निर्मोह, निष्पक्षता , न्यायसंगत नेत्रित्व और एक सफल समाज को जोड़ने वाली कड़ी श्रंखला

समाचार पत्रों से देश में चल रही दल-गत कूटनीति का संज्ञान लेते समय हम अक्सर यह त्रुटी कर देते है की हम सही-गलत का आत्म-ज्ञान परिपक्व करने के अपेक्षा स्वयं ही किसी न किसी राजनैतिक दल से अपनी आस्था जोड़ लेते हैं।
  यह आत्म-साक्षात्कार से विमुख, अज्ञानता का मानव व्यवहार है।
सभ्य नागरिक के लिए आवश्यक यह नहीं है की वह किसी न किसी दल से आस्था रखे। आवश्यक यह है की अधर्म और अन्याय न हो। समाज न्याय के स्तंभ पर टिका है जिसका अर्थ है की जिसके साथ जिस अवस्था में जो आचरण उचित माना गया है, तब दूसरे सभी व्यक्तियों को भी उस अवस्था में वही आचरण स्वीकारना होगा।
अगर कोई भी राजनैतिक दल धर्म और न्याय संगत आचरण नहीं करता है तब नागरिक निष्पक्ष रहने के लिए स्वतंत्र होता है।इसके लिए नागरिकों को निर्वाचन सूची में NOTA का प्रावधान दिया गया है।
  हम सभी मनुष्य जन्म के साथ ही अपने आस-पड़ोस, अपने परिवार और अपने सम्प्रदायों और पंथ से एक अंतर्मायी ज्ञान प्राप्त करने लगते हैं। आगे जा कर यह ज्ञान हमारी समझ का मूल ढांचा बनाता है जिसके भीतर हम समाचार पत्रों अथवा किसी भी वैश्विक जानकारी का मूल्यांकन करते हैं। फिर समाचार पत्रों, सोशल नेटवर्क की चर्चाओं,  अथवा जो विचार हमारी समझ के मूल ढांचे पर प्राहार करती लगती है हम उससे रुष्ट हो जाते है।
   यही पर ज्ञानी और अज्ञानी , बौद्धिक व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति का अंतर प्रकट होता है।
आत्म-ज्ञान की खोज में निकले मन और ह्रदय वाले व्यक्ति अपने क्रोध को नियंत्रित कर के वह फिर भी इन विरोधी विचारों को सुनते हैं और समझ के दांचे को प्रतिस्पर्धि विचार को गृहीत करने के लिए विस्तृत करते हैं।
  ठोस और अल्पाकार समझ वाले व्यक्ति अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते,वह रुष्ट होते हैं, क्रोधित होते हैं और परिणाम स्वरुप किसी निश्चित राजनैतिक दल के साथ अपनी आस्था को सलंग्न कर लेते हैं।
   यहीं आचरण में समझ का नाश होता है जब वह विस्तृत और परिपक्व होना समाप्त कर देती है। जब अल्पाकार समझ के नागरिक बाहुल्य हो जाते हैं तब समाज विखंडित होना आरम्भ हो जाता है। एक विखंडित होते समाज के सूचक होते हैं-- बढ़ाते हुए राजनैतिक दल, उनकी बढती संख्या और बहुमत प्रशासन के लिए गिरता समुचित मत प्रतिशत,क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय दलों के बनस्पत उत्थान --यह सब  । और इससे भी गंभीर,यह एक पूर्व सूचना है--गिरती हुई मानवीय समझ का। क्योंकि नागरिक समूह न्याय पूर्वक अपने मतभेदों को सुलझाने के स्थान पर मतभेदों से उत्पन्न मतदान की राजनैतिक सफलता में व्यस्त होने लगते हैं।
   ऐसे देशों में नागरिक समूह अपनी सामजिक और आर्थिक समस्याओं का सामूहिक निवारण करने के स्थान पर आपसी कूटनीति कर के अपने दल की विजय में अधिक बल देते हैं। न्याय परास्त होने लगता है और अयोग्य मगर दल गत कूटनीति में परिपक्व लोग विजयी हो कर तमाम कार्यक्षेत्रों में आगे बढ़ते है और प्रोसाहित होते हैं। उनके उत्थान के साथ ही अपराध दर, आपसी विवाद , बेरोज़गारी जैसे असफल समाज वाले सूचक भी बढ़ने लगते हैं।

   यह आवश्यक है की विचार विमर्श , लेख पाठन और मंत्रणा के समय हम अपने आवेष और भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखें। उचित न्याय के लिए आवश्यक है की हम विचारों की प्रतिस्पर्धा होने दें। विचारों के मतभेद से सत्य निकलता है। सत्य से न्याय , और न्याय से धर्म। धर्म सभ्यताएं बनाता और उनमे विकास लाता है। विकास का अर्थ ऊंची , गगनचुम्बी बहुमंजिला नहीं, ठन्डे वातानूकूलित शौपिंग मौल नहीं, चिकनी तेज़ सड़क नहीं - नागरिकों को अपनी समस्याएं खुद सुलझा सकने की योग्यता है।
   विकास की शुरुआत न्याय की स्थापना से होती है। एक समुचित कोण से देखें तो विकास की शुरुआत विचारों के प्रति सहनशीलता, उनकी प्रतिस्पर्धा और उससे तलाशे गए न्याय से होती है। विचारों की प्रतिस्पर्धा- योग्यता यहीं से प्रमाणित होती है, जो फिर एक कामयाब नेत्रित्व प्रदान करती है ।

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