Wednesday, December 28, 2016

Subjectivity is the root of the evil of Discrimination

Subjectivity is the root of troubles. Subjective standards provide the inroads to ARBITRARINESS and DISCRETION to play havoc on RATIONALISM.
Subjectivity leads to loss of Reasonability. People are unable to make out the why's and how's behind the action. The Rule is lost.

Do we realize how all the Discrimination, the Color apartheid, the religion discrimination,  Caste discrimination, the Nepotism, the Favoritism walked into administration and governance ?
The answer is Subjectivity. Coupled with Power of Discretion.
It gives freedom to act whimsical and arbitrary , protected under the  guise of law.

Yet the Human Resource Managers of modern times are not equipped to eliminate or even reduce the Subjectivity in evaluation of Ability. Mechanism as Interviews, use of immeasurable parameters for performance evaluation keep bringing the unexplained, irrational results. We want to end the Reservation Policy; we want the Able and Worthy people , yet we have no agreeable, impartial mechanism to judge the Worthiness.

English jurist A.V Dicey propounded his theory of RULE OF LAW back in 20th Century keeping in mind the damages to the Reason caused by excessive Arbitrariness and Discretion.
Back in those times, the Feudal lords applied the Discretion everywhere to award justice. The JURISPRUDENCE of the Feudal Lords was full of self-centeredness. The Right was whatever suited, comforted or profited the Feudal and the Wrong was whatever was not Right. The revolt of the masses was essentially a revolt against the Jurisprudence of those times. Subsequently, as the era of REPUBLICANISM dawned upon humanity, the corrective actions in the Jurisprudence which ensued bore certain salient features. They were,
1) The law must be pre-notified and in the public space. That is, retro-effecting of laws was forbidden.
2) The law must be written. Oral laws had the problem of changing interpretation and words several times only to suit the federal lords.
3) The law must be held supreme. In those times , the feudals themselves were treated under different laws.
4) Conflicting sets of law must be avoided. The hypocrisy found ways to sustain itself due to excessive conflicting laws. Indeed , it was purely the discretion of the feudal lord to decide which one law would apply from a given pair of conflicting laws.  Thus, the feudals were always in a position to act whimsical and arbitrary despite all the sets of law.

Why 'Whatsapp forwards' by the BJP IT cell

the BJP IT Cell has a good reason why it prefers WHATSAPP over FACEBOOK .

It is because the Whatsapp is not intelligently designed for any debate or discussions.  As the experienced users of the two social media platform can compare and detect, in FB one can make a response to what he does not agree with. Infact each *Post* has a chain of *comments* following and  each comment can have a chain on *Reply*. This way a lively discussion can happen leading to unraveling of the *sophistication, entanglements and the lies*.

_Free flowing_ *_Debates and Discussions_* have a natural property of disclosing the truth about any matter. More, if it is *crowd-sourced* .However the Truth is the greatest enemy of the liar *propagandist*.

*Whatsapp* platform does not have these features. Over here, the unintended recipients will feel troubled by any debate or discussion they may not be interested in. The platform does not have features to show disagreements and cross-examine and scrutinise a post. Thus, the recipients are expected to accept whatever is received on their mobile device, *without* any *critical thinking* on the matter.

The BJP IT Cell is noticeably designing the post for *whatsapp forwards*, that is why.

Further, the Whatsapp does not allow for anonymous posts. Whereas on Facebook one can assume a *Facebook Page* pseudo-identity and make post without any *fear or blame*.
Twitter and Google +(Google Plus) platform also allow even assumed, pseudo-identity registration. All these platform , although susceptible to rumour mongering post as there may not be any known human to vouch for the content, are yet a better platform because they allow a *crowd sourced* *_debate and discussions_*

any one interested on political discussions therefore if really has the *courage of conviction* , should come on the *publicly open*, and *debates and discussions* based platform .

any one interested on political discussions therefore if really has the *courage of conviction* , should come on the *publicly open*, and *debates and discussions* based platform .

Although the Whatsapp is not designed for it, if someone still wants to use it, I have sent the link, please feel obliged to your fellow persons who may not be interested in the " _shit_ " other people talk, and therefore one should spare them the same.

