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केजरीवाल ने त्यागपत्र का रास्ता ही क्यों चुना? ..एक विचार

     यह समझना ज़रूरी है की केजरीवाल ने 18फरवरी को अपने प्रिय विधेयक, जन लोकपाल बिल, को सभा में प्रस्तुत कर सकने के बहुमत परिक्षण में असफल होने के उपरान्त त्यागपत्र का रास्ता ही क्यों चुना, और क्यों नहीं मुख्य मंत्री बने रहते हुए जन-सेवा करी ।     बहोत सारे लोग केजरीवाल से यह उम्मीद कर रहे थे और आज भी कर रहें हैं की केजरीवाल को जन सेवा के वास्ते पद पर कायम रहना चाहिए था और ऐसा करने से उन्हें पद-अनुभव भी मिलता और जनता में योग्यता भी सिद्ध होती।      इस प्रशन के उत्तर में पहले हमें "जन सेवा" के भावार्थ को भी समझना होगा। तर्क निरक्षण के लिए एक प्रश्न करना होगा क्या शीला दीक्षित जी की कांग्रेस सरकार जन सेवा नहीं कर रही थी? सही, एक संतुलित आंकलन में, जन सेवा तो सब ही सरकारें कर रही होती हैं।        तब जन सेवा के प्रसंग से क्या भावार्थ हुआ ? यह की जो पिछली सरकार ने किसी कारणों से करने से मना कर दिया था वह यह सरकार कर देगी। इसमें वैध कारण और अवैध कारण पर एक नपी-तुली चुप्पी है और दोनों को मिला कर एक रूप, एक शब्द में "जन सेवा" कह दिया ...

'Dynasticism in a democracy : a logical tangle which a democracy must solve out for its sustenance"

"Dynasticism in a democracy : a logical tangle which a democracy must solve out for its sustenance" ______________________________________________________________  Let us think in a little logical manner about the problems and challenges of dynasticism in a democracy. In a fair and just world it is wrong,both, to deny someone an opportunity,or, to unfavourably extend someone an opportunity for reasons of his birth. It applies to everyone- the rich and the poor people.  Then how do we ensure that the worthy people , no matter a dynast or of a commoner birth, are reached their rightful place.  It is this question which gives the cover of legitimacy to a crooked dynasticism to walk into the democratic system. There comes an unresolved ambiguity of whether a person reached (/failed to reach) a position by virtue of his merit, or, by virtue of his birth ,--an ambiguity which a sustaining Democracy MUST resolve in order to continue to sustain itself.      Wi...

समाचार लेखन में न्याय के आधारभूत सिद्धांतों की आवश्यकता

US never warned India about Devyani Khobragade’s arrest Read more at:  http://www.firstpost.com/blogs/us-never-warned-india-about-devyani-khobragades-arrest-1391935.html?utm_source=ref_article प्रमाण के सिद्धांतों में यह विषय सर्व-स्वीकृत रहा है की अत्यंत सूक्षमता की हद्दों तक जाने वाले प्रमाण की बाध्यता नहीं रखी जाएगी | यदि किसी व्यक्ति ने किसी को बन्दूक की गोली से मार कर हत्या करी है -- तब इस हत्या के प्रमाण में हत्या के मंसूबे, हथियार और हत्या करने वाले वाले संदेह्क का हथियार से सम्बन्ध -- इतना अपने आप में पूर्ण प्रमाण माना जायेगा की हत्या किस व्यक्ति ने करी है | बचाव पक्ष के अभिवाक्ताओं को यह प्रमाण माँगने का हक नहीं होगा की यदि "रमेश ने गोली चलाइये भी, तब भी--, चलिए मान लिया की बन्दूक पर रमेश की उँगलियों के निशान भी मिले, रमेश के पास वजह भी थी , --तब भी प्रमाणित करिए की मोहन की मृत्यु उसी गोली से हुयी जिसे रमेश ने चलाया था |"     प्रमाण के लिए यह कभी भी आवश्यक नहीं माना जाता है की "चश्मदीद होना चाहिए जिसने देखा की रमेश ने ही बन्दूक का घोडा दबाया था, और यह भी दे...

भ्रष्टाचार वाली अर्थव्यवस्था का जन-प्रशासन पर प्रभाव - जनकल्याण के ध्येय का परित्याग

    'निवेशक' शब्द मुझे एक प्रयोक्ति सा सुनाई देने लग गया है -- एक ऐसी विधि के लिए जिसके द्वारा हमारे देश से ही प्राप्त काला धन हमारी अर्थव्यवस्था में वापस एक "वैध" तरीके लगा दिया जाता है|     अर्थशास्त्र विषय का मूलभूत सिद्धांत है की अर्थ , यानी पैसा , हमेशा गोल चक्र में चलता है | यह केन्द्रीय बैंक से चालू होता है और वापस बैंक में लौटता है | रास्ते भर यह जितने लोगों के हाथों से गुज़रता है , वह सूचकांक होता है की देश में उतना व्यापार हो रहा है, जो की फिर एक प्रतिक्रिया में सूचकांक है की देश में कितना विकास और कितनी खुशहाली है | इसे जीडीपी कहते हैं |      यदि हमारे देश का कोई अमीर आदमी अपने रहने के लिए आलिशान महंगा-सा महल बनवाता है तो इसमें सब लोग जलन भाव में क्यों आ जाते है , इर्ष्या क्यों करने लगते हैं | भई, अपना महल बनवाने में उस अमीर आदमी ने मजदूरों को उनकी मजदूरी के पैसे तो दिए ही होंगे न ? कोई हाथ तो नहीं कटवा दिया होगा| देश में सरकारी श्रमिक विभाग तो है न जो की सुनिश्चित करेगा की मजदूरी का भाव क्या होगा और उचित श्रमिकी दी जाए |     ...

