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Showing posts from 2017

EVM fraud के सामाजिक प्रभाव

ग़ुलामी की ओर तो बढ़ने लगे हैं, हालांकि यह होगी यूँ की अब फर्जी राष्ट्रवाद सफल होकर असली राष्ट्रीय एकता की भावना को ही समाप्त कर देगा।
Evm fraud वाली राजनीति की आवश्यकता होगी कि हर महत्वपूर्ण पद पर अपने गुर्गे बैठाए जाएं ताकि तैयारी बनी रहे यदि कोई जन विद्रोह सुलगना शुरू हो तो तुरंत बुझाया जा सके।तो अपने गुर्गे बैठाने की हुड़क में भेदभाव, पक्षपात वैगेरह जो कि पहले से ही चलते आ रहे थे, और अधिक तूल पकड़ लेंगे। फिर,भाजपा-समर्थक और भाजपा-विरोधी जो की पहले से ही आरक्षण नीति के व्यूह में जाति आधार पर विभाजित होते हैं, भाजपा के गुर्गे अधिकांश उच्च जाति और उच्च वर्ग के लोग ही होंगे जो कि भेदभाव और पक्षपात करके ऊपर के पद ग्रहण करेंगे।तो भेदभाव और पक्षपात एक व्यापक isolation की भावना फैलाएगा, जो कि राष्ट्र भाव को धीरे धीरे नष्ट कर देगा।सेनाओं में अधिकांश लोग व्यापारिक परिवारों से नही बल्कि किसानी वाले पिछड़े वर्गों के है। औपचारिक गिनती भले ही टाली जाए,वास्तविक सत्य से निकलते प्रभाव को रोका नही जा सकता है। सत्य के प्रभाव चमकते सूर्य की ऊष्मा जैसे ही होते हैं। जितना भी पर्दा करके सूर्य को छिपा लो, वह…

संविधान निर्माताओं की गलती के परिणामों को भुगत रहा वर्तमान भारत

*मानो न मानो इन सब अंधेर नगरी प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था के लिए अम्बेडकर का कानून ही जिम्मेदार है।*अम्बेडकर के संविधान की असली महिमा तो यूँ है कि अगर इसे राम राज्य में भी लगा दिया गया तो वह भी कुछ सत्तर-एक सालो में आज के भारत जैसे अंधेर नगरी में तब्दील हो जाएगा।*आखिर इस संविधान में गलती क्या है जिसकी वजह से यह सब हो रहा है ?*इस संविधान की गलती है कि इसमें अंतःकरण की ध्वनि की रक्षा करने वाली भूमिका के लिए कोई भी पद या संस्था है ही नही !इसलिए यहां अंतःकरण की ध्वनि पर काम करने वाले का हश्र अशोक खेमखा या संजीव चतुर्वेदी या सत्येंद्र दुबे हो जाएगा।असल मे भारत के राष्ट्रपति का पद भी एक नौकरी के रूप में है, अन्तःकरण की रक्षा की भूमिका के लिए बना ही नही है। कारण है राष्ट्रपति के चयन का तरीका उन्ही सांसदों के हाथ मे है जिनकी शक्ति को उसे संतुलित करने के किये check and balance देना था, और उसका कार्यकाल 5 पंचवर्षीय ही है।तो अब यहाँ संसदीय political class सर्वशक्तिशाली है जिसका चेक एंड बैलेंस के लिए कोई भी नही है। सर्वोच्च न्यायालय की judicial review की शक्ति को भी गुपचुप राष्ट्रपति पद के माध्यम…