Saturday, December 24, 2016

तैमूर की कहानी

चंगेज़ तो शमम धर्म का अनुयायी था। काफी सारे लोग उसे मुस्लमान समझते है। एक हिंदी फ़िल्म में भी यही जताया है। मगर ऐसा नहीं है।
हाँ, आगे की कहानी किसी मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी है...मानो "अमर , अकबर, एंथोनी"   ।
क्योंकि चंगेज़ खान के मरने के बाद उसका साम्राज्य उसके चारों बेटों ने संभाला था। इसमें चंगु खान और मंगू खान से पूर्वी साम्राज्य संभाला, और चीन में राजधानी बनाई --- खान बालिक नाम से। यही शहर आगे बन कर आधुनिक बीजिंग बना। वहां इन्होंने चीन की प्रसिद्ध मिंग वंशावली की नीव डाली थी। और बड़ी बात, एक मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी, यह थी की यह भाई बुद्ध धर्म के अनुयायी तब्दील हो गए।

और चंगेज़ खान के दूसरे दो लड़के, हगलु खान के साथ पश्चिमी छोर से अपने पिता चंगेज़ खान का साम्राज्य संभाला। और यह लोग मुस्लमान धर्म के अनुयायी बन गए।

है न मनमोहन देसाई की फ़िल्म जैसी वास्तविक कहानी !! एक ही पिता के चार बेटे -- दो हिन्दू, और दो मुस्लमान ।

तैमूर लंग एक मंगोल सिपाही था जो चंगेज़ खान की फ़ौज़ के साथ पश्चिमी राज्य समरकंद में आया था। वह मंगोल था इसलिए खुद को चंगेज़ का ही वंशज बताता था । उसे भविष्य में इस गप्प का फायदा मिला । हगलु खान के बाद उसे ही उसका उत्तराधिकारी बनाया गया था।
आगे जा कर तैमूर की वंश में बाबर का जन्म हुआ, जिसने भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना करी।

चंगेज़ खान मंगोल के शुष्क और शीत इलाके से था। वहां घुड़सवारी से चारागाहों की देख रेख होती थी। इसलिए वह लोग अच्छे घुड़ सवार थे। और क्योंकि इलाका शुष्क है, इसलिए व्यापार और आपसी हिंसा या लूटपाट से जीवन की आवश्यक वस्तुओं को पाने का तौर तरीका रखते थे। इसलिए वह लोग बहोत क्रूर और हिंसक थे। हाँ , मगर धर्म के कट्टर नहीं थे, क्योंकि असल में शमम धर्म भी हिन्दू धर्म की तरह बहु आस्था वाला , प्रकृतिक वस्तुओं और घटनाओं की पूजा अर्चना करने वाला धर्म हैं। ऐसे धर्मों में जहाँ हज़ार ईष्ट देव पहले ही हैं , वहां एक और का जुड़ जाना मुश्किल नहीं होता। दिक्कत तो एक ईष्ट पंथ की होती है, की बाकी नौ सौ निन्यानबे इष्टों को अस्वीकार करना पड़ता है।
बरहाल, इसके चलते मंगोल और मुग़ल शासक लोग किसी धर्म के कट्टरपंथी कतई नहीं थे। और इसके चलते ही उन्होंने बहोत बड़े भूभाग पर शासन किया और उनकी पीढ़ियों ने उसे चलाया। जब तक की पहला कट्टरपंथी , औरंगज़ेब नहीं आया। औरंगजेब के आते है साम्राज्य ख़त्म भी होने लग गया। कट्टरपंथियों के लिए यह साम्राज्य चलाने का एक सबक है।


जहाँ इलाके शुष्क और कम वर्षा के होते हैं वहां का मानव जीवन यापन के लिए कृषि जाहिर तौर पर नहीं करता है। बदले में वहां व्यापार या लूटपाट जैसे चलन उभर आये हैं। अब भारत में ही माड़वार के इलाके देखिये। मोदी जी की गुजरात भूमि या राजस्थान के रेतीले इलाके।
बात यह हो गयी की ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के बाद से कृषि की प्रधानता जीवन यापन में वैसे ही कम हो गयी। लोग खेती की जमीन तक बेच कर नौकरी पेशे वाले हो चले। अब यह युग व्यापारिक युग है, कृषि तो नाम मात्र है। यहाँ औद्यागिक उत्पाद (factory scale production) और खपतवाद (consumerism) या खानाबदोशी ही चलता है।

अब आप भूल जाये की कोई व्यापारी झुकाव वाला नेता कृषिमके लिए कुछ भी करेगा। वह आपको झांसा ही दे रहा है। कृषि बस वही ही रहेगी जहाँ उद्योगिक स्तर पर उत्पाद होकर लाभ कमाया जा सके।। यानि छोटे किसान और नष्ट होंगे और सिर्फ बड़े किसान बचेंगे जो की और समृद्ध होंगे किसी बड़ी बिक्रय कंपनी से गठजोड़ करके।

Friday, December 23, 2016

Dilip Chandra Mandal जी के नाम खुला पत्र

"जाति तू क्यों नहीं जाती"

