि कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के जिस सबक को हमारी पीढ़ी ने '90 के दशक के आरंभिक काल मे ही प्राप्त कर लिए था, जब कि कंप्यूटर बहोत अनुपलब्ध थे, वह आज की पीढ़ी जिसके पास मोबाइल और कंप्यूटर इतनी सहज उपलब्ध है, वह अभी तक प्राप्त नही कर सकी है।

मन विचलित हो कर सवाल करता है कि क्या आज की युवा पीढ़ी कंप्यूटर इतनी अज्ञानी है कि वह समझती है उनके हाथ का कंप्यूटर या मोबाइल कोई श्रमिक कृत्य को कभी भी, यूँ ही कुछ बटन दबाने से कर गुज़रेगा वह भी बिना किसी समर्थिक कलपुर्जा संसाधन के ?
क्या हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी कंप्यूटर प्रौद्योगिकी की सहज उपलब्धता आने से और अधिक मूढ़ और अतार्किक हो गयी है, अपने खोजी मस्तिष्क को नष्ट कर बैठी है , जबकि इससे बेहतर की युवा पीढ़ी तब ही थी जब कंप्यूटर दुर्लभ थे, और मोबाइल तो अंजाना, अनसुना ही था ?

हां, शायद।

आज वैज्ञानिकता का प्रसार हमारे समाज की आवश्यकता नही रह गया है। आज के secularism विरोधी राजनैतिक काल मे विज्ञान का सामाजिक प्रचार तो कई सारे लोगों के कूटनैतिक उद्देश्यों के विपरीत है। आज पद्म विभूषण उन लोगों को दिया जाता है जो वैज्ञानिक परिकल्पना के नाम पर समाचार दिखाते हैं कि क्या गाय को एलियन ने अपहरण किया था। वह जो कि सुबह की शुरुआत "हमारी संस्कृति" के प्रचार के नाम पर ज्योतिष "विज्ञान"  से करते है, और दोपहर में मनोविकृत व्यवहारों से भरे धारावाहिकों की कहानियों को समाचार बना कर दिखाया करते है।

Wednesday, May 03, 2017

Who are the Sacramentalist, and how they pose threats to existence of Democracies ?

Who is a Sacramentalist ?
A Sacramentalist is a person who thinks that there should be atleast one object, or a practise, or an institution who must be accepted by every one without any scrutiny and cross examination.
As the age of sciences dawned upon the humanity, Man had began to ask questions into everything, and eventually started a culture of disbelief of the older practises. To doubt, to be skeptical is only being scientific, for them.
However, this excessive scientific-ness lead to a fall of the order that was prevailing within the society. The ones who were previously the keepers of the order within the society saw this fall of the order as nothing but a disorder, a chos in the country unto itself.  The former keepers of the orders observed that the new-age questioners had excessive, and perhaps endless cycle of questions and scrutiny, and therefore not easy to be tamed. And untamed person, for them, was a stray element, a loose canon, a free radical who is likely to cause a cause a total breakdown in the system, because he anyway didn't have answers to all the questions , and yet made many people skeptical to the already prevailing beliefs, which, these people thought were necessary for keeping the order within the society.
These people therefore held that although being scientific was not wrong, but to overcome the aspect of the endless scrutiny and questioning every person, however scientific he may be, must have something to hold with a blind faith, to only to help keep the order within the society. This could be some object, some act, or some institution . Such people came to be known as the Sacramentalists.
The Sacramentalists are the exact opposite of the Secularists in conceptual terms. Sacramentalists are like the age old clergymen who want obedience without scrutiny, and God is just a mechanism to obtain that. But God need not necessarily be that mechanism, as any other sacrament can also be helpful to their purpose if the people can give that sacrament the same respect and honour.
Sacramentalist them do not hotly follow the scientific lines of enquiry in every question, and prefer the traditional fedualistic decision-making methods. They are therefore authoritarian in their management style.
How do the Sacramentalists pose threats to democracies ?
Democracies have the risk of winding themselves back if the Scientific require are not sufficiently followed. And Sacramentalists are ones who will usurp away them away, in case the scientific rationals is not hotly pursued in democracies.

