राजनीति आदर्शों से करनी चाहिए, या पैंतरेबाजी से ?

आदर्श परिस्थितियों में सत्ता को प्राप्त करने का मार्ग उच्च मूल्यों की स्थापना के प्रस्ताव से होने चाहिए। जनता को केवल उस व्यक्ति को नेता मानना चाहिए, जो समाज को बेहतर मानवीय मूल्य (दया, क्षमा, दान, आपसी सौहार्द, विनम्रता, करुणा, इत्यादि) से शासन करे।

 मगर वास्तविक धरातल पर जनता तो खुद ही मैले और कपट मन की होती है। वो ऐसे व्यक्तियों को चुनती है जो ऐसे मार्ग , पैतरेबाजी करते दिखाई पड़ते हैं, जैसा कि आम व्यक्ति के मन में कोई निकृष्ट अभिलाषा होती है।

जनता खुद ही अपनी बर्बादी का गड्डा खोदती है, और बाद में अपने नेताओं को दोष देती फिरती है।

जब जनता के मन में कपट करना एक उच्च , बौद्धिक गुण smart व्यवहार समझा जाने लगता है, तब सत्ता प्राप्ति के लिए नेतागण mind game (बुद्धि द्वंद) से छल करने लगते हैं। वो ढोंग, कपट, छल, कूट का प्रयोग करके जनता को लुभाते हैं, और सत्ता में पहुंच कर निजी स्वार्थ को पूर्ण करने लगते हैं।

समाज के सामने बहोत कम ऐसे उदाहरण हैं जब किसी नेता ने वाकई में ,यानी बहुत उच्च मानक से उच्च मूल्यों की स्थापना के लिए संघर्ष किया हो। विश्व पटल पर भारत से ऐसा एक नाम गांधी जी का है। ये आप google और wikipedia से तफ्तीश कर सकते हैं। जब संसार में किसी व्यक्ति ने सच्चे दिल से खुद भी उन शब्दों का पालन किया हो, जो उसने दूसरों से मांग करी हो। Pure acts of Conscience.

जब कपटकारी राजनीति, जिसे आम भाषा में कूटनीति करके पुकारा जाता है, एक गुणवान व्यवहार माना जाता है, तो नेता भी यही प्रतिबिंबित करते हैं। 

ऐसे में आज के तथाकथित राजनीतिज्ञों के भीतर भी एक राजनैतिक द्वंद चल रहा होता है। कि, क्या उन्हे आदर्शो के मार्ग पर चल कर राजनीति करनी चाहिए, या फिर पैंतरा बाजी करके राजनीति करनी चाहिए।

उदाहरण के लिए,

राहुल गांधी जब भारत में प्रजातंत्र के विस्थापन का आरोप लगा चुके हैं, तब फिर इसके आगे उन्हे शरद पवार की बातों में आ कर अडानी को हिन्डेनबर्ग मामले में निकल देना चाहिए, या फिर अडानी को दोषी ठहराते रहना चाहिए। 

यानी, राहुल को शरद पवार के वोटों की खातिर (निजी स्वार्थ के खातिर) अडानी को बच निकल जाने का पैंतरा खेलना चाहिए,
 या फिर 
प्रजातंत्र के आदर्शों और मूल्यों के अनुसार अडानी को मोदी के संग मिलीभगती करके प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ, मीडिया को डहाने का दोषी बताते रहना चाहिए?

राजनीति आदर्शों से करनी चाहिए, या पैंतराबाजी से ?

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