आत्मनिष्ठ प्रश्नों के हल --- मत-विभाजन से कहीं महतवपूर्ण है मत-संयोजन

   कभी न कभी ,कहीं किसी पल हमे, हम सभी इंसानों को एक समाज का निर्माण करने के उद्देश्य से इस प्रकार के प्रश्नों पर भी एक राय, एकरुपी विचार रखना पड़ेगा की, "वह जो लाल रंग है वह कितना लाल है ?"।
          आत्मनिष्ठ विषय(subjective issues) उन्हें कहा जाता है जिनको हम निष्पक्षता से माप नहीं सकते हैं। एक उदाहरण के लिए इस प्रशन के उत्तर के विषय में मंथन कर के देखिये, " राम अपनी माता से अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कितना अधिक प्रेम करते थे?" ( क्या प्रेम को नाप सकने वाले यंत्र भी बने हैं ?!!!)
यह एक आत्मनिष्ठ प्रशन है जिसको की सर्वश्रेष्ट तर्कसंगत व्यक्ति भी उत्तर्रित नहीं कर सकते हैं। जहाँ तक आज के, आधुनिक विज्ञान का सवाल है अभी तक तो इंसानों ने इस प्रशन के निष्पक्ष(objective) उत्तर दे सकने के संसाधन विक्सित नहीं किये हैं।
        मगर दुविधा तो देखिये - एक समाज का निर्माण करने के लिए हमे ऐसे ही प्रशनों का एकरूपी उत्तर दूंढ कर ही आगे का रास्ता मिलता हैं। ऐसे उत्तर जो समान रूप से सर्वस्वीकार्य हों। हम इन प्रशनों को अनउत्तरित कर के एक समाज का निर्माण कभी नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार के प्रशन बार-बार हमारे बीच में आकर हमारे आपसी सोहर्दय को चोटिल करते रहेंगे अथवा हमारे विकास में बाँधा देते रहेंगे।
       हमारे आसपास चलने वाले अधिकाँश वाद-विवाद ऐसे ही आत्मनिष्ठ प्रश्नों की देन होंती हैं। हमारी वह निष्ठा जो कभी हम में हमारी सांस्कृतिक विरासत से उत्पन्न होती है, कभी कभी हमारे भिन्न दृष्टिकोण से तो कभी हमारे भिन्न भिन्न आस्थाओं के चलते।
        ज़ाहिर सी बात है, हम कभी भी किसी व्यक्ति को यह बहस करते नहीं सुनने वाले हैं की "आप की क्या राय है कि 2 + 2 कितना होना चाहिए?" । इस प्रकार के विषय तर्क की विचार क्ष्रेणी में होते हैं और इन्हें स्पष्टता से नापा जा सकता है। तर्क की चौखटे में होने वाले वाद-विवाद अक्सर कर के मात्र इस बिन्दु पर टिकते हैं की भिन्न विचारों की किस तर्क क्रम में रखना था, या की तार्किक भ्रान्ति कहाँ हो रही हैं। तर्क सम्बंधित विवादों को हम आपसी मशवरा, मंथन, संगोष्ठी इत्यादि के माध्यम से सुलझा सकते हैं।
        मगर आत्मनिष्ठ विषयों से जुड़े विवादों का हल कैसे करेंगे? यह ऐसे विवाद होते हैं जिनमे स्वयं से भिन्न मत रखने वालों से हमें हट्ट और अड़ियल व्यवहार ही सामना करने को मिलता है। मत-विभाजन की विधि से हम बहुमत तो पता लगा सकते हैं मगर सिद्धांतों की सिद्ध नहीं कर सकते हैं। बहुमत तो केवल लोकप्रियता का सूचक होता है , यह कैसे सिद्ध होगा की बहुमत प्राप्त करने वाला विचार सिद्धांतों के अनुरूप है। सिद्धांतों के बिना किया गए निर्णय दिल्ली के शासक बीन-तुगलक के निर्णयों के सामान होते हैं- "मूर्खतापूर्ण सयाना गिरी"।

    बडी जनसँख्या और क्षेत्रफल को कुछ बुनियादी सिद्धांतों से ही संचालित किया जा सकता है, केवल लोकप्रियता से नहीं।

