भारत का अपना, आंतरिक पश्चिमीकरण

आज भारत का सच ये है कि देश की आबादी का एक बड़ा तबका सोचता हैं कि आपको सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद ये सब सदाचरण, अच्छी बातें, वगैरह करनी चाहिए। उससे पहले नहीं।
क्योंकि सत्ता कें शीर्ष पर तक पहुंचने के लिए तो सभी दुराचरण, धोखेधड़ी, बुरी बातें कहनी और करनी पड़ती है।

यानी, वह मना तो नहीं कर रहा सदाचरण और अच्छी बातों से, मगर वह तबका दोगलेपन और धोखेधड़ी को अनैतिकता की सूची से बाहर निकाल देना चाहता है।

 वह आपसे ये चाहता है कि आप अपने मन और मस्तिष्क से दुराचरण और दोगलेपन को, "आज की दुनिया में ज़िंदगी जीने के लिए आवश्यक हथियार" के तौर पर सही बात मान जाएं।

मगर दुनिया का सच आज भी ये बना ही हुआ है कि यदि दुराचरण और दोगलेपन को व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हो जाती है, तब ये दुनिया रहने लायक नहीं बचेगी, इसी समाज और इन्हीं इंसानों के लिए !
अब दोनों बातें तो एक साथ संभव कतई नहीं हो सकती है। कि, दुराचरण और दोगलेपन को गलत भी नहीं माना जाए, और समाज के संतुलन और समाज को चलाने वाले मूलभूत आवश्यक धर्म को नष्ट भी न होने दें।

तब फिर, आप बूझिए, कि क्या अर्थ हुआ एक बड़े तबके का?
जवाब शायद एक शब्द में यही मिलेगा — स्वार्थ !

यानी, समाज में ऐसा तबका है, और आज एक बड़ी बहुल्य आबादी वाला, बहुमत में,
जो कि चाहता है कि जब जब वह खुद दोगलेपन और दुराचरण में पकड़ा जाए , बाकी ऐसे आधर्मियों को तो सजा मिले, मगर उसे नहीं !



जी है!
स्मरण रहे, 
कि, भारत में चार्वाक विचारधारा ने भी भारतीय दर्शन की सूची में स्थान ग्रहण किया हुआ है। चार्वाक सोच मुख्यत भारत के पश्चिमी राज्यों में सामाजिक चलन में रही है। और आज पश्चिमीकरण के दौर में, भारत में भी पश्चिमी राज्यों वालों का शासनकाल चल रहा है।

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