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आध्यात्मिक अनाथ समाज, साधु बाबा गुरुचंद, और अकादमी शिक्षित गुरु का रिक्त

जिन व्यक्तियों ने छात्र जीवन में नीति (public policy), न्याय (process of justice) और नैतिकता (Conscience based reasoning) नही पढ़ी होती है, उनको इन विषयों पर बातें करने में cognitive dissonance disorder की पीड़ा होती है। ये व्यक्ति बचपन " आध्यात्मिक अनाथ "( spiritual orphan) की तरह जिये होते हैं। ऐसे व्यकितयों से यदि बातें या तर्क करते हुए ऊपरलिखित विषयों का प्रयोग करना पड़ जाये तब उनको लगता है कि सामने वाला high moral grounds ले रहा है, वो कुछ ज़्यादा ही अपने आप को clean, higher moral standards, का समझता है ("महान" बनने की कोशिश कर रहा है ) (और इस तर्क से) दूसरो को तुच्छ समझता है ! 'आध्यात्मिक अनाथ' करीब पूरी आबादी है अमेरिका मनोवैज्ञनिक इन शब्दावलियों का प्रयोग अक्सर करते हैं , जिसमे sense of coherence (बौद्धिक अनुकूलता का आभास ) भी है। उनके अनुसार,इंसानो में thought disorder मनोवैज्ञानिक रोग भी होता है,इंसान को अपनी सोच में संसार, समाज समझने में दिक्कत होने लगती है। इंसान अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हैं संसार को समझने में, इसकी राजनीति, इनकी कुटिलता, ...

हिन्दुओं का देश क्यों सहत्र युगों से रौंदा गया है ?

 दस सदियों से हिंदुओं को रौंदा गया और ग़ुलाम बनाया गया है। क्यों? क्या वज़ह है? A Hindu thugs but another Hindu. एक हिन्दू दूसरे हिन्दू से ही बेईमानी करता है, झूठ बोलता है, धोखाधड़ी करता। हिंदुओं के समाज में सामाजिक न्याय नही है। आपसी विश्वास नही है। और इसलिये इतिहास में कभी भी ,(सिवाय बौद्ध अनुयायी मौर्य वंश शासकों के) हिन्दू कभी भी शक्तिशाली राजनैतिक और सैन्य शक्ति नही बन सके।  मोदी काल में ही जीवंत उदहारण देखिये। EWS आरक्षण  कोटा तैयार करके सवर्णो को भी आरक्षण दे दिया है। और तो और गरीबी सर्वणों की गरीबी रेखा तय करि है 8 लाख रुपये सालाना ! EVM और उससे सम्बद्ध चुनावी प्रक्रिया पर अवैध, अनैतिक कब्ज़ा जमा लिया है। न्यायलय में दशकों से सवर्णो ने अनैतिक कब्ज़ा किया हुआ था, जिसका खुलासा अब जा कर हो पा रहा है , कि जजों की नियुक्ति में क्या जातिवाद घोटाले करते आये हैं दशकों से। मीडिया में जातिवाद का ज़हर भरा हुआ है। जनता को झूठ और गुमराह करने वाले समाचारिक ज्ञान प्रसारित हैं, विषेशतः तब जब ,जिस मामलों में  भाजपा और संघ के आदमी की गर्दन फँसी...

"Market पैदा करना" का क्या अभिप्राय होता है

Gym खोलने बनाम Library खोलने के तर्क वाद में आयी एक बात "मार्केट पैदा करो" का अर्थ ये कतई नही होता है कि पेट से पैदा करके लाएंगे ग्राहकों को library के सदस्य बनने के लिए। " Market पैदा करो " का अभिप्राय क्या हुआ, फ़िर? आज जब gym का business करना जो इतना आसान दिखाई पड़ रहा है, सत्य ज्ञान ये है कि आज से पच्चीस सालों पहले ये भी कोई इतना आसान नही था। क्यों? तब क्या था? और फ़िर ये सब बदल कैसे गया? आखिर में gym की सदस्यता के लिए "मार्केट कहां से पैदा" हो कर आ गया है? पच्चीस साल पहले लोग (और समाज) ये सोचता था कि ये सब gym और खेल कूद करके बच्चे बर्बाद ही बनते है। बॉडी बना कर बच्चा क्या करेगा? गुंडागर्दी? वसूली? सेना में जायेगा? या कुश्ती लड़ कर फिर क्या करेगा?  Gym में तो बस मोहल्ले के मवाली, आवारा लौंडे ही जाया करते थे, जिनसे सभ्य आदमियों को डर लगता था। gym के बाहर में ऐसे ही लौंडे bikes पर बैठे हुए जमघट लगाये रहते थे। तब दूर दूर तक के इलाको में जा कर एक आध ही gym मिलता था। फ़िर ये सब बदला कैसे ? यही बदलाव की कहानी ही है " market पैदा करने " की कहानी । ये ...