We come to a lesson, learnt from what is happening in Turkey and back home in India . That is, --
        -- Democracies cannot succeed without secularism and scientific researches, for the fear that excessive questioning have the potential to bring breakdown of the order and a chaos within the society. Therefore , a scientific research in every enquiry must happen in order to find the new, proven rational , which can to applied or even enforced homogeneously in order to keep the order within the society. The scientific rational must stand to the evidence laws and other values that a Democracy is suppose to bear. That is, scientific rational , for it to be applied or enforced upon the people all over, must be robust enough and overcome the challenges of discrimination, favouritism, bias, and other social ill, that every person may agree to its objectiveness.

Monday, May 01, 2017

अंतर्राष्ट्रीय कानून, प्राकृतिक नियम, और नास्तिकवाद

अन्तरराष्ट्रीय कानून क्या है ?

ब्रिटिश कॉमन लॉ क्या है ?

अंतर्राष्ट्रीय कानून एक विस्तृत खाका है इंसानी आदान प्रदान का जो की खुद प्राकृतिक नियमों पर रचा बुना है। यहाँ इंसानी आदान प्रदान का अभिप्राय है व्यापार से, विवादों को सुलझाने की पद्धतियों से, अपराध नियंत्रण की पद्धति से, और न्यायायिक पद्धति से।
अब चूँकि अंतर्राष्ट्रीय कानून की ही तरह ब्रिटिश कॉमन ला या यूरोपीय कॉमन लॉ भी प्राकृतिक नियमों पर रचा बुना हुआ है, इसलिए अक्सर करके अंतर्राष्ट्रीय कानून को यूरोपीय कॉमन लॉ की देन भी बुला दिया जाता है।

और यूरोपीय मान्यताओं में प्राकृतिक नियमों का रखवाला खुद प्रकृति है, कोई व्यक्ति नहीं , इसलिए अंतर्राष्ट्रीय कानून का रखवाला भी खुद प्रकृति ही है, कोई देश या व्यक्ति नहीं है।

अब यहाँ एक असमंजस है। वह यह कि, क्या ज़रूरी है की प्राकृतिक नियमों के प्रति यूरोपीय लोगों की जो मान्यताएं हैं, वही सही है, और आपकी नहीं ?

असल में प्राकृतिक नियम के प्रति किसी व्यक्ति की जानकारी उसकी आस्था का अंश बन जाती है।
तो शब्द तो एक ही रहता है - प्राकृतिक नियम - मगर इसके अभिप्राय अलग हो जाते हैं इस सवाल पर की आप अस्तिकवादि हैं, या फिर नास्तिकवादि हैं।

अस्तिकवादि लोगों और नास्तिकवादि लोगों के समझ में प्राकृतिक नियमों में क्या भेद है, अंतर है ?

सवाल का उत्तर जानने के लिए आपको थोडा सा दर्शनशास्त्र में जाना पड़ेगा ।

नास्तिकवाद में संसार का सञ्चालन कुछ विस्तृत शक्ति के नियमों से हो रहा है, जिन शक्तियों और उनसे सम्बंधित नियमों का ज्ञान कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है - वैज्ञानिक खोज, अनुसन्धान, अन्वेषण, भ्रमण , इत्यादि के द्वारा। तो आस्तिकवाद में प्राकृतिक नियम का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इंसान का जन्म खाता - जैसे उसका धर्म, उसका वर्ण, उसके संस्कार, उसके जन्म समुदाय की ईश्वर से सम्बन्ध और नज़दीकी इत्यादि महत्वपूर्ण नहीं हैं।

मगर अस्तिकवादि विचारों में प्राकृतिक नियम के अर्थ में प्रकृति खुद से किसी सर्वशक्तिशाली ईश्वर की मनमर्ज़ी है। चूँकि 'ईश्वर कौन है' का खाका इंसान के जन्म खाके के अनुसार बदलता रहता है, इसलिये प्राकृतिक नियम किसी लिखने वाले की मनमर्ज़ी माने गए है, जिन्हें हम प्राकृतिक नियम के लिखने वाले को ही बदल कर के प्राकृतिक नियमों को भी बदल सकते हैं !!!

