सोशल मीडिया की बहस-- प्रजातंत्र में एक नया अध्याय

"बात को काटना" एक व्यक्तव्य है जब किसी के द्वारा कहे जा रहे विचार को बीच में ही किसी प्रशन , या अन्य विचार के प्रक्षेपण के द्वारा भंग कर दिया जाता है । यह एक सोची-समझी हरकत भी हो सकती है , या एक आकास्मक क्रिया भी जब जोश में, और फिर भूल जाने के भय में, या फिर नए आकास्मक विचार के विलयित हो जाने के भय से उसे उत्तेजना में तुरंत ही प्रक्षेपित कर बैठते हैं ।
      सोशल मीडिया पर चलने वाली बहस 'नुक्कड़ की चाय की दूकान' की बहस से थोडा हट कर होती है । यदि आप मवाली की भाषा में बहस को "बोल बचन " के रूप में समझने के लिए भ्रमित-प्रशिक्षित किये जा चुके हैं , तब आपको इस लेख के विचार को समझने में थोडा दिक्कत हो सकती है । क्योंकि इस लेख के विचार में आपको एक Brain washed व्यक्ति मान कर चला गया हैं ।
         सोशल मीडिया की 'डिबेट' को यदि हम मवाली की भाषा-विचार में भी समझे तब भी थोडा त्रुटी-पूर्ण होगी यदि आप इसे "बोल बचन" समझेंगे । यह बहस "लेख बचन " के समान होती है। यहाँ 'बात काटना' एक आसान क्रिया नहीं होती है । इसलिए क्योंकि कंप्यूटर सॉफ्टवेर हर एक प्रतिभागी को अपने विचार लिखने का पूरा स्थान और समय देता है । इसलिए लेखों से भरी हुयी बहस बहोत ही विचार-पोषित सामाजिक मंथन बन जाता है । मौखिक विचार-मंथन में यह संभव नहीं होता है । वहां इतनी देर में तो न जाने कितने ही बार 'बात-काट' हो जाती ।
         लेखन और वाचन में अपने-अपने लाभ और कमियाँ होती है । सोशल मीडिया में चूँकि आप लिख रहे होते हैं , आपके विचार स्वतः एक 'लाग बुक' में दर्ज हो जाते हैं । आप बाद में इनसे मुकर नहीं सकते , हालाँकि की संशोधन अवश्य कर सकते हैं । मगर फिर यह संशोधन और उसके प्रभाव भी इस "लाग बुक' में दर्ज हो जाते हैं । और , दूसर की यह पूरे समाज में जाते हैं , जो की पारदर्शिता का प्रतीक है । यह विचार किसी सुमाडी में , एकांत में , नहीं रह जाते हैं । ऐसे में विचार में छिपा सामाजिक न्याय भी जग-ज़ाहिर हो जाता है , वह किसी ख़ास वर्ग या समूह का 'न्याय'(जो शायद अन्यायी विचार भी हो सकता है ) नहीं रह पाता । लेखन की कमियां यह हैं की लेखन की क्रिया में समय बहोत लगता हैं , वाचन के मुकाबले । दूसरा की लेखन में शैली , शब्द कोष , व्याकरण इत्यादि हर व्यक्ति के सहज ज्ञान में संभवतः नहीं पाया जाता है । कम से कम भारत की शिक्षा प्रणाली में तो इस प्रतिभा को विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया गया है । तब यह 'लिखित क्रिया की बहस में सभी को समलित होने पर आशंका रखी जा सकती है । मगर यह भी संभव है की जो विचार कोई एक व्यक्ति न लिख पा रहा हो , वह उसके स्थान पर कोई और लिखित कर दे ।
     सोशल मीडिया पर चलने वाली बहसों से कई लोगों ने अपनी आपत्ति और गंभीर-वेदना (शारीरिक और मानसिक ) प्रकट किया है । उन्हें लगता है की इन बहसों में उनके विचारों को कोई सम्मान नहीं दिया जाता है । सोशल मीडिया में आपके लेखन में तर्क , विवेक पर ध्यान दिया जाता है । यह किसी प्राइमरी स्कूल का प्राथना-मंच नहीं है जहाँ छोटे बच्चों को प्रोत्साहन देने के वास्ते मात्र मंच पर जा कर समूह का सामना करने के लिए ही ताली बजा दी जाती है । सोशल मीडिया में भाषा से भी अधिक आपके लेख में संलग्न विवेक को देखा जाता है । यह सारी क्रिया एक प्राकृतिक ताकत के तेहत हो जाती है , यदि वह सोशल मीडिया समूह सभी के लिए ही खुला हो । इसलिए क्योंकि एक बड़े समूह में स्वतः एक सांख्यकी-स्थिरता की क्षमता मानी गयी है। कही- न-कहीं, कोई-न-कोई लेख में किसी नए बिंदु पर गौर कर ही देगा ।
      यदि एक प्रजातंत्र में सभी के विचारों के लेकर आगे बढने का तरीका यही था कि संसद भवन में बहस कर के सभी के विचारों को स्रोत लेकर एक सर्वॊत्तम विचार का निर्माण करना , तब प्रजातंत्र में कई सारे नए छोटे संसद भवन को सोशल मीडिया के रूप में स्वागत करिए । प्रजातंत्र में प्रत्येक आम व्यक्ति को निति-निर्माण में प्रतिभागी होने बनाने का एक नया माध्यम इजाद हो चुका है ।

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