Protestant Christianity, Secularism, और democracy में जोड़

पश्चिम में ज्यादातर डेमोक्रेसी आज भी राजपाठ वाली monarchical democracy हैं।  बड़ी बात यह भी है कि यह सब की सब protestant christianity का पालन करती हैं, catholic christianity का नही। secularism एक विशेष सामाजिक और धार्मिक आचरण है जो कि सिर्फ protestant christianity में ही मिलता है, catholic christianity में नही। और secularism को ही संरक्षित करने के लिए आज भी  यहां तक कि शासक और उसके परिवार को protestant समूह में ही शादी करना अनिवार्य है, catholic में शादी करने से राजपाठ गवां देने पड़ेगा। सिर्फ ब्रिटेन के संसद ने अभी सं2013 में कानून पारित करके करीब 500 सालों बाद राजशाही परिवार को catholic लोगो मे विवाह की अनुमति दी है। स्वीडन , नॉर्वे, denmark में तो अभी भी प्रतिबंध लागू है। राजशाही को तो राजशाही के भीतर ही शादी अनिवार्य भी थी। राजकुमार विलियम और शुश्री केट का विवाह विशेष अनुमति से हुआ है। राजनैतिक शास्त्र में दिलचस्पी रखने वालों को इन सब बातों का सामाजिक प्रशासनिक अभिप्राय समझना चाहिए। power balance theory में यह सब अनिवार्यता और प्रतिबंध कैसे पश्चिम की डेमोक्रेसी को शक्तिशाली और सफल बन…

संविधान का आलोचनात्मक अध्ययन

संविधान का आलोचनात्मक अध्ययन
ऐसा नही की यह संविधान बिना किसी आलोचना के, सर्वस्वीकृत पारित किया था। खुद अम्बेडकर जी ,जो कि ड्राफ्टिंग समिति के अध्यक्ष थे, उन्हें भी संविधान के अंतिम स्वरूप को एक workable document कहकर पुकारा था, यह समझते हुए की इस डॉक्यूमेंट से सभी गुटों की मांगें और जायज आलोचनाएं पूर्ण नही हो सकी है, मगर इससे अधिकांश जायज आलोचना को शांत करने का मात्र एक प्रयास हुआ है। उन्होंने संविधान के अंतिम प्रपत्र को सभा को देते हुए उम्मीद जताई कि शायद भविष्य में इन के द्वारा निर्मित प्रक्रियों को अपना करके हमारा देश भविष्य काल मे कभी सारी जायज आलोचना को शांत कर सकेगा। 
क्या थी भारत के संवीधन की आलोचनाएं, यह इस लेख में चर्चा का बिंदु है।
1) सर्वप्रथम आलोचना थी कि अधिकांश उच्च वर्ग, उच्च जाति (upper class, upper caste) गुटों ने आरक्षण सुविधा को स्वीकृत नही किया था। यह गुट वैसे भी भारतीय समाज मे हुए भेदभाव के ऐतिहासिक तथ्य को सत्य नही मानता है, और इसलिए भेदभाव के उपचार को भी स्वीकार आखिर क्यों करता ?
2) संविधान की एक आलोचना यह थी कि वह इतना विस्तृत और घुमावदार भाषा , तथा अनुच्छेद वाला ह…

कैसे ब्रिटेन की प्रशासनिक व्यवस्था स्वायत्तता प्राप्त करती है राजनैतिज्ञ वर्ग से

ब्रिटेन में bbc को कैसे समाज को सही मार्ग या सत्मार्ग दिखाने वाली खबर और जानकारी देने की स्वायत्तता मिल जाती है, बिना इस बात के डर से की कुछ शीर्ष पदों के तबादले, निलम्बन या सेवामुक्ति देखने पड़ सकते हैं ?
यहां दूरदर्शन के दो मुलाजिम प्रधानमंत्री के भाषण की रिकॉर्डिंग के दौरान मात्र हंस क्या दिए, उनको नौकरी से हाथ धोना पड़ गया। किसी एक मुलाज़िम ने जनता के बीच जा कर सच क्या बोल दिया कि कोई एक भाषण वाकई में किस तारीख में रिकॉर्ड हुआ था, उसे भी परिणाम भुगतने के लिए नौकरी से निकाल दिया गया। 
Whatsapp के सदवाणी संदेश कहते है कि संसार का बुरा किसी बुराई के कर्म करने वालो से इतना अधिक नही होता है, जितना कि भले लोगो के चुप रहने से, और बर्दाश्त कर जाने से होता है।
अबोध भारत की बहोत बड़ी आबादी अपने भ्रमकारी कुतर्क से यह समझती/समझाती है कि समाज को भ्रष्टाचार मुक्ति दिलाने के लिए प्रशासनिक तंत्र आवश्यक नही है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को भ्रष्टाचार विमुक्त आचरण से ही मुक्ति मिलेगी। खास तौर पर वर्तमान काल के राजनैतिक वर्ग यही कुतर्क जनता में बेचना चाहता है, और लोकपाल क़ानूम जैसे विधान आने के बावजूद उन्हें ल…