@Dilip C Mandal जी,
मुझे लगता है कि इस देश में आरक्षणवादी भी उतने ही बड़े ढकोसले वाले हैं जितना की आरक्षण-विरोधी। अगर किसी आरक्षण-विरोधी बॉस के जमीदारी के व्यवहार से आप परेशान हैं और फिर उसके स्थान पर कोई आरक्षण समर्थक आ जाये तो आप कतई यह अपेक्षा मत रखियेगा की अब आप को जमीदारी और सामंतीय व्यवहार से मुक्ति मिल जायेगी ।
बॉस आपका जैसा भी हो -- चाहे आरक्षण-विरोधी हो, चाहे आरक्षण-समर्थक हो, रहता वह जमीदारी दिमाग वाला ही है ।
कारण यह है कि आरक्षण समर्थकों को भी खुद असल में आरक्षण चाहिए "बॉस" के पद तक पहुँचाने के लिए। ताकि फिर वह लोग अपनी तरह का जमीदारी का डंडा चला सके। मगर चलेगा जमीदारी पना ही। इस देश में जमीदारी पने यानि सामंतवाद का असल में विरोधी तो कोई है ही नहीं। अतीत काल में सवर्ण लोगों ने जिस तरह के तर्क और व्यवहार करके समाज में भेदभाव , ऊँच-नीच फैलाया, तब उससे त्रस्त होकर उससे मुक्ति माँगने वालों ने आरक्षण का दामन पकड़ा। मगर अब खुद आरक्षण के भरोसे "बॉस" बनने पर वापस वही जमीदारी वाला तर्क और व्यवहार ही करते हैं।

और फिर जब आरक्षण-विरोधी आरक्षण से हुए नए युग के भेदभावों से परेशान हो कर आरक्षण व्यवस्था की शिकायत करते हैं तब आरक्षवादि टिपण्णी करते हैं कि, "जाति तू क्यों नहीं जाती"।
आखिर जाति जायेगी कहाँ से ? सामंतवाद वाला तर्क और व्यवहार किसी की जाति से चिपका हुआ नहीं है। और तुमने विरोध जातिवाद का किया है, सामंतवाद का नहीं !! जातवाद तो कोई समस्या न थी, और न हैं। दुनिया भर में feudalism यानि सामंतवाद को समस्या के रूप में चिन्हित किया गया, मगर इसके चरित्र को पहचान करके इसका निवारण किया गया। भारत में आरक्षणवादि, जो की सामंतवाद के सबसे प्रथम पीड़ित रहे हैं, वह सामंतवाद को उसके चरित्रों से न पहचान कर, उसके कुलनाम यानि surname से पहचानते हैं।
अब खुद ही बोलें, आखिर जाति जायेगी कहाँ ?? जब आरक्षणवादि खुद शक्ति आसीन होते हैं तब वह खुद भी सामंतवादी तर्क और व्यवहार ही करते फिरते हैं !! तब फिर सवर्ण नए किस्मम के पीड़ित बन जाते हैं और वह इस सामन्तवादी व्यवहार को वापस इनके surname से पहचानने लगते हैं। बात एक गोल चक्र में घुमने लगती हैं। आप खुद बताये,   कहाँ मुक्ति मिलेगी जाति से ??!!

सामंतवादी तर्क और व्यवहार क्या है, इसके बारे में भारत में कोई चर्चा नहीं होती है।

Monday, December 19, 2016

व्यक्तिनिष्ठता और आत्ममुग्धता के बीच का जोड़

व्यक्तिनिष्ठता और आत्ममुग्धता में भी एक जोड़ है।
सामंत लोग अक्सर करके आत्ममुग्धता मनोरोग (Narcissism Personality) से पीड़ित होते थे। आत्ममुग्ध मनोविकार से पीड़ित लोग अच्छा सामाजिक संपर्क नहीं रख सकते है। क्योंकि वह बात बात में खुद को केंद्र रख कर ही विचारों का मुआयना करते है। उनके लिए वह सही है जो उनको लाभ दे, और वह गलत है जो उनको हानि करे। वह दूसरों की दृष्टि से किसी कृत्य का मुआयना नहीं कर सकते हैं।

