क्यों दिल्ली के पुलिस प्रमुख अपना इस्तीफा दे दें

        दिल्ली के पुलिस कमिश्नर का पूछना है की वह क्यों त्यागपत्र दे दें । अपनी बात को समझाते हुए वह पत्रकारों यह भी पूछते हैं की अगर कोई संवाद-दाता गलत खबर देता है तब क्या उस न्यूज़ चैनेल का एडिटर इस्तीफा दे देता है ।
   उनकी बात भी जायज़ है । किसी एक, या कुछ एक सह कर्मियों की गलती के लिए उसके बॉस को सजा देना कोई इन्साफ नहीं है । ऐसे तो हर बॉस को हटाने के लिए उसके सहकर्मी की गलतियों को दिखला का "राजनीती" करी जा सकेगी , पुलिस के बॉस को दबाव में रखने की ।
               मगर क्या यहाँ मुद्दा किसी उपकर्मी की गलतियों का ही है ? यहाँ तंत्रीय गलती तो नहीं हुयी है ? अक्सर कर के उच्च पदाधिकारी तंत्र पर ऑडिट का काम करते हैं । कितनी पीसीआर गद्दियाँ है, कहाँ तैनात है , इसके नियमो को बनाना , उनके पालन को देखना इनका काम होता है । उप्कर्मी की ट्रेनिंग , वह ट्रेनिंग के मुताबिक कम कर रहे हैं की नहीं, कौन सी नयी ट्रेनिंग की आवश्यकता है , ..यह सब भी उच्च अधिकारी देखतें है । निर्भया केस के बाद तो इसमें चुस्ती आने का दौर था , यह सब विषय तो पहले ही किसी घटना से लागू हो चूका होगा । बकली 'निर्भया' के बाद कुछ नए कदम -- अर्थात ट्रेनिंग, पीसीआर के तैनाती पर नज़र चालू हो चुका होगा । बल्कि उप्कर्मी ने फिर कैसे यह हिम्मत करी की पैसे दे कर केस न लिखे, यह अब एकाकी विषय नहीं रह जाता । ऑडिट इत्यादि के बाद तो यह क्रिया लागू बहोत पहले ही हो चुकी होनी चाहिए । निर्भया से चुस्ती आनी थी, और गुडिया में यह बिलकुल भी नहीं होना था ।
    फिर ऐसा कैसे हुआ?
        असल में पुलिस , और पुलिस पति आदतन नियम में कहीं कुछ "छिद्र" (loop hole) रखने के आदि होते है , ज़रुरत के समय स्वयं को, या अपनी किसी प्रयोग के लिए ।
     ज्यादातर सरकारी नियमो में यह "छिद्र " वाला व्यक्तव्य आपको सहज ही देखने को मिलेगा । यानि जो नियम है वह हो सके, मगर ज़रुरत के अनुसार उसका विपरीत भी नियम के अनुसार ही हो सके । ! भारतीय सरकारी तंत्र ऐसे नियम बनाने का आदि है । वह शिव भगवान् और भस्मासुर वाले वाकय से प्रभावित ही क्या मानसिक ग्रस्त होते है । इसलिए नियम के साथ उसका तोड़ भी बनवा कर रखते हैं ।
    उप्कर्मी इस विपरीत बोधि नियमो से थोडा भ्रमित रहते हैं, और अगर वह नए हैं, और थोडा कमज़ोर बुद्धि, सुस्त हैं तब वह यही पर देरी कर बैठते है , जब पब्लिक में पुलिस की "छिद्र" निति-व्यवस्था की पोल खुलती है ।
            अक्सर कर के सरकारी अधिकारी उपकर्मियों को किसी संदेह या निर्णय न ले सकने की परिस्थितीत में उच्च अधिकारी से संपर्क करने की या पूछ कर कदम उठाने का मशवरा देते है । बल्कि यह भी एक नियम बनाया हुआ है । इस नियम का एक प्रत्यक्ष कारण तो साफ़ है । पुलिस में इस नियम के अन्य फायदे भी हैं । FIR में देरी करने का "कारण " समझाने में , या फिर भ्रस्टाचार के लाभ के दृष्टिकोण से भी , की भाई पुलिस ज़रुरत पड़ने पर खुद ही "न्याय" भी कर देती है और पकडे गए तो "कारण " पूरा ही 'नियम अनुसार' होगा की केस समझने के लिए मशवरा कर रहे थे। असल में उप कर्मियों की प्रोंन्नती के लिए अक्सर कर के एक गुप्त मसौदा भी येही होता है की पुलिस वाले को मालूम होने चाहिए की कौन से केस की FIR करनी है और कौन से में नहीं । नियम से काम कैसे करना है , और नियम का तोड़क नियम कौन सा नियम है । कब कहाँ कौन सा नियम (सुरचारू या फिर तोड़क ) लगाना है इसका "सहज" ज्ञान ही प्रोन्नति के काबिल बनता है ।
           अब निर्भया केस में कांसटेबल सुभाष तोमर की मृत्यु वाला प्रकरण ही लीजिये । यह आश्चर्य ही है की इस समय जन-चेतना में दो विपरीत बोधि कारक , और दोनों ही पूर्ण प्रमाणित , चालू है । न्यायपालिका जो न्याय होगा देती रहेगी , या नहीं भी देगी , मगर यह आश्चर्य ही है की यह दो विपरीत प्रमाण एक साथ कैसे निकले । इनमे से एक प्रमाण में दिल्ली पुलिस की हिस्सादारी तो साफ़ पता है ही । स्वर्गीय तोमर जी हृदय गति रुकने से मरे की किसी के द्वारा रोंदें जाने से , और दोनों ही बातों के प्रमाण -- ये कारनामा बता देगा की निति निर्माण कैसी करी गयी है , और क्यों अब इस्तीफा दे ही देना चाहिए ।
    हालत नहीं सुधरने वाले है , नियम और निति निर्माण में कारगुजारी जो आदत बनी हुयी है ।

Comments

Popular posts from this blog

the Dualism world

It's not "anarchy" as they say, it is a new order of Hierarchy

Semantics and the mental aptitude in the matters of law