Sunday, September 04, 2016

दशरथ मांझी हमारे संविधान की फसल है, हमें एक विकृत सबक सीखने का नायक और नमूना ।

संविधान के निर्माताओं की मानसिकता का एक विक्षिप्त पहलू तो स्पष्ट है।  संविधान निर्माता भारत को प्रजातंत्र तो बनाना चाहते थे मगर उन्हें भारतियों की मानसिक और बौद्धिक योग्यता पर भरोसा नहीं था । शायद इसलिये की अभी अभी हज़ारों सालों की गुलामी से निकले समाज में शायद उन्हें शक था की सामाजिक चेतना की कमी होगी । अपनी मानसिकता में छिपे इस बिंदु के चलते संविधान निर्माताओं ने भारत में एक अर्ध-पकी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था की नींव डाल दी । उन्होंने भारत में किसी असली प्रजातंत्र की भांति शक्ति संतुलन के पक्ष से जनता और प्रशासन में शक्ति संतुलन नहीं बसाया। संविधान निर्माताओं ने जनता को प्रशासन के बनस्पत परिपूर्ण सशक्त नहीं बनाया है। निर्माताओं  द्वारा संविधान काव्य में से ठीक वह पेंच-कील निकाल कर भारत का प्रजातंत्र बसाया गया है जिसमे जनता के शक्ति नष्ट हो गयी है । यहाँ शक्ति संतुलन के सिद्धांत को न अपना कर शक्ति नियंत्रण के सिद्धांत को अधिक बल दिया गया है । पांच साल में एक बार, वह भी single bullet वोट की व्यवस्था। इस पद्धति से जनता को यही समाज और प्रशासन मिलाने वाला था। अगर किसी प्रशासनिक नेतृत्व के आचारण से किसी नागरिक को कष्ट है तब वह उस नेतृत्व को नियंत्रित करने के लिए पांच साल में एक बार , वह भी मात्र एक वोट से अपना प्रयास कर सकता है। नागरिक तुरंत से प्रशासन के उस नेतृत्व के व्यवहार को किसी भी विधि से संतुलित नहीं कर सकता है।
भारत एक अर्ध-पकी डेमोक्रेसी  है। न यहाँ रेफेरेंडम हैं, न ही राईट तो रिकॉल । नागरिक को सब प्रयास साँझा होकर जनता के रूप में ही करने होते है। इससे वैसे ही व्यक्ति की इच्छा शक्ति क्षीण हो जाती है। और फिर जनता चुनाव प्रक्रिया से सिर्फ प्रतिनिधि चुन सकती है। किसी  भी प्रशासनिक पद के लिए चुनाव नहीं होता है जिससे की जनता सीधे-सीधे प्रशासन नेतृत्व को प्रभावित कर सके । नागरिक दूसरे नागरिकों के साथ साँझा रूप में जनता बन कर सिर्फ गिड़गिड़ा कर  प्रतिनिधि चुनने का प्रयास कर सकता है , सीधे सीधे कुछ प्रभाव नहीं डाल सकता है ।
    यानि बिहार के दशरथ मांझी जिसे हमारी सिनेमा ने आज एक हीरो बनाया है , असल में वह हमारी संवैधानिक व्यवस्थ का वह मनवांछित फल है जिसे संविधान निर्माताओं ने बोया था , और आज वह हमारा नायक बन कर यही सबक देने आया है की  गिड़गिड़ाने की आदत पकड़नी होगी या फिर मांझी की तरह खुद से, अकेले अकेले अपनी सुविधा का निर्माण करना होगा । इस अर्थ में दशरथ मांझी हमारे संविधानिक व्यवस्था का नायक और नमूना दोनों ही है , जिससे हमें सबक एक विकृत सबक सीखना है , इस संविधान व्यवस्था के आधीन जीवन  बसर करने का । इस संवैधानिक व्यवस्था से यदि राम राज्य भी चलाया जायेगा तो वह भी आज के भारत की तरह विभाजित समाज वाला, सम्पूर्ण अव्यवस्थित, पॉलिटिशियन उच्च जाति वर्ण की बिमारियों से ग्रस्त देश बन जायेगा ।