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नेतृत्व - भावुकता पूर्ण और आत्म-पूजन व्यक्तिव विकार पूर्ण

नेतृत्व करने में भावुकता का बहोत महत्व होता है / मुंशी प्रेम चंद की लिखी एक कहानी, "परीक्षा" , में यह  व्यक्तव्य  समझ में आता है की जनता का सच्चा सेवक वही होता है जो की जनता की भावनाओ और दुःख-दर्द को समझता है /   इसके विपरीत एक दूसरी कहानी, "ममता", में यह दिखाया गया है की कैसे एक गंगन-चुम्बी मंदिर बनवाने के बावजूद ममता नाम की वृद्ध , जिसने बादशाह को शरण दे कर उसकी जान बचाई थी, उसका मंदिर के तखते पर कहीं नाम न था / बड़े लोग गरीबों के लिए भी अगर कुछ करते हैं तो मकसद अपना नाम बड़ा करना का होता है /   मगर यथार्थ की त्रासदी को तो समझिये और मुस्करिये की भावुकता का असल नेतृत्व में कहीं स्थान नहीं है / ऐसा नहीं है की समूचे विश्व में यही हालत है/ मगर भारतीय पटल का सत्य यही है/ नतृत्व में एक और दूसरे किस्म की  शाख्न्सियत भी बहोत तेज होती है अपना स्थान दूढ़ने में / यह 'आत्म-पूजन व्यक्तिवा विकार' से ग्रस्त व्यक्ति नतृत्व में स्वयं की अर्चना की गुंजाइश का पहचानता है / यह व्यक्तिव भावनाओ से विमुख होता है / यह नेतृत्व में ताकत का प्रवाह करता है, बेइम्तिहाँ, कुचल देने व...

"हमाम में सब नंगे है" कोई अच्छा तर्क नहीं है भ्रस्टाचार के कृत्यों के बचाव में

जब हमे यह समझ में आ जाता है की कैसे सड़क मात्र भी देश निर्माण का मार्ग होती है , तब यह बात समझना आसान होता है भ्रस्टाचार की यह व्यवस्ता जिसमे आज हम सभी लाभ उठा रहे है , असल में हम सभी के सामूहिक पतन का कारक होती है / सड़क पर होने वाली हर दुर्घटना और मृत्यु , हर वह छोटे स्कूली बच्चो से भरी बस दुर्घटना - इन सब में भ्रस्टाचार का भी एक अंश होता है / वैसे इस सैधांतिक सत्य को कई फिल्मो में उजागर किया गया है , मिसाल के तौर पर " हिन्दुस्तानी " ( कमल हासन , 1996 )/ भ्रस्टाचार की व्यवस्था में जहाँ हम सब ही कहीं किसी कोने में लाभ ले रहे होते हैं , वही यह व्यवस्था कहीं हमारे आस - पास   हमारे ही किसी अपने के जीवन की दुश्मन बन रही होती है /  भ्रस्टाचार की व्यवस्था की एक बड़ी त्रासदी पूर्ण सत्य जो बहोत कम व्यक्त किया गया है वह यह है की " हमाम में तो भले ही सब नंगे हैं ", मगर यहाँ किसी का लाभ किसी अन्य की हानि पर ही न...

हिंदी समाचार पत्रकारिता और हिंदी भाषी का गिरता बौद्धिक स्तर

अभी १० सितम्बर को हमने हिंदी दिवस के रूप में मनाया / मगर आज (यानी 06 oct 2012) अरविन्द के लगाये इल्जामे पर छिड़ी बहस को "आज तक " पर सुनने के बाद में फिर से यह दुःख मन रहा था की क्यों और कैसे हिंदी मूर्खो  द्वारा  बोले जाने वाली भाषा बनी और क्यों हिंदी भाष्य जगत मूर्खो की दुनिया बन गया है / बहस के संचालक सुमित अवस्थी बहस के दौरान केजरीवाल के लगाये इल्जामे को "अरविन्द की राजनीती करने की मंशा" का चौंगा पहनाने में लगे थे/ ऐसा करते समय सुमित से जो त्रुटी हो रही थी वह यह थी की वह अपने श्रोताओं में विधि-विधान के तकनीकी ज्ञान के प्रचार-प्रसार के पत्रकारिता के अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर रहे था / असल में पत्रकारिता का एक कर्त्तव्य मस्तिष्क को ज्ञान का भोजन दे कर शांत रखने का भी है / अगर किसी तकनीकी ज्ञान, उदहारण के तौर पर मान लीजिये "सूरज पूरब से उगता है या पश्चिम से ?" , पर भी छिड़ी बहस में बहस का संचालक बहस को आगे बड़ने का मौका दे , यह कह कर की "पार्टी 'अ' का इलज़ाम है की सूरज पूरब से उगता है ", तो मस्तिष्क को बहुत अघात पहुचेगा/ अब ऐसे ...