बिगड़ती प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का उपचार - शक्तियों का संतुलन

     भारत में प्रयक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में हर जगह राजनीतिज्ञ ही नियंत्रण करते हैं| कभी यह तंत्र हमे धोखा देने के लिए 'नेता-विपक्ष' और 'नेता-सदन' नाम के दो अलग-अलग से प्रतीत होते व्यक्तियों का ज़िक्र कर देता है , कभी एक 'संसदीय-दल' का नामकरण कर लेता है -- मगर असल प्रकृति में रहेता एक ही है -- चुनावी प्रक्रिया से आया वह अयोग्य व्यक्ति जो की मात्र अंधभक्ति से प्राप्त लोकप्रियता से सब नागरिकों और संस्थाओं पर नियंत्रण करे हुआ है |    संविधान के निर्माताओं ने यहाँ पर एक बहोत बड़ी भूल कर दी लगती है | आयरलैंड और अमरीका के संविधान से अनुकृत हमारे संविधान ने लोकतंत्र के ठीक वही पेंच गायब कर दिए है और एक भ्रमकारी, आभासीय प्रतिस्थानक लगा दिया है जिससे के प्रजातंत्र एक मुर्ख-तंत्र में परिवर्तित हो जाए |     हम में से अधिकाँश व्यक्ति हमारे भारतीय प्रजातंत्र की कमियों को महसूस करते है --और इसका दोषी हमारी अंधभक्त, अल्प-शिक्षित जनसँख्या को मानते है | मगर एक अनभ्यस्त तर्क में समझे तो पता चलेगा की प्रजातंत्र का निर्माण ही अशिक्षा और गरीबी को मिटाने के लिए हुआ था ! यान...

सोशल मीडिया , जन सुनवाई और जन-कल्याणकारी विचार

    यदि आप के विचार ऐसे हैं कि उनको सिर्फ गोपनियत में किन्हीं चुनिंदा लोगों के सामने ही प्रस्तुत किया जा सकता है, या कि आप के विचारों में से जन-कल्याण(Public Interest) के विपरीत के कर्म प्रवाहित होते हैं - तब फेसबुक औए ट्विटर जैसे सामाजिक विचार मीडिया आपके लिए उपयुक्त स्थल नहीं हैं।         सामाजिकता का प्रथम सूत्र न्याय है। जो सही होगा, जो उपयुक्त होगा उसको ही सब लोग स्वीकार करेंगे, और जो सही नहीं होगा उसको बहिष्कार करेंगे। मगर समाज में यह कहीं भी तय नहीं होता है की क्या-क्या सही माना जायेगा और क्या-क्या गलत माना जायेगा। समाज में जो तय है वह यह है कि सही और गलत का न्याय सभी लोग मिल कर करेंगे। यानी की न्यायायिक प्रक्रिया तय हो जाती है कि जन-सुनवाई का प्रयोग होगा। जन-सुनवाई(Public hearing) न्यायायिक प्रक्रिया का सर्वोच्च सूत्र है।         अन्तराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों में जन सुनवाई का कई बार उल्लेख है। न्यायालयों का दरवाजा खुला रखने के पीछे की मंशा यही से ही निकलती है कि कोई भी व्यक्ति कभी भी अन्दर आ कर प्रमाण परीक्षण क्रिया क...

जन-सुनवाई (Public Hearing) का महत्व , and regarding the two-faced laws in India which effectively make the application of law a discretionary work , not a logical consequence.

सन्दर्भ : १८ फरवरी को लोक सभा के सीधा प्रसारण को बंद कर के पारित किया गया तेलंगाना राज्य का विधेयक जन-सुनवाई सत्यापन का सर्वोच्च मानदंड है | आज यह सीधा प्रसारण पर रोक लगा कर यही प्रमाणित हुआ है की देश में प्रजातंत्र सिर्फ एक आभासीय वस्तु है -- जनता को भ्रमित कर के विभाजित रखने की एक साज़िश , जिसम की असली फायदा सिर्फ नेता लोगों को ही हो रहा है | आधी जनता कहेगी "यह सही है" , बाकी आधी कहेगी "यह गलत है" | जनता के आपस के इस मतभेद में नेता जी लोग फायदा लेंगे और ऐसे ही सत्यापन को बिफर देंगे | Reference the latest episode of appointment of Additional Director of the CBI by the Prime Minister's Office, the people of India should look at the way the rules are formulated - often with an in-built mechanism of flouting ,or, prone to flouting with a small twist of logic . Action-A : requires that the CVC Should be consulted prior to appointing a person on the post. Action-NOT-A : says that appointment can be made WITHOUT regard for the consultation given by the CVC ,b...