नैतिकता तथा व्यापार और चोरी, डकैती, लूटपाट में अन्तर

बौद्ध की बात यह है कि डकैती, लूटपाट, चोरी के जैसे दुत्कर्मों और व्यापार के मध्य में कोई भी अन्य अन्तर नहीं होता है सिवाय नैतिकता और आदर्शों के पालन के। अगर नैतिकता को मध्य से हटा दिया जाये, तब फ़िर आसानी से whitewash करके किसी भी डकैती वाले दुत्कर्म को मेहनत वाला, लगन से किये जाने वाला व्यापार दिखाया जा सकता है। भई, गब्बर सिंह जी अपने गाँव के लोगों को बाकी डाकुओं के क़हर से सुरक्षा देते थे, और उसके बदले अगर थोड़ा से अनाज ले लिए तो क्या ग़लत किया उन्होंने? और फ़िर कितने ही लोगों को रोज़गार भी तो दिया हुआ था, अपने दल में सदस्यता दे कर।  उनके काम में जोखिम कितना था, आप सच्चे दिल से सोचिये । बहादुरी किसे कहते हैं, यह गब्बर सिंह जी के भीतर अच्छे से कूट कूट कर भरी थी। और अगर उसके बदले थोड़ी सी पी ली, मौज़ मस्ती कर ली, बसंती को नचवा लिया, तब इसमें क्या ग़लत किया ? मेहबूबा ओ मेहबूबा तो काम के समय की मीटिंग में होना कोई ग़लत नही है। शहर की डीएम साहिब लोगों की मीटिंग अपने क्या श्रीदेवी के गाने पर डांस करते नही देखा है? मसलन, नैतिकता और आदर्शों को यदि त्याग कर ही दिया जाये तब फ़िर व्यापार और डकैती में बाकी ...

The थू थू model of decision-making within the Sanghi House

ये तो असल मे भाजपा और संघी व्यवस्था की "खुराक" (भोजन) है। संघी व्यवस्था असल मे थू-थू किया जाने से ही चलती आयी है।    *The थू थू model of functioning within the Sanghi House*  1) सबसे पहले तो कुछ भी औनापौना कर्म कर देते हैं।  2) फ़िर लोगो की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते है।  3) यदि ज्यादा थू थू हो जाती है, तब चुपके से उसमे बदलाव, सुधार या  कि पूरा से वापस (roll back) कर लेते हैं।  लोग थूक कर चाटने को बेइज़्ज़ती का काम मानते हैं। संघियो ने बाकायदा इसे functioning technique बनाया हुआ है। करोना vaccine के तीन दान मोदी जी ने बाकायदा announce किये थे। वो तो जब केजरीवाल ने protocol तोड़ कर public में थू थू कर दी, तब चुपके से बदलाव कर दिया और अब free vaccine देने लगे हैं साथ मे ads दे दे कर वाहवाही लूटने में जुगत लगा रखी है

यूपी के नेताओं की working theory

पता नहीं क्या चक्कर है, मगर यूपी का हर नेता और नेता बनने की महत्वकांशा रखने वाले आदमी, उसमे एक stereotype हरकत देखी जा सकती है, कि- Twitter और Facebook पर कुछ eloquent expressions वाली post करते रहते हैं,  कुछ limited सी vocabulary में, repetititve हो कर, जैसे मानो जैसे कोई good expression सम्बधित किसी intellectual impairment बीमारी से पीड़ित है। Post एकदम संक्षिप्त सी होती है, कुछ भी नवीन नही होता - दर्शन, भावना , वर्णन - कुछ भी। और फ़िर ये पोस्ट शब्दकोश की कंगाली झलकाती से दिखाई पड़ने लगती हैं बौद्धिक साहस (Intellectual Courage) से निर्धन ये नेता , कुछ भी ज्वलंत , उत्तेजनापूर्ण , अथवा विवादास्पद लिखने से डरते है। इनकी नेतागिरी करने की एक सोच और परिपाटी होती है, एक 'working theory', जिसके अनुसार विवादास्पद कथनों और विचारो से बच कर निकल जाने से ही नेतागिरी चमकायी जा सकती है।

Consciousness और Knowledge के आपसी रूपांतरण के प्रति विचार

Consciousness को हम knowledge में transform कर सकते हैं, किसी नये शब्द का अविष्कार करके, जिसके अर्थ में बोध सलंग्न हो। Consciousness can be transformed into a Knowledge by creation of a new Word which may carry within its meaning the Conscious about something. This technique is useful. Because otherwise transfer of Consciousness from one person to another is a difficult task. However Knowledge is transferable easier.