प्राकृतिक नियमों के प्रति आस्तिकवादि और नास्तिकवादि विचारों का अंतर समझा क्या आपने ?

नास्तिकवाद में प्राकृतिक नियम का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करना होगा - न्यूटन , आइंस्टाइन , चाडविक इत्यादि को पढ़ना होगा।

जबकि आस्तिकवाद में विज्ञान खुद भी धार्मिक संस्कारों का एक उपभाग है। इसलिए प्राकृतिक नियमों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें धर्म संस्कार को पहले जानना होगा। और इसके लिए हमें धर्म जानने वाले व्यक्ति के पास जाना होगा- जो की धर्म संस्कार को इंसान के जन्मखाते , उसकी वर्ण,उसके वर्ग, इत्यादि के अनुसार बताएगा।
तो अस्तिकवादि विचार में अगर आप किन्ही प्राकृतिक नियमों का ज्ञान रखने का दावा करता हैं तब फिर हो सकता है की किसी शिक्षा पद्धति ने आपको किसी राजनैतिक साज़िश के तहत आपका ब्रेनवाश करके अपने अनुसार ढालना की षड्यंत्र किया है।
तो फिर, आस्तिकवाद में प्राकृतिक नियम के ज्ञान को शिक्षा पद्धति को बदल के बदलाव किया जा सकता है। प्राकृतिक नियम किसी ईश्वर की मनमर्ज़ी होते है, और जैसे ईश्वर इंसान की भूगौलिक स्थिति और पैदाइशी संस्कारो के अनुसार बदल जाया करते हैं, तो फिर प्राकृतिक नियम में बदलाव किया जा सकते है !!!

तो अस्तिकवादि विचारों में अंतर्राष्ट्रीय कानून का कोई न कोई रखवाला होता है। अगर कोई कहे की अंतर्राष्ट्रीय कानून यूरोपीय कॉमन ला या फिर ब्रिटिश कॉमन लॉ पर आधारित किया गया है, तो इसका अर्थ है की वही लोग इसके रखवाले हैं, क्योंकि वही लोग इसको लिखने वाले है।

जबकि नास्तिकवादि विचारों में अंतर्राष्ट्रीय कानून को लिखने वाला व्यक्ति भले ही कोई भी हो,इसका रखवाला खुद प्रकृति ही है। अगर अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन नहीं होगा तब फिर व्यापार कमज़ोर हो जायेगा, यानि आर्थिक दरिद्रता आएगी, आपसी विवाद को पूर्ण संतुष्टि से नहीं सुलझाया जा सकेगा जिससे की युद्ध और अशांति आएगी, हिंसा बढेगी,  जनजीवन अस्तव्यस्त होने लगेगा।

आस्तिकवादि विचारों में अंतर्राष्ट्रीय कानून खुद ही कारण है वैश्विक हिंसा, गरिबी , और जनजीवन अस्त व्यस्त होने का क्योंकि यह कानून लिखा गया है यूरोपीय लोगों के ईश्वरीय आस्था के अनुसार , दूसरे धर्मों के ईश्वर की आस्था के अनुसार नहीं।

आस्तिकवादि लोग कौन है ?
वह जो किसी भी धर्म को प्रबलता से मानते है। यानि वह जो secular नहीं है, राजनीती और प्रशासन नीति को धर्म का अंश मानते। बल्कि धर्म को खुद ही सच्चा और श्रेष्ठ राजनीति और प्रशासन नीति समझते है।

