Friday, September 25, 2015

वकील और न्यायधीशों में बौद्धिक गुणवत्ता की कमी है।

(व्यक्तव्य: 20 सितम्बर के समाचारों से सम्बंधित)

वकील और न्यायधीशों में बौद्धिक गुणवत्ता की कमी है।
1)   ओला कैब टैक्सी प्रकरण में पीड़ित पक्ष ने एक याचिका डाली थी की वह गवाहों का मुआयना फिर से करवाना चाहते हैं क्योंकि पहले वाले वकील की काबलियत पर उन्हें शक हो रहा है कि वह अभयुक्त को उचित सजा नहीं दिलवा पायेगा।
    इस याचिका के प्रभाव में कोर्ट ने बार कॉउंसिल को निर्देश दिए हैं की वह देश भर में अपराधिक मामलो के वकीलों की समय-समय पर अपनी क़ाबलियत प्रमाणित करवाने के लिए वकालत के पेशेवर नियमों में सुधार करे।
    
2)  कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला दिया है कि भ्रष्टाचार मामलों में सिर्फ रिश्वत की रकम की प्राप्ति पर्याप्त सबूत नहीं माना जा सकता है किसी सरकारी बाबू के भ्रष्टाचार को प्रमाणित करवाने के लिए। काफी सारे 'भ्रष्टाचार-विरोधियों-के-विरोधी' इस फैसले से हर्षित नज़र आये की चुनावी राजनीति में जो लोग लोकपाल विधेयक जैसी नीतियों की भ्रष्टाचार का रामबाण समझ रहे थे उनकी अकल खुलेगी की भ्रष्टाचार प्रमाणित नहीं किया जा सकता है। असल में यह भ्रष्टाचार-विरोधियों-के-विरोधी खुद ही न्यायालय की बात को समझ नहीं पाये की संभवतः यह फैसला विशिष्ट परिस्थितियों में दिया उपचार है जब शायद फरयादी अपनी स्वयं की मूर्खता वश किसी असम्बद्ध बाबू को रिश्वत की रकम दे आया होगा, जो की उस फरयादी के कार्यवस्तु से सम्बंधित विभाग से ही नहीं जुड़ा था। ऐसे में बाबू ने जाहिर तौर पर बचाव में कहा होगा की 'जनाब, मैं क्यों यह रिश्वत लूँगा जबकि मेरा तो उसके कार्यवस्तु के विभाग से कोई जोड़ ही नहीं है'। बस , कोर्ट का फैसला उस बाबू के हक़ में , और इधर भ्रष्टाचार-विरोधियों-के-विरोधियों के सीने चौड़े की देखों तकनीकी तौर पर लोकपाल जैसे विधेयक असफल ही हो जाएंगे !!

3) अधिवक्ता विधेयक 1961 में बार कौंसिल पर एक जिम्मेदारी है की वह समाज में नियम-कानूनों के प्रति सामाजिक जागरूकता के लिए भी कदम उठाएगा। हालाँकि बार कॉउंसिल इस दिशा में कोई विशिष्ट कार्य करता बिलकुल भी दिखाई नहीं देता है। नियम-कानून के दायरे में रह कर कर्त्तव्यों को पूर्ण कर सकने की काबलियत जनता की तो छोड़िये, पुलिस में तक नहीं है। आख़िरकार वह निर्भया प्रकरण जैसे संगीन और संवेदनशील मामले में भी सिर्फ 10साल की सजा ही दिलवा पाये है। मीडिया में भी कोर्ट के फैसलों को उच्चारित कर सकने की कमी है - जो की यह संदेहजनक है की जानबूझकर है, या की मुद्रिक लाभ के प्रभाव में है। मीडिया न्यायलय के फैसलों को सही चौखटे में जनता के समक्ष प्रस्तुत नहीं करता है। और हम यह अच्छे से जानते है की अपनी ताज़ा ताज़ा स्वतंत्रता में जो कमी सबसे अधिक हमारे विकास के रस्ते में अड़चन बनाएगी वह जागरूकता ही है -- नियम कानुनों के प्रति।