Tuesday, January 29, 2013

कॉफी हाउस का सामाजिक महत्त्व

कोफ्फी हाउस (विकिपीडिया में दिए कुछ लेखों से प्रेरित ) :

     कॉफी हाउस के चलन का सामाजिक महत्त्व बहोत गहरा है । इतिहास में झाँक कर देखें तब यह ज्ञात होगा की कैसे कॉफ़ी हाउस की दुकाने एक सामुदायिक स्थल के रूप में उभरी, नए विचारों को प्रसारित किया और एक सामाजिक दिशा में मोड़ दे दिया । भारत में कोफ़ी हाउस के समतुल्य 'नुक्कड़ वाली चाय की दूकान' ने भी कुछ ऐसी ही भूमिका निभाई है । चाय की दूकान भारत के यूरोपीय कोफ़ी हाउस के समान हैं ।
          सर्वप्रथम सार्वजनिक रूप में कोफ़ी को व्यवसायिक तौर पर पेश करने का चलन तुर्की में हुआ था । मगर कॉफ़ी हाउस जैसी दुकानों का सामाजिक उत्थान ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज जैसे विश्वविद्यालयों के आस पास में खुलने से हुआ । वहां यह छोटी-छोटी दुकानें छात्रों के लिए एक सामाजिक होने और वाद-विवाद, शास्त्रार्थ करने की भूमि के रूप में विकसित हुए। यहाँ तक की कुछ विश्वविख्यात व्यापारों का असल जन्म स्थल एक कॉफ़ी हाउस ही है । सबसे बड़ा और उम्दा नाम बिमा की सर्वप्रथम कम्पनी 'ल्लोय्ड' का है जिसके अभिवाक को बिमा जैसे व्यापार का विचार एक कॉफ़ी हाउस से ही मिला जहाँ कुछ लोग बैठ कर किसी साथी के जीवन में किसी अभिभावक की मृत्यु का अफ़सोस कर रहे थे। वह सब उसकी आर्थिक मदद करना तो चाहते थे मगर सब मिल कर भी इतना धन नहीं इकत्र कर सकते थे जिस से की उनके उस साथी की कोई भी मदद हो सके । बस यही से 'लोय्ड' को बिमा का विचार आ गया और थोड़ी सी गणित की समझ से उसने बिमा नाम के व्यापार को इजाद कर दिया।
             कोफ़ी हाउस ने कई सारे वैज्ञानिक खोजों को भी प्रसारित करने की भूमिका निभाई है । कई व्यवसायी लोगों ने यही से खोजों का विचार प्राप्त किया और अपने व्यवसायों में उनका उपयोग कर लाभ कमाया है । नयी खोजों को व्यवसाय में उपयोग से इन व्यवसायों की पूरी संरचना ही परिवर्तित हो गयी है ।
        भारत में भी चाय की दुकानों की भूमिका कुछ ऐसी ही रही है । हालाँकि चाय की दुकानें गावों में अपठित राजनितिक विचारों के आदान-प्रदान की भूमि अधिक तब्दील हो गयें हैं। और नए भारतीय शहरों में चाय की दुकान या महंगे काफी हाउस प्रेमी युगल जोड़ो के मिलन स्थल बन रहे हैं ।
           छात्रों के जीवन में चाय की दुकान का महत्व बहोत ही अधिक है । वह यहाँ पर अपने पुस्तकी ज्ञान का आदान-प्रदान करते हैं , मानो की एक दुसरे को पढ़ा रहे हों । कई सारे छात्र तो जैसे सिर्फ चाय की दुकान से ही ज्ञान प्राप्त कर परीक्षा में पास होते हैं , चाय की दुकान का कईयों के लिए इतना अधिक महत्त्व है। ज़ाहिर है, चाय की दूकान में अगर कोई विचार अस्पष्ट या फिर त्रुटीत रूप में ही चल पड़े तब सभी लोग इसी विचार को सही समझ कर अनुग्रहित कर लेते हैं।मेरे व्यक्तिगत दर्शन में तो कई सारे भारतीय राजनीतिज़ इन्ही चाय की दुकान से शिक्षित रहे हैं जो देश पर शासन चला रहे हैं ।