भक्तों के आआपा में गड़बड़ी दिखाने के पीछे तर्क क्या है ?

कमल भाई,
भक्त विचारधारा का कहना है कि भ्रष्टाचार का विरोध वही करे जिसने खुद कोई पाप न किया है। जैसे की प्रभु येसु ने एक कुलटा स्त्री की जन आक्रोश से जीवन रक्षा के लिए तर्क दिया था कि पहला पत्थर वही मरेगा जिसने खुद आजीवन कोई पाप नहीं किया हो।
   तो बस, इसी वाली भक्त विचारधारा से भक्तों की बात निकल रही है कि यदि भाजपा करे तो कोई दिक्कत नहीं, मगर यदि आआपा में वह हो जाये तब इसका अर्थ है की आआपा पाखंडी है, खुद पाप करती है और भ्रष्टाचार का जो विरोध करती है वह असल में पाखण्ड है।
  भक्त की मंद बुद्धि आरएसएस की देन है। यह विचारधारा भ्रमो से लबोलब है। इस तर्क के अनुसार दुनिया पर सिर्फ पाप का ही राज होना चाहिए, क्योंकि पूर्णतः स्वच्छ, श्वेत मनुष्य तो भगवान ने कोई बनाया ही नहीं है। इंसान दुर्गुणों से भरा ही होता है, और भक्तों का कहना है की इसी नाते किसी भी नागरिक को प्रशासन से निश्छलता ,पारदर्शिता, भ्रष्टाचार से निवारण , जैसी मांग रखनी ही नहीं चाहिए।

जैसा की आप कहते हो, भक्त तामस चरित के लोग है, वह धरती पर अंधकार का राजपाठ ला कर ही रहेंगे।
भक्तों की विचारधारा के अनुसार ---अँधेरा कायम रहे !

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