आत्ममुग्धता एक प्रकार का austism disorder है, जब बाल्य अवस्था की मैं- मेरा-मुझे ( I-me-myself) से इंसान बाहर नहीं निकल पाता है। ऐसा व्यक्ति empathy नाम की मानव गुण को विक्सित नहीं कर पता क्योंकि वह दूसरों की दृष्टि से मुआयना नहीं करना जनता। और न्याय की दुविधा यह है की न्याय का जन्म होता है "don't do unto others, what you would not do unto yourself" के सिद्धांत से ("दूसरे पर वह मत करिये जो आप अपने साथ होना नहीं देखना चाहते")। autism शब्द का मूल अर्थ भी "आत्म केंद्रित" है। आत्म-मुग्धता यानि narcissism का अभिप्राय भी "आत्म केंद्रित" से जुड़ा हुआ है। आत्ममुग्ध व्यक्ति सिर्फ स्वयं के लाभ और हानि को ही समझ पाता है। इसे बोलचाल की भाषा में स्वार्थी आचरण (selfish behavior) बोलते है। वह दूसरों का फायदा उठना स्वयं सीख लेता है।
    असल में शिशु अवस्था में आत्म केन्द्रीयता जीवन उपयोगी आचरण होता है। इसलिए क्रमिक विकास और प्रकृति ने सभी जीव जंतुओं के शिशुकाल में उन्हें आत्मकेंद्रियता से सुसज्जित किया है। दिक्कत यह है की क्रमिक विकास के बड़े जीव, जैसे की मनुष्य, अपने जीवन के लिए सामाजिकता पर निर्भर भी करते है। इसलिये बाल्य विकास के दौरान साधारण मनुष्य बालक शिशु अवस्था के आत्मकेंद्रियता को त्याग करके सामाजिक में तब्दील हो जाता है। और यदि कही पारिवारिक , राजनैतिक या सामाजिक माहौल में कही कोई गड़बड़ उत्पन्न हो जाये (जैसे अत्यंत गरीबी, हिंसा, पारिवारिक क्लेष, इत्यादि) तब शिशु आत्मकेंद्रियता को त्याग नहीं कर पाता और वयस्क हो कर आत्ममुग्ध आचरण का व्यक्ति बन जाता है।

आत्ममुग्धता ऐसे व्यक्ति को सफलता खूब दिलाती है। वह एहसान लेकर भी एहसान फरामोशी कर सकता है। वह धोखा दे सकता, पीठ पीछे खजर चला सकता है। इसलिए वह कामयाब नज़र आता है। बस सामाजिक संबंधों में बाधा रहती है। उसके दोस्त तो बहोत होते हैं, मगर अपने सगे कम होते है।

सामंतो की सफलता भी आत्मकेंद्रियता से ही आती है। इसलिये आत्ममुग्धता अक्सर सामंतवादी चरित्र "गुण" है, जो की वैसे एक शिशु विकास का दोष होता है।

सामंत या वैसी मानसिकता के लोग आसपास ऐसे ही लोग रखते है जो की उनकी हाँ-में-हाँ भरे। न्याय वही करते है जो उन्हें लाभ दे। उनके मस्तिष्क को एक यौन आनंद का अनुभव होता है अपने शत्रु को परास्त करके, उपहास या अपमान करके। वह इस प्रकार के आनंद के आदि होते है।  इसे मनोविज्ञान में narcissistic pleasure supply बुलाया जाता है। आसपास खुदामद और चापलूसों का हुजूम बनाये रहते हैं। ऐसे लोगों को निष्पक्ष होना मुश्किल होता है। वह वस्तुनिष्ठ(objective) व्यवहार नहीं कर सकते हैं। वह व्यक्ति की अपने प्रति निष्ठा को  बढ़ावा देने के लिए उन्हें इनाम में पदोन्नति देते है । और शत्रु और तीखे आलोचकों को सजा के तौर पर प्रताड़ना।
बस, यही से व्यक्तिनिष्ठता सरकारी या कार्यालय का मान्य आचरण बन जाता है।

कलयुग में झूठ की marketing

Marketing क्या है ??

Marketing  एक बेहद अलंकृत शब्द है कलयुग में जनता को बुद्धू बना कर झूठ, फरेब, नुक्सानदेहक , नशीली वस्तु को बेचने का, एक "अवैध" वस्तु के व्यापार करने का।

वास्तव में marketing का अर्थ अपने मूल भाव में था किसी  दुर्लभ, अपर्याप्त, मगर वैध व्यापारिक वस्तु की सहज बिक्री और व्यापार हेतु उस वस्तु को जनता के बीच पहुचाने का logistical क्रम बनाना, जिससे उस वस्तु की आसान उपलब्धता से उसकी सहज बिक्री को प्राप्त किया जा सके।
जाहिर है की marketing के प्रासंगिक अर्थो में promotion और advertising भी आता है, क्योंकि जब कोई वस्तु दुर्लभ और अपर्याप्त होती है तब उसकी जन सूचना और जनता के बीच उसकी जानकारी भी कम होती है। इस बाधा को पार लगाने के लिए जिस पद्धति को उपयोग में लाया जाता है उसे promotion और advertising कहते है।

मगर वर्तमान में marketing के मायनो में वह "दुर्लभ और अपर्याप्त" व्यापार की वस्तु एक "अवैध पदार्थ" है, जिसके व्यापार पर आरंभिक दिनों में प्रतिबन्ध माना गया था।

आधुनिक जानकारी युग की  वह अवैध व्यापारिक वस्तु क्या है ?
--
"एक बेबुनियाद, स्वयं अपने पैरों पर टिका न रह सकने वाला झूठ" ।
DISINFOMATION.