आपका secular होना या नहीं होना ही तय करेगा की आप अंतर्राष्ट्रीय कानून का कितना पालन करेंगे। और अन्तर्राष्ट्रीय कानून का पालन तय करेगा की आपका समाज कितना हिंसा मुक्त हो पाता है, व्यापार में समृद्ध हो पाता है।
और आप secular हैं या नहीं,यह तय होगा इससे कि आप आस्तिकवादि हैं, या नास्तिकवादि।।जाहिर है, आस्तिकवादि न तो secular होंगे, और न ही प्राकृतिक नियम को उस प्रसंग में समझते होंगे, जिस प्रसंग में इनको अंतर्राष्ट्रीय कानून का आधार बनाया गया है। और फिर अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन नहीं कर सकने पर आप का दुश्मन होगा अमेरिका और यूरोपीय देश जिनको अधिकांश श्रेय जाता है अंतर्राष्ट्रीय कानून को रचने बुनने का।

आस्तिकवादि विचारों में international law तो एक साज़िश है पश्चिमी देशों की, और इसलिए सबसे प्रथम आपको अपने धर्म को बचाने के लिए अपने देश को international law से बचाना होगा, यानि "विदेशी ताकतों से बचाना होगा"।

तो फिर secular नहीं होने पर सबसे पहले राष्ट्रवादि बनना होगा, अपने देश और धर्म की रक्षा करनी होगी, और विदेशी ताकतों के गोपनीय हस्तक्षेप से अपने देश को बचाना होगा।

क्योंकि आप आस्तिवादि हैं, यानि secular नहीं है।

आप तैयार हैं, Mr Non Secularism जी ??

What are Professional Bodies and what is their significance

A professional, SANS his professional body, is nothing but an ordinary low-skilled worker .

What is the difference between a professional and an ordinary low-skilled worker ?
The professional is a worker too, in a sense like any other worker, albeit a high skilled worker.
What marks the difference between a high skilled and a low skilled is that - a high skilled worker acquires his craft not-naturally, but by immense training and learning process. A low-skilled worker is someone whose skills are abundantly available free in nature, and are such as to come to him intuitively ,without any great efforts.

So, how does a high skilled worker transform his skills into a economic success ?
There is the question which leads us to understand the significance of a professional body ( an association, a guild, an Institute, or a livery company) . A professional body exist in various forms, depending on the scale and the associated negotiation clout it may hold.
The primary function that a professional body perform is to set the standards of wages, which it judges usually to be above the low-skilled person wages.

But how does a PB declare the fair wages standards?
The strength is derived from the length, breadth and depth of its knowledge in the professional and every aspect that touches it. The length refers to the knowledge from within the profession. The breadth refers to the comparitive knowledge from other professions. And the depth, ofcourse,is the knowledge of the intracies.

How does a PB lay claim over the length, the breadth and the depth of knowledge ?
By having within its membership,a very large count of persons exercising the profession and at the same time have parallel or extended interests in other fields.

How does a PB judge the fair wages ?
To do a calculation for what should be the fair wages, it needs to set the standards for fulfillment of various tasks entailed in the profession. Once that is done, it sets standards for the time and learning standards which must be met in order to acquire the skills. Corresponding to this, the wages are judged at the rates obtained from with the help of rate charts of foundational goods and service built collectively by their respective controllers.
The method is simply of apportionment of the cost at various stages.

How does it manage to ensure that it's standards are not challenged or competed by any other PB on a parallel run ?
The PB does so by monopolosing, ( for example, exclusive rights by the Royal Charter given by the monarch of England) the role of the standard settings agency.

Is such a monopoly not a bad idea ?
No. Because a PB declares merely the standards. It is not a trade union or a labout union which is negotiating with various employers the wages and other standards. The fair wages are not same as the market wages. Market wages are fair wages further with the market demand and supply factors. The PB announces the optimal count of the professional  persons required in the industry at any time. 

What if the standards that a PB has set are not appearing satisfactory to someone ?
The PB is NOT A POLITICAL outfit which is trying to achieve its ends by gaining power, through political justice.
PB declares the standards after thorough research and academic pursuits. That is to say, the standards are representing the RIGHTEOUS CHOICES and not the POPULIST CHOICES.

