Mercantile कृष्णा और Martial कृष्णा

कृष्ण हिंदुओं के सर्वप्रिय पूजनीय ईश्वर हैं । हालाँकि कृष्ण के प्रति आस्था रखने वालों की विशाल जनसँख्या है, मगर मेरे देखने भर में यह समझ आया है की इस विशाल जनसँख्या में सभी व्यक्तियों की कृष्ण आस्था के लिए एकाकी तर्क रेखा एक नहीं है।
    कृष्ण का चरित्र चंचल, बहुमुखी और शक्ति सम्पन्न है। इसलिए उनके भक्त उन्हें अपने अपने दृष्टिकोण से , अपने कारणों से पूजनीय मानते हैं।
जैसा की मैं समझ पा रहा हूँ, -
1) अधिकांश वैश्य समाज कृष्ण को वैश्विक सफलता के कारणों से अर्चना करते है। कृष्ण चरित्र इंसान को कई सारे सामाजिक बंधनों से मुक्त करवाता है। रासलीला से लेकर द्रौपदी चीरहरण , और फिर अपने ही कुल के वृद्धों का संहार करना, श्री कृष्ण चरित्र के कुछ ऐसे पक्ष है जो वैश्य (Mercantile, the mercators) समाज को करीब करीब निरपराध होने का चैतन्य प्रदान करता है, जो की corporate wars के दौरान अपने विरोधी की प्रति सर्वाधिक अनैतिक कार्यवाही करने में भी अपराध बोध से मुक्ति दिल देता है। कृष्ण चरित्र कुछ ऐसा समझा जाता है कि मानो सही-गलत यानि अंतरात्मा की ध्वनि तो बस बाधाएं है सफलता और युग विजय के मार्ग में।

   2) इसके विपरीत, क्षत्रिय विचारधारा (martial) में कृष्ण को भगवान राम चंद्र का अगला अवतार माना जाता है जो की मर्यादाओं को भविष्य काल के युग में भी निभाने की सीख देते हैं। राम चंद्र मर्यादा बद्ध होने के कारण अधिक कष्टकारी जीवन व्यतीत किया। कृष्ण को हमेशा वृन्दावन में आनंद क्रीड़ा करते या फिर बैकुंठ में विराजमान , विश्राम करते ही देखा जाता है। मगर भगवद्गीता का उच्चारण फिर भी युद्ध भूमि में ही हुआ, और जो की क्षत्रिय समाज को धर्म निभाने की परम शिखर देता है की जब धर्म की रक्षा करनी हो तब यदि अपने परिवार भी सामने हो तो युद्ध करके उसे परास्त करना ही पड़ेगा। तो इस रूप में क्षत्रिय समाज में कृष्ण अभी भी मर्यादा बंधित ही करते है, और बताते है की मर्यादाबंधित व्यक्ति का जीवन कष्टों से भरा होता है, मगर अंत में बैकुंठ के ऐश्वर्य में बैठा ईश्वर मर्यादा बद्ध व्यक्ति का ही साथ देता है। द्वापर युग में पांडवों का जीवन भी सतयुग में श्रीराम चंद्र के जीवन की भांति कष्टों से भरा हुआ था।

कृष्ण का mercantile स्वरुप और martial स्वरुप, दो अलग-अलग रूप मे चरित्र चित्रण मेरे लिए एक स्पष्ट होता वर्तमान युग का संस्कृति तथ्य है। mercantilist कृष्ण अपने अनुयायिओं को और अधिक निरपराध और conscience-free करते है, जबकि martial कृष्ण मर्यादा बद्ध या tied to conscience कर देते हैं।

Popular posts from this blog

BODMAS Rule सैद्धांतिक दृष्टि से क्या है?

The STCW 2010 Manila (Scam) Convention

Difference between Discretion and Decision making