जी हाँ। आधुनिक काल information age वाला कलयुग है। यहाँ जानकारी बिकती है तो साथ साथ झूठ भी बिकता है। जरूरतों की बात है, कुछ व्यापार अज्ञानता, अबोद्धता , असमंजस जैसी जन चेतना पर ही टिके हुए है। प्रजातान्त्रिक राजनीति भी ऐसा ही एक उपक्रम है। जानकारी में मिलावट करके झूठ को लोगों को निरंतर बेचा जाता है और अरबो रूपए का मुनाफा कमाया जाता है।

झूठ को निरंतर बिकते रहने के लिए जिस logistical क्रम की आवश्यकता होती है वह है propaganda और Disinfomation। जैसे किसी सामान्य वस्तु की बिक्री के लिए जनता में जानकारी लाने हेतु promotion और advertising की जरूरत होती है, उसी तरह झूठ के लिए propaganda चाहिए होता है।
झूठ के propaganda की पद्धति होती है जन सूचना माध्यम। यानि समाचार सूचना तंत्र, जिसे मीडिया केह कर भी बुलाया जाता है।

झूठ की Marketing, यानि झूठ को आसानी से लोगों के बीच स्वीकृत करवाने के लिए जिस logistical (लॉजिस्टिकल) क्रम की आवश्यकता है वह इस प्रकार है
झूठ बोलो,
ज़ोर से बोलो,
बार बार बोलो,
लगातार बोलो,
जब तक की,
लोग उसे ही सच न मान ले।

Sunday, December 18, 2016

व्यक्तिनिष्ठता भरा मूल्यांकन और थल सेना अध्यक्ष की नियुक्ति

सोचता हूँ कि योग्यता नापने का तराज़ू कौन सा प्रयोग किया गया होगा? कौन सा वस्तुनिष्ट, objective, मापन थर्मामीटर है योग्यता नापने का ? वरिष्ठता का तो पैमाना होता है , मगर योग्यता क्या ?
क्यों supersede करवाया गया सेना अध्यक्ष को ?

व्यक्तिनिष्ठता , यानि subjectivity सामंतवाद युग वाली न्याय व्यवस्था का वह चरित्र है जो की सभी प्रशासनिक बर्बादियों का जड़ था। subjectivity मनमर्ज़ी के कानून को जन्म देती है। प्रमाण और साक्ष्यों को अपनी सुविधा और पसंद से स्वीकृत या अस्वीकृत करने का मौका देती है। discretion और arbitrariness को ही कानून बना देती है। फिर यही से भेदभाव जन्म लेता है। रंगभेद, लिंगभेद, परिवारवाद nepotism, क्षेत्रवाद , जातिवाद , सब कुछ पनपता है। समाज के 80 प्रतिशत आबादी को 15 की आबादी नियंत्रित करने लगती है। वैसी सामाजिक , राजनैतिक और प्रशासनिक परिस्थितियां बनती हैं जिनके सुधार के लिए आज़ादी के युग में आरक्षण सुधार व्यवस्था का जन्म होता है।

पश्चिम के समाज में सामंतवाद की  व्यक्तिनिष्ठता वाली इसी बदखूबी को खत्म करने के लिए Dicey's  rule of law और Driot Administratiff का जन्म हुआ।

बेहद दुखद है की तमाम संविधान और कानून लिख डालने के बावज़ूद भारतीय प्रशासन आज भी वस्तुनिष्ठता यानि subjectivity के तौल ही प्रयोग करना पसंद करता है।
आज भी समझ और ऑब्जेक्टिव पैमानों के परे है की कौन सी फ़िल्म हिट होने लायक है और कौन सी नहीं । बल्कि जब बॉक्स ऑफिस पर कमाई को objective पैमाना माना जाने लगा तब ऐसी ऐसी फिल्मो ने भी कितने सौ करोड़ों की कमाई कर डाली है की मुंह खुला रह जाता है की क्या ऐसी फ़िल्म भी हिट थी ?
यही हाल क्रिकेट के खिलाडियों का है। बल्कि पूरे स्पोर्ट्स प्रशासन का यही हाल है । कौन सा खिलाडी अंत में किसी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करेगा , यह कोई और जान ही नहीं सकता सिवाए उसका सिलेक्शन पैनल (selection panel)।

