denialism -- प्रमाण नियमावली की logical fallacy

denialism को गहरायी से समझने के लिए हमें निर्मल आत्मा (good conscience), तर्क (logic) और प्रमाण के नियम (laws of evidence) के पेंचीदा गठजोड़ को समझना होगा। सबसे पहले हमें तर्क और प्रमाण के नियमों की एक प्राकृतिक असक्षमता को चिन्हित करना होगा जिसके लिए हमें अपने निर्मल निश्चल आत्मा का अवलोकन करना होगा।
   साधारण तर्कक्रिया और प्रमाणनियम के प्रवाह में कुछ घटनाओं को प्रमाणित किया जा सकना करीब करीब असंभव है। भेदभाव और बलात्कार ऐसे अपराधों का उधाहरण है जो की साधारण तर्कक्रिया और प्रमाणनियम के द्वारा सत्यापित किये ही नहीं जा सकते है। इसलिए यहाँ दूसरी विधि प्रयोग करी जाती है।  इसमें सर्वप्रथम निश्छल अंतरात्मा को आवाह्न करके घटना अथवा अपराध के अस्तित्व के सत्य को स्वीकृत करके फिर तर्कक्रिया और प्रमाणनियम को निर्मित किया जाता है। यह विधि अन्य अवसर और अपराधों की विधि के विपरीत,एक विशेष विधि है क्योंकि उनमे पहले तर्कक्रिया और प्रमाणनियम को क्रियान्वित करने के उपरान्त निश्छल अंतरात्मा को आवाहन होता है।
  खाप पंचायत, आरक्षण विरोधी और ऐसे कई सारे समूह आज भी इस गहरी बात को समझ सकने में असफल हो रहे हैं। इसलिए वह बलात्कार अथवा सामाजिक भेदभाव के शिकायतकर्ता की शिकायत का उपचार करने की बजाये उलटे भुगतभोगी को ही दण्डित कर दे रहे हैं। जैसे , बलात्कार के समय पीड़ित नारी को ही दोष देना, या सामाजिक भेदभाव के पीड़ित को ठुकरा देना की "ऐसा कुछ नहीं है,यह सब तुम्हारे मन का वहम है।"। यह logical fallacy के शिकार समूह है।

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