तैमूर की कहानी

चंगेज़ तो शमम धर्म का अनुयायी था। काफी सारे लोग उसे मुस्लमान समझते है। एक हिंदी फ़िल्म में भी यही जताया है। मगर ऐसा नहीं है।
हाँ, आगे की कहानी किसी मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी है...मानो "अमर , अकबर, एंथोनी"   ।
क्योंकि चंगेज़ खान के मरने के बाद उसका साम्राज्य उसके चारों बेटों ने संभाला था। इसमें चंगु खान और मंगू खान से पूर्वी साम्राज्य संभाला, और चीन में राजधानी बनाई --- खान बालिक नाम से। यही शहर आगे बन कर आधुनिक बीजिंग बना। वहां इन्होंने चीन की प्रसिद्ध मिंग वंशावली की नीव डाली थी। और बड़ी बात, एक मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी, यह थी की यह भाई बुद्ध धर्म के अनुयायी तब्दील हो गए।

और चंगेज़ खान के दूसरे दो लड़के, हगलु खान के साथ पश्चिमी छोर से अपने पिता चंगेज़ खान का साम्राज्य संभाला। और यह लोग मुस्लमान धर्म के अनुयायी बन गए।

है न मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी वास्तविक कहानी !! एक ही पिता के चार बेटे -- दो हिन्दू, और दो मुस्लमान ।

तैमूर लंग एक मंगोल सिपाही था जो चंगेज़ खान की फ़ौज़ के साथ पश्चिमी राज्य समरकंद में आया था। वह मंगोल था इसलिए खुद को चंगेज़ का ही वंशज बताता था । उसे भविष्य में इस गप्प का फायदा मिला । हगलु खान के बाद उसे ही उसका उत्तराधिकारी बनाया गया था।
आगे जा कर तैमूर की वंश में बाबर का जन्म हुआ, जिसने भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना करी।

चंगेज़ खान मंगोल के शुष्क और शीत इलाके से था। वहां घुड़सवारी से चारागाहों की देख रेख होती थी। इसलिए वह लोग अच्छे घुड़ सवार थे। और क्योंकि इलाका शुष्क है, इसलिए व्यापार और आपसी हिंसा या लूटपाट से जीवन की आवश्यक वस्तुओं को पाने का तौर तरीका रखते थे। इसलिए वह लोग बहोत क्रूर और हिंसक थे। हाँ , मगर धर्म के कट्टर नहीं थे, क्योंकि असल में शमम धर्म भी हिन्दू धर्म की तरह बहु आस्था वाला , प्रकृतिक वस्तुओं और घटनाओं की पूजा अर्चना करने वाला धर्म हैं। ऐसे धर्मों में जहाँ हज़ार ईष्ट देव पहले ही हैं , वहां एक और का जुड़ जाना मुश्किल नहीं होता। दिक्कत तो एक ईष्ट पंथ की होती है, की बाकी नौ सौ निन्यानबे इष्टों को अस्वीकार करना पड़ता है।
बरहाल, इसके चलते मंगोल और मुग़ल शासक लोग किसी धर्म के कट्टरपंथी कतई नहीं थे। और इसके चलते ही उन्होंने बहोत बड़े भूभाग पर शासन किया और उनकी पीढ़ियों ने उसे चलाया। जब तक की पहला कट्टरपंथी , औरंगज़ेब नहीं आया। औरंगजेब के आते है साम्राज्य ख़त्म भी होने लग गया। कट्टरपंथियों के लिए यह साम्राज्य चलाने का एक सबक है।


जहाँ इलाके शुष्क और कम वर्षा के होते हैं वहां का मानव जीवन यापन के लिए कृषि जाहिर तौर पर नहीं करता है। बदले में वहां व्यापार या लूटपाट जैसे चलन उभर आये हैं। अब भारत में ही माड़वार के इलाके देखिये। मोदी जी की गुजरात भूमि या राजस्थान के रेतीले इलाके।
बात यह हो गयी की ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद से कृषि की प्रधानता जीवन यापन में वैसे ही कम हो गयी। लोग खेती की जमीन तक बेच कर नौकरी पेशे वाले हो चले। अब यह युग व्यापारिक युग है, कृषि तो नाम मात्र है। यहाँ औद्यागिक उत्पाद (factory scale production) और खपतवाद (consumerism) या खानाबदोशी ही चलता है।

अब आप भूल जाये की कोई व्यापारी झुकाव वाला नेता कृषिमके लिए कुछ भी करेगा। वह आपको झांसा ही दे रहा है। कृषि बस वही ही रहेगी जहाँ उद्योगिक स्तर पर उत्पाद होकर लाभ कमाया जा सके।। यानि छोटे किसान और नष्ट होंगे और सिर्फ बड़े किसान बचेंगे जो की और समृद्ध होंगे किसी बड़ी बिक्रय कंपनी से गठजोड़ करके।

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