रेफरी विहीन shouting मैच है भारत की राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्था

प्रश्न:-
Via Mani Mअपना मानना है कि यदि नरेंद्र मोदी लड़कपन में संघ दफ्तर नहीं पहुंचते और उसकी जगह शेयर बाजार पहुंचते तो वे अरबपति बने हुए होते । वे राजनीति में आए तो धुन ने ही उनको संघ परिवार के शीर्ष पर पहुंचाया। इस धुन का कोर तत्व मार्केंटिग है। मोदी के जीवन के हर चरण में मार्केटिग ही सफलता की सीढ़ी रही है | मार्केटिंग का पहला और अंतिम मूल मंत्र यह है कि ग्राहक को रिझाने के लिए ऐसा कुछ लगातार होता रहे जिससे वह लगातार विश्वास दिए रहे।इस बात को और बारीकी से समझना है तो सोचें क्या राहुल गांधी झाडू ले कर स्वच्छ भारत का आईडिया या इवेंट बना सकते थे? क्या ममता बनर्जी संकट की घड़ी में अपनी मां को बैंक में भेज कर नोट निकलवाने का आईडिया सोच सकती थीं? क्या नीतीश कुमार अरबपतियों का जमावड़ा कर मेक इन इंडिया जैसा इवेंट कर सकते हैं? क्या अरविंद केजरीवाल अचानक लाहौर पहुंच कर नवाज शरीफ के साथ पकौड़े खा सकते थे? क्या मनमोहनसिंह हैदराबाद हाउस में बराक ओबामा के आगे लखटकिया सूट पहन चाय पिलाने, उन्हें तू और मैं के संबोधन वाले दोस्त का फोटो सेशन का आईडिया बना सकते थे? क्या आटे की बात करने वाले लालू यादव …

EVM fraud और इसका सामाजिक विश्वास पर प्रभाव

सुब्रमण्यम स्वामी ने 2013 में जब evm fraud की शिकायत करि थी, तब भी कांग्रेस की सरकार के दौरान कोर्ट इतने पक्षपाती न थे और मामले के समाधान में vvpat उसी शिकायत के समाधान में लाया गया था। सच को स्वीकार करना ही पड़ेगा, तब भी जब की सच कांग्रेस के पक्ष में खड़ा हो--कि, अगर कांग्रेस की सरकार evm fraud में गंभीरता से लिप्त होती तब फिर शायद 2014 के लोकसभा चुनावों में सत्ता परिवर्तन कभी होता ही नही।मगर क्या आज भी ऐसा ही है ?आज देश की बड़ी आबादी evm और vvpat की शिकायत कर रही है। 2013 में सिर्फ भाजपा और सुब्रमण्यम स्वामी ही शिकायत कर्ता थे। आज देश की करीब करीब सभी चुनावी पार्टी इसकी शिकायत कर चुके है।कोर्ट कितना पक्षपाती हो सकता , इस पर समूचे देशवासियों की नज़र है। कोर्ट के किसी भी पक्षपाती फैसले या टालमटोल से तकनीयत में भले ही बड़ीआबादी को चुप रहने पर मजबूर करा जा सकता है, मगर समाज मे आपसी विश्वास यानी public trust को नष्ट होने से नही रोका जा सकता है।पब्लिक ट्रस्ट क्या है, मैंने इस विचार को समझता हुआ एक निबंध कभी पढ़ा था जो कि किसी साहित्य में नोबल पुरस्कार प्राप्त लेखक ने लिखा था। वास्तव में  इंसानो…