Therefore, if someone is not satisfied, the PB will only proceed to enquire the causes of dissatisfaction, and find a logical conclusion to his query. Even if it is to dismiss a stated cause, the reasoning will be justly provided and homogeneously applied in all cases similar to that. Ofcourse, the PB will have to give recognition to the various Schools of Thoughts in a subject matter if more than one view appears to be satisfactorily explaining a  certain question. A PB does not diffuse or suppress any view for prejudicial want of making one view look superior to another. A PB therefore strives to work by consensus.

How does a PB achieve consensus when every person has different beliefs, and they even has a legal , fundamental right to hold different beliefs ?

All PBs are suppose to engage in setting the Standards related to that profession. In doing say, since the standard by its definition means one unique parameter,homogeneously applied everywhere and  everytime, therefore leaving no room for multiple standards, are bound to work by consensus. Consensus means ALL people agree to a given idea. Even a slightest disagreement, if it is satisfying the logics, can mean multiple standards. Therefore to find the consensus , multiple schools of thoughts are allowed, if each of them is confirming to the standards of logic. Intensive academic research leads to the finding of consensus. Consensus is a logical satisfaction, not an arbitrary, prejudicial action or reaction.

Is a PB same as Labour Union ?
A PB is not at all a Labour union. The professionals are supposed to be hired, not employed by an employer. Therefore there is no collective bargaining done by professionals, the ordinary workers do the Collective bargaining.A professional receives "a fee" for his services, not "wages". And the "fee"  is in accordance with the standard rates set by his PB. 

How does a PB manage to keep off the realpolitik conducts within its own working ?
It's pursuits are purely academic. And therefore, the foremost thing it has to avoid is the arbitrariness and discretion. All its action and choices and rules have to be REASONABLE. The standards of a good, consensus forming REASON is its OBJECTIVITY, and not Subjectivity. Objectivity means those measurable by some physical means, or perceivable by human sensual organs, not to his beliefs.

Monday, February 20, 2017

जीलैंडिया की खोज और मापदंड में इंसानी चाहत की प्रभुसत्ता से मुक्ति

जीलैंडिया असल में जल मगन महाद्वीप (continent) है जिसका सिर्फ 5~8 प्रतिशत ही सतह पर है। जलमग्न जीलैंडिया के पर्वतों में से कही पर पानी से बहार निकलते तीन पर्वतों की चोटी पर ही बसा द्वीप देश है न्यूज़ीलैंड ।
बड़ी बात यह है की जलमग्न होने के बावज़ूद वैज्ञानिक इसको एक महाद्वीप के रूप में सम्मानित करने को बाध्य महसूस कर रहे हैं। कारण यह है की इसकी संरचना अपने आस पास के जलमग्न भू-plate के मुकाबले भिन्न पायी गयी है। फिर आगे की शोध में इसका पशु जीवन ,वन्यजीवन और वनस्पति भी एकदम नज़दीक की ऑस्ट्रेलिया भू -प्लेट से भिन्न पाया गया है।  भूकंपो के अध्ययन में भी ज़ीलैंडिया tectonic प्लेट को ऑस्ट्रेलिया plate से घर्षण करते समझा जा चुका है जो की इसका ऑस्ट्रेलिया से भिन्न होने का एक और प्रोत्साहित करता प्रमाण है।यह सब प्राकृतिक तथ्यों का समावेश वैज्ञानिकों को बाध्य कर रहा है की वह राजनैतिक या इंसानी मनमर्ज़ियों के बाहर आ कर प्राकृतिक तथ्यों के आगे नतमस्तक हो का ज़ीलैंडिया को धरती के आठवें महाद्वीप के रूप में स्वीकार करने लगें, तब जबकि इसकी 90 % से ज्यादा बड़ी भूमि जलमग्न है।

