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भाषा और सहज संज्ञान की मानसिक क्षमता

यह सभ्यता और भाषा ज्ञान से कहीं अधिक मानसिक क्षमताओं का विषय है की यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार की अभिव्यक्ति रखता है तब समस्या क्या है । कई सारी बौद्धिक विषमताएं भाषा और उसके अनुचित प्रयोग से ही प्रत्यक्ष होती हैं । साधारण तौर पर कुछ अस्पष्ट अभिव्यति , सामाजिक तौर पर अस्वीकार्य अभिव्यक्ति इत्यादि को अनदेखा कर दिया जाता है । मगर राजनीति और राजपालिका के कार्य में यह एक विकट असक्षमता हो सकती है । निति निर्माण, अथवा जन संचालन के कार्य में यह बहोत बाधा , अथवा विपरीत कार्य भी करवा सकती है । अभी हाल के दिनों में दिए गए कुछ बयानों में 'भाषा और सहज संज्ञान' (language and cognitive inability) की विषमताओं के कुछ उधाहरण मिले ।
 "गरीबी मात्र एक मानसिक स्तिथि है । "
 "सैनिक तो सेना में जान देने ही जाता है । "
"मुझे अफ़सोस है की मैंने उसके पति के कहने पर उसका तबादला किया । "

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BODMAS Rule सैद्धांतिक दृष्टि से क्या है?

गणित विषय में बोडमास(BODMAS) नियम किसी भी बहु-संक्रिय(multiple operation) सवाल को हल करने का क्रम(Order of operation) निर्धारित करता है। इस नियम की अनुपस्थिति में दो अलग अलग व्यक्ति एक ही समीकरण (equation) के लिए दो भिन्न भिन्न समाधान ले आएंगे। ((और फिर जैसा की भारतियों की कुसंस्कृति में रोज़ाना होता है, साधारण बीज गणित के सवालों पर भी हमारे बीच राजनैतिक-कूटनीति आरम्भ हो जायेगी की कौन सही है !!!))
   बरहाल, उधाहरण के लिए एक समीकरण लीजिये:
     3×5 +7-9 =?
यदि हम इस सवाल को बोडमास नियम से समाधान करें तब इसका हल कुछ यूँ होगा
    15+7-9
-->  22- 9
--> 13
जबकि यदि बोडमास नियम नहीं हो तब एक अन्य व्यक्ति इसी सवाल को कुछ यूँ भी हल कर देगा
    3×12-9
-->3×3
-->6
  बल्कि एक तीसरा व्यक्ति इसी प्रश्न का तीसरा समाधान भी ले आएगा।
तो समझा जा सकता है की बोडमास नियम सामंजस्य बनाये रखने के लिए कितना आवश्यक है।सवाल यह है की बोडमास नियम की उत्पत्ति कहाँ से हुयी है?  क्या यह नियम किसी विशिष्ट व्यक्ति की धारणा से अस्तित्व में आया है? या प्रकृति की कोई एक शक्ति ने दुनिया भर …

अंतर्राष्ट्रीय कानून, प्राकृतिक नियम, और नास्तिकवाद

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