आज़ाद भारत में अभी भी तथ्य से अधिक प्रबल श्रद्धा है। लोग प्रमाणों का मूल्यांकन जानते ही नहीं है। गवाहों और मुज़रिम के चरित्र अपने अपने श्रद्धा से समझ कर तय किया जाता है की कौन सही केह रहा है और कौन नहीं। marketing एक अलंकृत शब्द उभर आया है, झूठ और फरेब को बड़ी आबादी को बेचने का। नीतिगत कार्यों के मूल्यांकन का, उनके fact checking और objective मूल्यांकन का कोई प्रबंध नहीं किया गया है।

औसत भारतीय प्रबंधक आज भी performance evaluation में व्यक्तिनिष्ठ पैमानों को अधिक प्रयोग होने देता है । performance evaluation को तो प्रकट रूप में "गाजर" बुलाया जाता है good book culture को ऑफिसों में आपसी सम्बन्धों और नियंत्रणों को लगाने का। मगर फिर भी सब कुछ बदस्तूर जारी है।

Wednesday, December 14, 2016

सांस्कृतिक इतिहास की एक कहानी -- गणराज्य और प्रशासनिक सुधारों का जोड़

प्रशासनिक सुधारों के इतिहास के दृष्टिकोण से समझें तब आभास आता है की आज़ादी हमें जीत कर नहीं, बल्कि भीख में मिली है। असल में आज़ादी पाने के तरीके की बहस का माहौल राजनैतिक या सांस्कृतिक नहीं है। लोग अकसर इस बहस को नेहरू और गांधी वाद से जोड़ देते है, सुभाष चंद्र बोस को दूसरा सिरा बना कर पूरी बहस राजनैतिक उठा पटक में चली जाती है।
जबकि इस बहस का वास्तविक कक्ष प्रशासनिक सुधार है।
आज़ादी के बाद हमने भारत को जब गणराज्य बनाने का संकल्प लिया तब हमने अपनी खुद की वेदना के सांस्क़तिक इतिहास से कोई सबक नहीं लिया। बल्कि अंग्रेज़ जो छोड़ कर जा रहे थे, उसको वैसा ही अपना लिया, और तीन साल बाद जो संविधान भी रचा तो उनके सांस्कृतिक इतिहास के पाठ को बिना सोचे समझे नक़ल कर लिया।
नतीजा यह है आज हमने सबसे बड़ा संविधान लिख डाला है, मगर हमारे यहाँ rule of law है ही नहीं, कोई  उस संविधान का पालन कर्ता और संरक्षक है ही नहीं।
क्योंकि हम यह चिंतन कभी कर ही नहीं पाये की हमने गुलामी में जो पीड़ा , क्रूरता, निर्दायित देखि और सहन करी, उसके वास्तविक कारण क्या थे।अधिकांश भारतवासी तो गुलामी की पीड़ा दयाक इतिहास में बस मुस्लिम और ब्रिटिश शासन का होना ही गलत मनाते हैं।
इसके विपरीत पश्चिम देशों में गणराज्य की स्थापना सामंतवाद की विस्थापित करने की लिए आई थी।
क्या थे सामंतवाद प्रशासन व्यवस्था के वह गुण जिनसे उत्पनम क्रूरता और बर्बरता से निजात पाने के लिए गणराज्य व्यवस्था की नींव डाली गयी ?

फ्रांस और ब्रिटेन की क्रांति के बाद जब वहां से राजशाही खत्म हुई तब उसके स्थान पर जो शासन व्यवस्था आई उसमे जो कुछ सुधारात्मक बदलाव किये गए थे, वैसा चिंतन भारत में कभी हुआ ही नहीं। हमारे लोगों ने सारा दोष पुराने शासकों के धर्म मुस्लिम पंथ और उसके बाद अंग्रेजों पर फोड़ दिया । जबकि सच यह है कि सुशासन के लिए शासक का धर्म इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है,जितना की उनके शासन की विधि। अकबर को महान इसलिए कहलाते है क्योंकि शासन की विधि अपने युग से बहोत उच्च कोटि की थी। जबकि भारतीय right wing nationalist का आरोप है की अकबर को महान कहने के पीछे mind wash की साज़िश है, जबकि राणा प्रताप उससे पराक्रमी थे । अब इन फर्ज़ी nationalist कौन समझाए की सुशासन के लिए पराक्रम नहीं, नीतियों का अच्छा होना ज़रूरी है। इतिहास में राणा प्रताप के शासन विधि का कोई अध्याय है ही नहीं, हालाँकि चेतक घोड़े से किले की दीवार से कूद लगाने के तमाम किस्से और मूर्तियां मौज़ूद है। उधर अकबर के नौ रतन, और जिसमे हिन्दू राजाओं को भी शामिल करने का इतिहास विश्व व्यापक दर्ज़ है। अकबर ने धर्मों के आगे निकल कर आदमियों को चुना, एक अच्छ शासन की नीव डालने के लिए। राजा तोडर मल का नौ रत्नों में चयन अकबर की यही क़ाबलियत दिखलाता है, उसके सुशासन के प्रति वचन बद्धता।

