विविधता श्राप बन जाती है, अगर नीति निर्माण का एक-सूत्र तलाशना न आये

मात्र विविधता से कोई देश प्रजातन्त्र राष्ट्र नही बन जाता हैं। क्योंकि देश मे से राष्ट्र बनता है एक-सूत्र से बंधने पर। यहां सवाल उठेगा की सबको बांधने वाला वह एक-सूत्र क्या होगा ?
कहने का मतलब है कि कोई भी देश विचारों की विविधता तो रख सकता है, मगर देश के संचालन के लिए नीतियां एक ही रखनी पड़ती है।
तो असली समस्या अब शुरू होती है जो कि जन्म लेती है विविधता से ही। वह है कि विविध विचारों में से एक-सूत्र में बांधने वाली नीति कैसे निर्माण करि जाए?
इसी सवाल का जवाब दूंढ सकने की काबलियत ही देश मे प्रजातन्त्र और विविधता दोनों को ही कायम रख सकेगा, अन्यथा विविधता तो एक श्राप बन जाएगी, और फिर प्रजातन्त्र और विविधता धीरे-धीरे आत्म-मुग्ध तानाशाही में तब्दील हो जाएगा।
तो समझा जा सकता है कि कैसे प्रजातन्त्र को कायम रख सकने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है विविधता में से नीति निर्माण का आवश्यक एकाकी सूत्र ढूंढ सकने की काबलियत। इसीलिए सभी प्रजातंत्रों को संसद जैसी संस्था की आवश्यकता महसूस हुई।
अब इसके आगे बात आती है उस एकाकी सूत्र की स्थिरता की। क्योंकि गलतियां और बेवकूफियां कोई समाज यूँ भी कर सकता है कि वह नीति संचालन वाले एक-सूत्र को हर पांच साल पर पूरा ही बदलता रहे। ऐसे करने से दिक्कत यह हो जाएगी कि किसी भी नीति में आत्म-सुधार की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। जबकि इंसानी समाज के विकास की गाथा से ज्ञान यही मिलता है कि विकास की प्रक्रिया आत्म-सुधार से ही निकलती है, जिसे trial-and-error नाम से भी बुलाते हैं।
तो इसके लिए नीतियों का लंबी अवधि तक स्थायी होना अगली बड़ी चुनौती है।
इसके जवाब में ही "सत्य के केंद्र" की स्थापना आवश्यक है। एक ऐसी संस्था जो कि बहोत ही दीर्घायु हो और साथ ही साथ जो कुछ भी प्रकट होते जा रहे सुधार हैं, उनको क्रियान्वित भी होने दे।
अब अगर सभी पद, सभी संस्थान पंच-वर्षीय आयु की ही रहेंगी, तब फिर "सत्य के केंद्र" स्थापित कैसे होगा ?

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