उपमा के प्रयोग से समालोचनात्मक चिंतन का नाश

उपमा के प्रयोग से कई प्रकार के विवरण दिए जाते है । किसी एक वस्तु को किसी अन्य वस्तु के समान दर्शा कर उस प्रथम वस्तु का विवरण देना व्याकरण में उपमा कहलाता है ।

हिंदी शब्दकोष से 'उपमा' की विवरणी प्राप्त होती है --
उपमा अलंकर --
 जिस जगह दो वस्तुओं में अन्तर रहते हुए भी आकृति एवं गुण की समानता दिखाई जाए उसे उपमा अलंकार कहा जाता है।

उदाहरण -->
सागर-सा गंभीर ह्रदय हो,
गिरी- सा ऊँचा हो जिसका मन।

 --- इसमें सागर तथा गिरी उपमान, मन और ह्रदय उपमेय सा वाचक, गंभीर एवं ऊँचा साधारण धर्म है।
(http://www.hindikunj.com/2009/08/blog-post_29.html#.UO0U-uRJN34)

 विज्ञान में उपमा के प्रयोग से न-देखी , न-छुई जा सकने वाली वस्तु के व्यवहार , प्राकृत को समझा व समझाया जाता है । विद्युत् और जल की उपमा एक बहोत आम उदहारण है । विद्युत् को न ही छुआ जा सकता है , न ही आसानी से देखा जा सकता है क्योंकि यह प्रकाश की गति से त्वरित होती है। ऐसे में पहले के शोधकर्ताओं ने स्वयम भी विद्युत् के व्यवहार को समझने के लिए आस-पास की प्रकृति में से एक ऐसी वस्तु को चुना जो की समक्ष व्यवहार में विद्युत् जैसा आचरण करती है । जल, यानि पानी , सबसे आम वस्तु दिखाई दी इस पहेली के उत्तर में । अंग्रेजी में इस प्रकार की उपमा को Analogy कहते हैं ।
   कई अन्य विज्ञानं के विषय जैसे आणु , परमाणु , प्रकाश , उर्जा , अंतरिक्ष इत्यादि सिर्फ तुलनात्मक उपमा के मध्यम से ही समझे और समझाए जाते हैं ।

 गणित के विषय में mathematical induction के अध्याय में equation को प्रमाणित करने का तरीका भी उपमा का प्रयोग करता है । यदि एक equation एक ख़ास उदहारण पर खरी है, और यदि उसे ठीक अगले क्रम के उदहारण पर भी खरी है , और यदि यह दिखा दिया जाये की वही equation किसी भी अन्य उदहारण और उसके अगले क्रम पर खरी उतरेगी तब वह equation सभी संख्याओं पर सत्य मान ली जाती है । हालाँकि इस अध्याय के आरंभ में ही यह उदहारण दिए जाते है की कैसे mathematical induction का प्रमाण का तरीक पूरी तरह प्रमाणित नहीं माना जाता है । कई सारे equation में प्रमाण का यह तरीका गलत होने का सबूत देता है । यानि उपमा के माध्यम से कुछ तर्क प्रमाणित करने का प्रयास किया जा सकता है मगर वह नीर-विवादित नहीं माना जा सकता ।

 साहित्य में उपमा का बहोत ही अधिक प्रयोग है । कवि , गीतकार और लेखक उपमा के मध्यम से कई सारे भावों को दर्शाते हैं । आँखों को सागर जैसे गहरा , शरबती और जाने क्या क्या बतलाते है जब उन्हें प्रेम- रस को दर्शाना होता है । 'जैसे खिलता गुलाब , जैसे शायर का ख्वाब' -- यह सब उपमा ही है ।

उपमा और उदहारण में अंतर मुश्किल होता है ।

समाजशास्त्र , अर्थ शास्त्र , राजनीत शास्त्र जैसे कला-और-मानवी विषयों में जहाँ निर्णय-आत्मक प्रमाण का अभाव होता है , और सांकेतिक प्रमाण (लक्षणों) के माध्यम से ही कार्म प्रगति करनी होती है , इन विषयों में छोटे एकाकी उदहारण द्वारा ही किसी सिद्धांत अथवा क्रिया के अस्तित्व को जताया जाता है । उस क्रिया के लिए आगे यह उदहारण एक उपमा बन जाता है। कहीं किसी अन्य स्थान पर, किसी अन्य रूप में उस क्रिया की पुनरावृति होने पर प्रथम उदहारण के उपमान से क्रिया को दिखलाया जाता है।
उपमा का ऐसा प्रयोग घटना अथवा व्यक्तव्य को रोचक, चटपटा भी बनता है ।


 कई सारे लोग उपमा के प्रयोग से भ्रमित हो जाते है , या फिर की समालोचनात्मक चिंतन को नष्ट कर बैठते हैं

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