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केशवानंद भारती फैसला क्या प्रजातन्त्र का जीवन रक्षक घोल है या फिर एक जहर है ?

अगर संविधान की सबसे बड़ी खासियत और उपलब्धि यह है कि उसमें छिपी गलतियों का पुनः सुधार कर सकने की क्षमता दी गयी है, *तो फिर सवाल यह है कि* क्या कोई संविधान इस कदर सुधार के नाम पर पर...

क्या फायदा होता है देश और समाज को किसी UPSC Topper से ?

एक सवाल तो उठना चाहिए अब तक --कि , UPSC के इतने मुश्किल-मुश्किल , तथाकथित "दिमागदार" सवालों का जवाब दे कर आखिर उम्मीदवार समाज में योगदान करता ही क्या है ? उसके जवाबों से और दिम्माग से आखिरकार समाज को क्या लाभ प्राप्त होता है ? शायद कुछ नहीं । UPSC से आये बाबू अंत में काम तो वही Dakota Indians Dead Horse Theory पर ही कर रहे होते हैं । उनके पास समाज की तुरत ज़रूरतों को पूरा करने का कोई कौशल नहीं होता है । बल्कि वह समाज की किस्मत पर बैठे हुए, उसे अंधकार में धकेल रहे होते हैं। और सामाजिक अहित का कुकर्म के दंड पाने की बजाये अपना performance review भी खुद अपनी बिरादरी वालों से करवा कर तारीफ भी बटोर लेते हैं , जबकि सच्चाई ठीक उल्टा प्रकट हो जाती है । इनके खुद के असली ईमानदार मुलाज़िमों का हाल तो दुनिया से छिपा नहीं है । संविधान निर्माताओं ने बहोत सारी गलतियां करि हुए है । उन्होंने उस व्यवस्था को सुदृढ़ कर दिया है जो की वास्तव में किसी उप-निवेश देश को चलाने के लिए ही बनाई गयी थी,- जिसमे सामाजिक उपयोग वाले कौशलों को पनपने और विक्सित होने के अवसर नहीं देने का उद्देश्य भी छिपा हुआ...

वर्तमान प्रजातांत्रिक युग में नियम रचने की व्यवस्था की आलोचना

पहले के जमाने में, जब जमींदारी प्रशासन व्यवस्था का युग था, कानून और न्याय का चरित्र मनमर्ज़ी हुआ करता था। ऐसे नियमावलि जो कि छिपे हुई- गुप्त, जिनकी कोई पूर्व घोषणा नहीं हुई हो, एक संग दो या अधिक नियम जो की विपरीत अर्थ वाले हों, discretion और arbitrariness से भरे हुए ।  फिर जब दुनिया में इस तरह के 'सामंतीय' कानूनों से निर्मित हुए 'न्याय' का विरोध हुआ, और जवाब मे इंग्लैंड में लॉर्ड डाईसी ने Rule of Law की नींव रखी, और फ्रांस में droit administratif लाया गया, तब भारतीय सामंत लोगों ने भी दुनिया के संग चलने मे चतुराई दिखाते हुए इन्होंने भी rule of law की मांग कर दी। मगर फिर जब मनमर्ज़ी के कानूनों को बदल कर rule of law के अनुसार लिखने का समय आया तब भारतीय सामंतों ने न्याय-कानून कुछ यूँ लिखा:- 1) पहला नियम, कि boss के पास हर बात में, हर मुद्दे पर discretion होगा की वह तय करे कब, कौन सा वाला नियम लागू होगा। 2) नियम ऐसे बनाओ कि कोई काम नियम-आधीन किया भी जा सकता है, और नही भी। तो वह काम कब होना है, कब नही , boss ही तय करने का निर्णय करेगा। 3) कब काम को अनदेखा कर देना "छोटी से ...

Professional Skillsmen are not valued properly in Indian system

रामविलास पासवान ने आज अनजाने में एक कड़क बात बोली है -- कि , सफाई कर्मचारियों की तनख्वा   आईएएस   के बराबर होनी चाहिए । शायद अनजाने में कही हो , मगर इतिहास और सामाजिक सिद्धांत से बात एकदम सटीक कही है , भले ही concept   को समझने में  आम भारतीय जनता को समय  लग जाये । बहोत छोटे   शब्दों में अगर समझाने का प्रयास करें तो यूँ है की समाज की जिस चीज़ की आवश्यकता अधिक होती है , जाहिर है की उसका मार्किट भाव अधिक होता हैं , क्योंकि वह होना भी चाहिए । और यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो समझ लीजिये की आप अंधेर नगरी में जी कर उलटी खोपड़ी पैदा किये जा चुके है - वह इंसान जो सही को गलत , और गलत को सही समझ कर ही पला - बड़ा हुआ है । अब आप सामाजिक शास्त्र में आर्थिक इतिहास को पलट कर देख लीजिये । मगर भारत का  आर्थिक इतिहास  नहीं , उन दशो का जो अधिक श्रेष्ठ और विक्सित है । वह सब के सब अपने नागरिकों के कौशल यानि skill ...