वो भुला दिए गए हिंदुत्व मूल्य...

रावण को मारने के बाद भी धर्म ने गुहार लगायी थी। ब्राह्मणों के एक दल का कहना था की रावण ब्राह्मण था, शिव भक्त था, अच्छा शासक था, बस थोडा अभिमानी हो गया था। इसलिए वह रामचंद्र जी से प्रायश्चित करने को कह रहे थे। शायद वही दल बाद में सर्यूपारिणी ब्राह्मण बना, जिसमे की "बाजपेयी" उपनाम भी आता है। याद रहे की अटल बिहारी वाजपेयी ने ही टिपण्णी दी थी की राजधर्म नहीं निभाया। यही मंथन और शास्त्रार्थ ही हिन्दू धर्म था जिसके लिए ब्राह्मणों के आगे क्षत्रियों से शूद्रों को नतमस्तक होना पड़ता है। वरना फिर तो कृष्णा ने द्रोणाचार्य से लेकर कृपाचार्य का भी संहार करने की शिक्षा द्वापर युग में ही दे दी थी। यह तो कलयुग है।

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पश्चाताप और प्रायश्चित ही वास्तविक वैदिक संस्कृति है। महान वैदिक विचार जिसमे की महाभारत युद्ध के समय भगवद् गीता , और सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन , यह दोनों ही प्रायश्चित की अग्नि से ही निकले थे। प्रायश्चित और उसके गुणों की पहचान हिन्दू धर्म का मूल है।

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