मुस्लिम घृणा से राष्ट्र निर्माण का कोई मूल्य नही बनता

मुस्लिम-घृणा कोई ऐसा सामाजिक मूल्य नही है जिसके आधार पर इंसानों की बड़ी आबादी को शांति पथ पर चल कर सामना अचार संहिता यानी संविधान का आपसी संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया जा सके।

मुस्लिम घृणा से सिर्फ वोट बैंक कमाया जा सकता है, इंसानों को संतुष्ट नही किया जा सकता है कि सभी के लिए कुछ है।
जब जस्टिस कर्णनं एक पदस्थ जज हो कर भी भ्रष्टाचार के मात्र आरोप लगाने पर जेल भेज दिए जाते है, और जस्टिस दीपक मिस्र न्यायलय के आंतरिक कानून का हवाला दे कर अपने ही खिलाफ कार्यवाही के मुकदमे में खुद जज बन कर फैसला करते है,
तब बड़ी आबादी को पोल खुल कर पता चल जाता है की अब इस समाज के मूल्य क्या है, और किसके हितों की रक्षा के लिए है, जबकि फौजो में लहू कौन सी आबादी बहाने के लिए आगे जाती है।

जब कोर्ट के फैसले किसी पैसे वालो के हक़ में रहस्मयी क़त्ल में जाने लगते है तब बड़ी आबादी को पता चल जाता है जी आखिर किस आबादी के धन और सुख-सुविधा के हित मे कौन सी आबादी अपना लहू बहाती है सैनिक बन कर।

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