राजनीतिज्ञों और सांसदों में पुनरावृत-कथनी के मनोविकार

      ऐसा लगता है की मानो भारतीय सभ्यता में कोई मनोरोग कई सदियों, कई पीढ़ियों से घर कर चुका है । हमारी भाषा , हमारे विचार या तो अतीत में फँस जाने की बीमारी से ग्रस्त है, या पुनरावृत-कथनी से । नहीं तो कुतर्क से, तर्क के विरूपण से । सत्य , स्पष्ट , और संतुलित विचार तो कर सकना जैसे की भारतीय नसल में एक असंभव योग है । बचपन से ही "स्मार्ट" बनने की चाहत में हम अपने बच्चों को अंसतुलित विचार की मानसिक क्रिया का आदि बना देते है । बचपन से ही हम इस तर्क मरोरण में अभ्यस्त होते हैं , और स्पष्ट विचार कहने में और सुनने में सनकोचते है ।
    संसद में चल रही बहस को सुन कर मन में बहोत सारे विचार आते हैं। मुख्यतः खुद भारतीय होने की ग्लानी लगती है । आधे से ज्यादा वाचक तो उसी एक बात, एक विचार की पुनरावृत-कथनी करते सुनाई देते है । तकनिकी बिंदु तो शायद एक भी नहीं होता है । कैसे बनेंगी कार्य-पालक नीतिया इस देश में , सभी तो मानो सत्संगी विचारों में ही बात कर रहे होते है । इन विचारों को को क्रिया में बदल सकने के विचार तो जैसे किसी में हैं ही नहीं । सब के सब आ कर अपने "सत्संग" सुना जाते हैं । टेक्निकल ऑडिट, सिस्टम ऑडिट , जैसे विचार शायद ही कोई बोल रहा होता है ।
       कई सारे तो या तो अपने पार्टी अध्यक्ष की प्रशंशा , गुण-गान का भाषण दे रहे होते हैं , या फिर विरोधी की निंदा । वह भी विषय वास्तु से हते , बहके हुए मीलों दूर के किसी विचार पर ।
     बोलने बोलने में ऐसे शब्दो और व्यक्तव्यों में बल दे दिया जाता है की पूरी विषय वास्तु का बोध ही परिवर्तित हो चलता है । "चलती हुयी बस में बलात्कार .." में ऐसा लगता है की करने वाले ने गलती यह करी की बस चल रही थी, उसको बस को तो कम से कम रोक लेना चाहिए था !
        या फिर की , "दिल्ली में घाट रही यह घटना ..", मानो की अपराध यही था की दिल्ली में किया, कहीं किसी और राज्य में किया होता तो बात कुछ और थी, या शायद तब यह अपराध नहीं माना जाता । और फिर इस शब्द के इस अनिच्छित बल से मूल विचार में परिवर्तन अत है, उसमे इस प्रशन का उत्तर भी कुछ ऐसा ही होता है --" बलात्कार तो देश के बाकी राज्यों में भी होते है .."। इस उत्तर में यह आभास होता है की मनो उत्तर-देता गृहमंत्री का कहना हो की अगर बलात्कार दिल्ली में घाट गया तो इसमें क्या बड़ी बात है, वह तो सभी राज्यों में होते है । सुनने वाले के मन में गृह मंत्री के लिए भी ऐसा भाव आइयेगा की लगता है यह आदमी, जो देश का गृह मंत्री बना बैठा है, उसको बलात्कार जैसे अपराध में कोई गलत ही नहीं लगता ।
            सच है , शब्द और भाषा के इस खेल में भी हम भारतियों ने अपने दिम्माग के सोचने की क्षमता को नष्ट कर लिया है । बल्कि मेरी जानकारी में एक Pragmatic language Inability (PLI ) कर के भी मानसिक विकार है जिसमे मनुष्य भाषा के विषय में बचपन से ही दक्ष न हो सकने की वजह से कुछ चिंतन-विहीन और मंद बुद्धि हो चलता है । मेरा तो यह भी मानना है की इस 'अंग्रेजी सीखो, अंग्रेजी बोलो' की सामाजिक-सम्मान के चक्कर में भी हम से कई लोग अपने बच्चों को मंद बुद्धि बना बैठ रहे हैं PLI से ग्रस्त । ऐसा कहने में मेरा अंग्रेजी भाषा से कोई विरोध नहीं है , बल्कि इस अंग्रजी-हिंदी रूपांतरण के चक्कर में होने वाले मनोरोग की और इशारा है, जिसके अस्तित्व को मैंने अपने देखने भर में महसूस किया है। यह ऐसे ही लोग इस पुनरावृत-कथनी के मनोविकार से ग्रस्त होते है ।

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