शासन विधि पर भारत में कोई चर्चा और चिंतन नहीं हुआ है। जन चेतना में आज़ादी के सारी चर्चा दोषारोपण से भरी हुई है -- नेहरू सही थे या गलत थे, गांधी सही थे या गलत थे, सुभाष बोस आते तो क्या हो जाता, सरदार पटेल प्रथम प्रधानमंत्री बनाये जाते तो right wing nationalist की काल्पनिक दृष्टि से क्या क्या हो जाता, भारत कितना महान बना दिया जाता, वगैरह वगैरह।

इस प्रकार की मानसिकता के विपरीत फ्रांस और ब्रिटेन में शासन विधि के सुधार पर ध्यान गया। बात सिर्फ यही तक नहीं थी की अब राजशाही खत्म करके नया शासक किसी चुनावी प्रक्रिया से जनता में से चुना जायेगा। उनका चिंतन सामंतवाद युग प्रशासनिक कमियों को चिन्हित करने में गया, जिसमे फेरबदल करके नयी प्रशासन विधि अपनायी गयी।
इधर भारत में प्रशासन सुधार में तो कोई जन चेतना बनने ही नहीं पायी। सारी बहस जिससे जन चेतना का प्रसार होता वह तो नेहरू-गांधी-सुभाष-पटेल प्रपंच में हड़प ली गयी।
  फ्रांस में प्रशासनिक सुधार के लिए एक व्यवस्था droit administratiff की नीव डली और ब्रिटेन में Dicey नाम के एक चिंतक के विचारों के आधार पर rule of law ने जन्म लिया। असल में गणराज्य के मूल प्रशासन विधि innocent until proven guilty और separation of power की नीव यही से डाली गयी थी। भारतीय जनता को इन सिद्धांतो का अभी तक ज्ञान नहीं है, न तो इनकी आवश्यकता को समझा है और न ही इनकी कमियां और लाभ को।
इसलिए संविधान के इतने बड़े लेख के बावज़ूद उसका पालन करने वाला शासक आज भारत में कोई है ही नहीं। आज़ादी के इतने सालों बाद हम लोग एक नकली प्रजातंत्र में जी रहे है, जहाँ नए प्रकार के सामंतवाद ने जन्म ले लिया है, कोई व्यवस्था सुचारू नहीं चलती है, कोर्ट अपनी मर्ज़ी से अपने राजनैतिक आकाओ को संरक्षण देते हैं, पुलिस के यही हाल है, और पोलिटिकल class नए सामंत है जो की अपनी तनख्वा बढ़ाने का कानून खुद ही पारित करते हैं। जनता से referendum करने का उपाय का मज़ाक बनाया जाता है की "गुसलखाने जाने से पहले भी जनता से पूछना होगा", और बदले में जनता को पञ्च साल में एक बार वोट देने की "महाशक्ति" दे दी गयी है और वह भी सिर्फ एक बुलेट वोट !!

सामंतवादी न्याय व्यवस्था प्रजा के कष्टों का मूल थी, न की शासक का धर्म या मजहब। प्रमाण , साक्ष्य , प्रमाण के उत्तरदायित्व की विधियां वह बिंदु थे जिनमे क्रांति के बाद सुधार हुआ। शासक का मजहब इन देशों में समस्या था ही नहीं।।मगर भारत में तो अभी तक जन चेतना में शासक की जाति और मजहब को दोष दिया जाता है। वैसे भेदभाव की जब बात आती है तब संतुलित न्याय प्रणाली इन बिंदुओं पर भी गौर करती है, मगर फिर सम्पूर्ण प्रशासन सुधारो में भेदभाव तो मात्र एक अन्य बिंदु ही है, एक बहोत बड़ी सूची में।
ऐसा लगता है की मानो भारत में कुशासन का पूरा दोष भेदभाव को ही मान लिया गया है, दूसरे कारणों को अनदेखा करके।

