Wednesday, March 09, 2016

आरएसएस के भारतिय संस्कृतिक मूल्यों के सुधार के उपाय और स्वर्ग की सीधी सीढ़ियां

एक बार रावण ने स्वर्ग तक जाने वाली सीढ़ियों के निर्माण का प्रोजेक्ट शुरू किया था। मगर वह सफल नहीं हो सका।
सबक यह है कि जिन तकनीकी कारणों से रावण स्वर्ग तक की  सीधी सीढ़ियों का प्रोजेक्ट सफल नहीं बना पाया, उसी के जैसे तकनीकी कारणों से भाजपा और आरएसएस को जनता के नैतिक, सामाजिक  मूल्यों में सुधार करने के लिए प्रासंगिक स्वर्ग की सीढ़ी के जैसे सीधे दिखने वाले तरीकों का प्रयोग बंद करना चाहिए। जैसे कि - प्रतिबन्ध और प्रताड़ना, सजा , moral policing, दंगे करवाना, भय व्याप्त करना , ईत्यादि।
    मानवता और समाज का सुधार इन तरीकों से कभी भी नहीं हो पाया है। एंथ्रोपोलॉजी विज्ञान में इंसान को उसके आज के सभ्य और सामाजिक जीवन से लेकर उसके आरंभिक काल के जंगली वनमानव पशु जीवन के बीते चरण की तलाश शायद यह भी एक सबक देती है। व्यापक सामाजिक सुधार सही नेतृत्व के चुनाव से आरम्भ होते है। भगवान ने इंसान को साफ़ और सुधरा हुआ बनाया ही नहीं क्योंकि शायद यह उसके लिए भी संभव न था। भगवान खुद भी सामाजिक सुधार के लिए सिर्फ एक-आध अवतार से काम नहीं चला पाया और उसे भी कई बार अवतार लेना पड़ता है । और वह भी इंसान के रूप में, किसी दिव्य विभूति के रूप में नहीं। मानस रुपी राम चंद्र जी को समाज ने भगवान इसी लिए माना था की इस हद तक मर्यादाओं को कोई भी नहीं निभा सकता था। मंशा थी कि ऐसे सर्वोच्च मर्यादा पुरुष को सामाजिक नायक स्थापित करने से ही तत्कालीन समाज में सुधार संभव हो सकता था। शायद वाल्मीकि ने राम की कहानी इस मकसद को सिद्ध करने के लिए लिखी थी। संस्कृति का उसके महाग्रंथों और उसके चुने नायकों से सम्बन्ध घना होता है। रामायण तब के काल में लिखी थी।
बरहाल,  भाजपा और आरएसएस की जो भी भारतीय संस्कृति के लिए मंशाएं हैं उनको स्मरण करना पड़ेगा कि न हमारे आज के युग के नायक ऐसे है, न ही हमारे पास आज के काल में ऐसे ग्रन्थ, साहित्य और कला के उत्पाद है। और शायद न ही रामायण काल जैसे आचरण आज की आवश्यकताएं हैं। इसलिए यह जेएनयू के तीन हज़ार कंडोम वाले कथन और उसे प्रवाहित होनी वाली मंशाओं को त्याग कर देना चाहिए। भाजपा के भक्त , खुद चेतन भगत अपने उपन्यासों में कॉलेज में विवाह पूर्व संबंधों का नायकीय चित्रण करते हैं।
   सामाजिक सुधार को प्रतिबन्ध,यातनाओं और भय योग से कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सका है। और वर्तमान प्रजातंत्र व्यवस्था में तो इस सब पद्धतियों के लिए कोई स्थान ही नहीं है। स्त्री-पुरुष संबंधों से सम्बंधित  कुछ सामाजिक सुधार तो आज तक प्राप्त नहीं हो सके है। रावण को सीता हरण के लिए राम चंद्र ने वध किया , जिस वध को समाज ने न्यायपूर्ण माना। मगर राधा और कृष्ण जो मधुबन में रास लीला करते है, समाज ने उसे भी न्यायपूर्ण माना  था। अर्थात, सारे  स्त्री पुरुष सम्बन्ध को मात्र उनके होने पर अनैतिक नहीं माना जा सकता है।