        मगर तब कैसे किसी विवाद सुलझाएंगे जब हमे बुनियादी सिद्धांतों की तलाश के दौरान ही भिन्न मत मिलने लगें। क्या यह सिद्धांतों की तलाश वाला विवाद भी मत-विभाजन से ही सुलझाएंगे?!
       अरे बुद्धू , मत-विभाजन से तो लोकप्रियता मिलती है , सिद्धांतों के सिद्ध होने का प्रमाण नहीं मिलता है।
इसका हल यह है कि यहाँ हमें मत-विभाजन के स्थान पर मत-संयोजन करने की आवश्यकता होती है। यानि की एक-राय, एकरुपी विचार। बल्कि शायद जहाँ-जहाँ इंसानों में राय/विचार एक जैसे होते हैं, और जब वह वैज्ञानिक पद्धति द्वारा प्रमाणित होते हैं, तब हम उन्ही विचारों को "सिद्धांत" कहते हैं।
      विवाद ऐसे भी हो सकते हैं जब दो या अधिक सिद्धांतों को किसी एक निर्णायक परिस्थिति में एक समान प्रयोग किया जा सकता है। ऐसी अवस्था में कैसे तय करेंगे कि कौन सा वाला सिद्धांत उपयुक्त रहेगा?
इसका प्रस्तावित उत्तर है कि अगर हम गौर से समझें तब हम ऐसी अवस्था में वापस लौट चुके होते हैं अपनी वही पुरानी अवस्था में जब हमे तमाम विचारों में से एक नया सिद्धांत तलाशना होता हैं। अर्थात, इस समस्या का हल वही है -- मत-सयोजन की विधि, मत-विभाजन नहीं।
       आत्मनिष्ठ विषयों पर एक-राय प्राप्त करने के लिए उपयोगी पाठ्यक्रम "मानवीयता (humanity)" का होता है। मानवीयता का पाठ्य समूह उन विषयों से बना होता है जिनसे की इंसान और उसकी प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं। मानवियता विषय समूह में आने वाले विषय हैं- भाषा, साहित्य, नाट्य कला, मनोविज्ञान, दर्शन, समाजशास्त्र इत्यादि।
       हमारी शिक्षा-व्यवस्था ने यहीं पर हमारे देश को असफल बना दिया है। आर्थिक हलांत ऐसे हो गए हैं की तकनिकी शिक्षा और व्यवसायिक शिक्षा मानवियता की शिक्षा से अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाने लगे हैं। यह हमारी सामाजिक असफलता का मूल बनता जा रहा है। हमारी फ़िल्म नगरी ने भी हमें इस दिशा में सही से पोषित न हीं किया है। आत्मनिष्ठ विषयों में सामान राय प्राप्त करने के लिए समाज के सभी सदस्यों को एक घटनाक्रम को एक सामान आकलन करने का प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता होती है। इसके लिए हमें एक सर्वव्यापक साहित्य की आवश्यकता होती है जिससे हम सब ही एक सामान निष्कर्ष निकालें और सबक लें। अतीत में वैदिक युग में यही सामाजिक प्रशिक्षण हमने रामायण और महाभारत जैसी संरचनाओं के माध्यम से प्राप्त करी है। तभी हम एक संस्कृति रच सके थे। मगर बदलते युग के साथ हर समाज को अपनी सभ्यता की स्थापना के लिए अपने युग के साहित्य की आवश्यकता होती है। हमारे युग में जहाँ फिल्मों ने साहित्य को पूरी तरह शिकंजे में ले लिया है, या विस्थापित कर दिया है, हम इस तरह के सर्वव्यापक साहित्य को रच सकने में करीब-करीब असफल हो चुके हैं।
        मानवियता की सामान आधारभूत समझ हमारे समाज से वाष्पित हो चुकी है। ऐसे में राष्ट्रिय एकता ,अखंडता जैसे शब्द मात्र एक कूटनैतिक आवाहन होते हैं नागरिकों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर लगाम लागने के लिए। वास्तविक अखंडता विचारों के मिलने से आती है, भिन्न विचारों पर पाबंदियां लगा कर नहीं। और एक सामान विचार के लिए सामान भावनात्मक दृष्टिकोण आधार होते हैं।-संयोजन

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