पौराणिक ऋषि मुनि और दलित वर्गों का उनके प्रति दृष्टिकोण

मनु स्मृति के रचियता , भगवान् मनु की जो भी वास्तविक मंशा रही हो जब उन्होंने समाज में व्यवस्था वर्गों का निर्माण किया हो, मगर आने वाली मानव पीढ़ी ने उनके काव्य को ही तर्क के रूप में प्रस्तुत करके सामाजिक भेदभाव की नीव डाली, जात पात भेदभाव किया, और मानवता के एक विशाल वर्ग को भौतिक मानव सम्मान से वंचित करके पशुओं से भी निम्म जीवन यापन के लिए बाध्य कर दिया था, और जो की सहस्त्र युग तक कायम रहा।
   सवाल यह है की यदि इसमें भगवान मनु और उनके काव्य की कोई गलती नहीं थी, तब फिर उन लोगों को पहचान करके दण्डित करने की आवश्यकता है जिन्होंने उनकी रचनाओं का कु उच्चारण किया। तुलसी दास के युग तक तो सीधे सीधे तुलसी रामायण में लिए वाक्यांशों से तर्क विक्सित किये गए की "पशु शुद्र और नारी सब ताड़न के अधिकारी", महाभारत में गुरु द्रोण और एकलव्य प्रसंग में से तर्क विक्सित किये गए कि यह लोग चोरी करते है, plagiarism और इसलिए इनके अंगूठे काट देने चाहिए।
   स्वाभाविक है की अमानवीयता के भुगतभोगी आज इन सभी से घृणा करेंगे-- मनु, मनुस्मृति, तुलसीदास , तुलसी रामायण और गुरु दृणाचार्य ।

मगर आज भी जो देखने को मिल रहा है भुगतभोगी वर्ग की शिकायतों पर कार्यवाही के विपरीत जाते हुए,  उन कु उच्चारण करने वाले समूह की पहचान करने के बजाए भगवान मनु, द्रोणाचार्य और तुलसीदास के बचाव और सम्मान में कार्य किया जा रहा है। यह सब तो शोषित वर्ग को denialism के समान प्रभावित करेगा !! आरक्षण विरोध के अधिकांश,99%, तर्क भी denialism से ही निर्मित हो रहे हैं। denialism यानि वह जो भेदभाव के तथयिक सत्य को स्वीकार करके उसमे सुधार करने की बजाए 'भेदभाव हुआ ही नहीं,सब मनगढ़ंत है' को प्रमाणित करने में बल देता है ।

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