कभी कभी किसी की पहचान इंसानी चाहतों या राजनैतिक प्रभुसत्ता की मोहताज नहीं रह जाती है। तब जबकि प्रकृति ने खुद उसको विशिष्ट चिन्हों से नवाजा हो की उसके प्रोत्सहन प्रमाण सर्वप्रकट हो कर उसकी घोषणा करते हों।

Friday, February 17, 2017

The meaningfullness of the SOPs to the investigators in the aftermath of an incident

i was wondering what is the meaning of the SOP that is so fashionably talked about these days.
What is an SOP or the Standard Operation Procedures and what is its significance ?
The investigators in the aftermath of an incident/accident so pointedly ask you to hand them your SOP , and in turn you given them some computer printed papers with a bold written heading on in ,'Standard Operation Procedure'.
Thereafter it becomes as if the needful have been accomplished ,and the parties move on without making any critical point about what have they done with that copy of that ordinary printed stapled piece of papers , having the title 'SOP' .
Well, in first place we all need to contemplate over what is an SOP, so that we may proceed to do something meaningful with that document.
To understand about the SOP , I think that we first need to understand the Principles of Legalism which are the driving force behind the management techniques which create documents as the SOP to ascertain accountability . The legal principles accepted all over the world do not allow a single innocent man to punished, even if that may require of the fair judges to let off a thousand guilty persons. That simply means that determination of accountability is most critical if one wants to run his organization efficiently. Because , without the precise determination of the wrong doer, the judicial system will only be of very little help to you to reward or punish the persons according to how they have fulfilled their employment contracts, or the duties with you.
There comes the mechanism of exercising the control over the employees , something , by which you may guarantee that works are performed exactly as you want them to be. Logically  therefore, you will have to lay down the set of procedure or the STANDARD OPERATION PROCEDURES describing in precise details as to how an employee has to conduct a certain business.
Logically, then, you will also need to lay down the procedures on how to conduct the incidence where a departure from the SOP may be required. This , you will require as a necessity to prevent the employee from conducting the business as per his whim and later seeking the defense of inability to judge the incident Vi-a-Vis the SOP applicable to it. And ofcourse, in a fair process, how would you expect to let something happen to your business without your good knowledge of it. Therefore, you would lay down as a necessity that every single departure can happen only and only by your permission of it, or the permission of the person who you have delegated.
Since the SOP are meant to provide the accountability in the court of law, all the SOP actions will have a tight framework of paper trails around them. That means the rigorous paper work.
This , in turn , will mean that the SOP documents themselves need to start with the correct, legally sound paper trail around them !
Now what does that mean ??
It means that SOP themselves cannot be allowed to undergo amendment, retrieval, deletion, insertion, addition without a paper trail of who did it, when, under whose authority , and perhaps the why.
That means that no ordinary computer printed paper can be accepted for an SOP written in the face of it. The paper must mention the name and description of the issuing authority, the version, issuance date, receipt of having been read or the Reading Acknowledgement and so.
It will follow from the logic of it that once an *SOP* has been issued about any operation or the business, all actions pertaining to that business *must* necessarily happen by that *SOP* alone. That  means, no single incidence of departure can be tolerated with *SOP* being claimed of yet being in place. Because there cannot be any logical place for compliance and non-compliance both at the same time.
That also means that people thereafter cannot take defenses such as  *"as a practise..."*, or *"on grounds..."*, etc. None of such defenses are consistent with the compliance of the *SOP*. _'One has to be proven practicing only and only what he has himself laid down as a means of operation control_.
from the above theory we may proceed to contemplate as to what should the investigators do with the *SOP* which they so fashionably ask for.
first of all, they must keep tallying that all the answers given as confirming with the SOP that they have taken custody of. They must check that no departure have happened, and if there be any, the records of receiving permissions from the designated authorities exist.
the SOPs are very important to determine the admission of guilt in the court of law. But the SOPs can achieve that only if they themselves have been created with a sound legal admissibility around themselves. Shabbily written SOPs should have no place in the court of law. Such SOPs are but a disguised form of *arbitrary and discretionary* , the feudal era judicial procedures being practised in an organization.