Modern times habit of revisionism

Btw, revisionism is in high gear these days. And not just in History, but also in mythology.Whatsapp messages are in circulation speaking Ravan was not a symbol of evil, but rather an ideal brother who was out to revenge his sister's dishonor.Almost all thing that we know of the Hinduism is being put to revisionism. The problem is that while freedom of expression has come to the people, armed with the tool of social media where quick dissemination is possible, most people are not articulate thinkers, practised enough in the Critical Thinking. Moreover , India does not have institution as the high brand colleges of liberal arts and other think tank organization which may help to provide to the masses the right knowledge.Result is that Intolerance has grown along with the growth of power to achieve wider dissemination of one's idea - namely, the social media.Of course the evil bend  political outfits have rushed to capture the intolerance of masses to propel themselves to power.

मुस्लिम घृणा से राष्ट्र निर्माण का कोई मूल्य नही बनता

मुस्लिम-घृणा कोई ऐसा सामाजिक मूल्य नही है जिसके आधार पर इंसानों की बड़ी आबादी को शांति पथ पर चल कर सामना अचार संहिता यानी संविधान का आपसी संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया जा सके।मुस्लिम घृणा से सिर्फ वोट बैंक कमाया जा सकता है, इंसानों को संतुष्ट नही किया जा सकता है कि सभी के लिए कुछ है।
जब जस्टिस कर्णनं एक पदस्थ जज हो कर भी भ्रष्टाचार के मात्र आरोप लगाने पर जेल भेज दिए जाते है, और जस्टिस दीपक मिस्र न्यायलय के आंतरिक कानून का हवाला दे कर अपने ही खिलाफ कार्यवाही के मुकदमे में खुद जज बन कर फैसला करते है,
तब बड़ी आबादी को पोल खुल कर पता चल जाता है की अब इस समाज के मूल्य क्या है, और किसके हितों की रक्षा के लिए है, जबकि फौजो में लहू कौन सी आबादी बहाने के लिए आगे जाती है।जब कोर्ट के फैसले किसी पैसे वालो के हक़ में रहस्मयी क़त्ल में जाने लगते है तब बड़ी आबादी को पता चल जाता है जी आखिर किस आबादी के धन और सुख-सुविधा के हित मे कौन सी आबादी अपना लहू बहाती है सैनिक बन कर।

EVM Fraud - an attack on the public trust

सुब्रमण्यम स्वामी ने 2013 में जब evm fraud की शिकायत करि थी, तब भी कांग्रेस की सरकार के दौरान कोर्ट इतने पक्षपाती न थे और मामले के समाधान में vvpat उसी शिकायत के समाधान में लाया गया था।आज देश की बड़ी आबादी evm और vvpat की शिकायत कर रही है। 2013 में सिर्फ भाजपा और सुब्रमण्यम स्वामी ही शिकायत कर्ता थे। आज देश की करीब करीब सभी चुनावी पार्टी इसकी शिकायत कर चुके है।कोर्ट कितना पक्षपाती हो सकता , इस पर समूचे देशवासियों की नज़र है। कोर्ट के भी पक्षपाती फैसले या टालमटोल से तकनीयत में भले ही बड़ीआबादी को चुप रहने पर मजबूर करा जा सकता है, मगर समाज मे आपसी विश्वास यानी public trust को नष्ट होने से नही रोका जा सकता है।पब्लिक ट्रस्ट क्या है, मैंने इस विचार को समझता हुआ एक निबंध कभी पढ़ा था जो कि किसी साहित्य में नोबल पुरस्कार प्राप्त लेखक ने लिखा था। वास्तव में  इंसानों को समाज मे जीवन आचरण कर सकने का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व सामाजिक विश्वास यानी पब्लिक  ट्रस्ट है। बुनियादी सामाजिक सहवास में से राष्ट्र का निर्माण public trust के खाते के निर्माण से ही होता है। संस्थाएं बनाई जाती है इसी खाते की देख रेख और…