सामन्तवाद या राजशाही युग के प्रशासन विधि की जिन चारित्रिक विशेषताओं ने जनता को बहोत त्रस्त किया था वह थे :-
1) मनमर्ज़ी के कानून बनाना, जिनकी कोई पूर्व घोषणा या जनसूचना नहीं होती थी, मनमर्ज़ी से उन्हें हटा देना,बदल देना, या किसी भी समय से उनको लागू कर देना ; अलिखित या मौखिक दिए गए कानून
2) कानून सभी के लिए एक समान नहीं होना, राजाओं और उनके पसंदीदा लोगों को कानून से ऊपर मानना
3) विरोधाभासी कानूनों का बनाना, जिसमे खुद के लाभ और हितों को सर्वोपरि रखना, उनको जमाये रखना
4) व्यक्तिनिष्ठ व्यवस्था जिसमे प्रमाण , साक्ष्य, आंकलन, recruitment को वस्तुनिष्ठ आधारों पर नहीं, बल्कि व्यक्तिनिष्ठ आधारों पर तय करना।

प्रशासन विधि के इन अवगुणों से निजात पाने के लिए फ्रांस में droit administratiff प्रसार में आया। इसकी स्थापना नापोलीयन नामक शासक ने करी थी, जिसके लिए उसे आज तक का फ्रांस का सर्वश्रेष्ठ नागरिक माना जाता है।
उधर ब्रिटेन में dicey नामक चिंतक ने भी rule of law में इन्ही उवगुणों से निजात के प्रयास किये थे।
प्रशासन की दोनों ही विधियों में यह माना गया था यदि विधान बनाने की क्षमता और न्याय देने की शक्ति एक ही व्यक्ति या संस्था में आ जायेगी तब फिर इंसान और नागरिक कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकता है, उसे कभी भी नाना प्रकार के उत्पीड़नों से मुक्ति नहीं मिल सकती है। बस separation of power को यही से प्रशासन विधि का प्रथम मूलमंत्र मान लिया गया। हालाँकि इसकी कमी को भी पहचाना गया की व्यवहारिकता में ऐसी व्यवस्था पूर्णतः संभव नहीं है। इसलिए फिर शक्ति संतुलन और जन चेतना को प्रशासन विधि में प्रतिपल साक्ष्य बनाये रखने की चतुर विधियां विक्सित करी गयी।
 

rule of law व्यवस्था अभी भी औसतन भारतीय की समझ में नहीं आया है। rule of law व्यवस्था मनमर्ज़ी के कानून, अलिखित और पूर्व घोषणा के बिना बनाये कानून, असमान और विरोधाभासी कानूनों का समापम , व्यक्तिनिष्ठ प्रमाणों से निजात इत्यादि पहलुओं पर केंद्रित है। औसतन भारतीय जहाँ भी प्रबंधन में होता है वह बार बार सामंतवादी प्रशासन प्रणाली वाले नियमों को उत्पन्न करके लागू करता ही करता है। इसलिए श्रमिक हितों का उलंघन भारतीय प्रबंधकों का मूल "कौशल" बन गया है, जो की वैसे एक अवगुण और असामाजिक आचरण होना चाहिए। औसत भारतीय प्रबंधक या प्रशासक नियमों को इतना जटिल, अस्पष्ट और भूलभुलैया  बना देता है की misfeasance, malfeasance और non feasance आये दिन का प्रशासनिक दोष बन जाता है। नियम होते है, मगर उनको लागू करना या न करना वापस मनमर्ज़ी विधि पर आ टिकता है। यानि वापस सामंतवादी प्रशासन के अवगुण , एक विशाल कानून भूलभुलैया मार्ग व्यवस्था से होते हुए।

व्यक्तिनिष्ठता अभी भी औसत भारतीय प्रबंधकों का मानव नियंत्रण शक्ति का मूल स्रोत है। performance evaluation के माध्यम से भेदभाव, मनपसंद व्यक्ति को बढ़ावा, नापसंद का उत्पीड़न यह सब औसत भारतीय प्रबंधक के इर्दगिर्द शासन की आम कहानी है।
हम जब भी आज़ादी की बहस को नेहरू-गांधी-सुभाष-सरदार पटेल प्रपंच में डालते हैं , अपने लघुचिन्तन मस्तिष्क में हम व्यक्तिनिष्ठता से बाहर आने से मना कर बैठते हैं, जबकि प्रशासनिक सुधारों के एतिहासिक सबक में सामंतवाद युग की सर्वप्रथम त्रुटि तो प्रशासन और न्याय विधि ही मानी गयी है। तो, हम अनजाने में हम बदलाव तो मांगते है , मगर सुधार करने को मना कर देते हैं।